प्रिपरेटरी स्‍टेज में योगात्मक आकलन को अर्थपूर्ण बनाना

अनुवाद : जयजीत अकलेचा | पुनरीक्षण : प्रतिका गुप्ता | कॉपी-एडिटर : अनुज उपाध्याय

रचनात्मक आकलन (formative assessments) निरन्तर चलने वाली एक प्रक्रिया है, जो रोज़मर्रा की पढ़ाई-लिखाई और कक्षा में होने वाली चर्चाओं में शामिल रहती है, वहीं योगात्मक आकलन (summative assessments) किसी पाठ या छमाही अथवा वार्षिक अवधि के अन्त में किया जाता है। योगात्मक आकलन ऐसे होने चाहिए कि वे स्पष्ट तौर पर बता सकें कि बच्चा अगली कक्षा में जाने या पाठ्यक्रम के अगले पड़ाव को समझने के लिए कितना तैयार है। साथ ही, ये आकलन पूरी तरह से निष्पक्ष और कौशल के निर्धारित मानदण्डों पर आधारित होने चाहिए (यानी बच्चे ने चरण विशेष में जो सीखा, उसका अवलोकन और उसकी व्यवस्थित तरीक़े से परख की जा सके [2])। इस दौरान सीखने में अगर कोई कमी नज़र आए तो स्कूल उस बच्चे को विशेष सहयोग व सहारा दे और उस खाई को पाटने के लिए उचित अवसर उपलब्ध कराए। लेकिन अकसर होता यह है कि योगात्मक आकलन ही अन्तिम पैमाना बनकर रह जाते हैं और इनके आधार पर ही बच्चे को अगली कक्षा में भेज दिया जाता है। चूँकि इसी पर उसके भविष्य का पूरा दारोमदार टिका होता है, लिहाज़ा यह वार्षिक परीक्षा बच्चों और उनके माता-पिता, दोनों के लिए एक सालाना प्रताड़ना सरीखी बन जाती है। सवाल यह है कि क्या कुछ इससे अलग किया जा सकता है? इसी सवाल के साथ हम इस लेख की शुरुआत एक कक्षा के दृश्य से कर रहे हैं।

नीचे दिया गया छोटा-सा प्रसंग एक शिक्षिका के उन अनुभवों को दर्शाता है, जो उन्होंने अपनी कक्षा में रचनात्मक आकलन के दौरान महसूस किए और साथ ही उस बड़े अन्तर को भी रेखांकित करता है, जो योगात्मक आकलन के दौरान सामने आया।

सीखने और आकलन पर एक शिक्षिका के विचार

श्रीमती टी तीसरी कक्षा के बच्चों को गणित पढ़ाती हैं। वे चाहती हैं कि उनके विद्यार्थी न केवल गणितीय संक्रियाओं को हल करें, बल्कि गणितीय शब्दावली का इस्तेमाल करते हुए यह भी जानें कि आख़िर ये संक्रियाएँ आपस में किस तरह से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने आने वाली एक पिकनिक के लिए 20-20 बिस्कुट के 7 पैकेट तैयार किए। उन्‍होंने इन पैकटों को बच्‍चों के सामने रखकर पूछा कि वे अलग-अलग तरीक़ों से यह कैसे मालूम करेंगे कि इनमें कुल कितने बिस्कुट हैं?

अभिराज ने सबसे पहले बिस्कुट के 7 पैकेटों का एक रेखाचित्र बनाया, जिनमें से प्रत्येक में 20 बिस्कुट थे। फिर उसने इन पैकेटों के समूह बनाए और तीन चरणों में कुल संख्या ज्ञात की। पार्थ ने अंकों का सहारा लिया और उन्हें एक के बाद एक जोड़ता चला गया। माला ने प्रत्येक पैकेट को दो हिस्सों में बाँट दिया और फिर उन्हें जोड़कर उनका योग निकाला। इस दौरान श्रीमती टी कक्षा में घूम रही थीं। उन्‍होंने बच्चों से पूछा, “यहाँ पर 20 कुल कितनी बार आया है?”, “प्रत्येक पैकेट में कितने बिस्कुट हैं?”, “तुम्हारे इस तरीक़े ने तुम्हें उत्तर तक पहुँचने में कैसे मदद की?” उन्होंने विद्यार्थियों को उनके निर्धारित सहपाठियों के साथ चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित किया और इस दौरान गणितीय शब्दावली के सही उपयोग पर भी कान लगाए रखे। उन्होंने तुरन्त फ़ीडबैक दिए। जहाँ प्रस्तुति सही थी, वहाँ उसकी सराहना की। जहाँ कोई बात स्पष्ट नहीं हुई तो वहाँ उन्होंने सम्बन्धित सवाल पूछे और जब कोई उत्तर ग़लत हुआ तो ग़लत जवाब देने वाले बच्चे को किसी सहपाठी की सही प्रस्तुति देखने का सुझाव दिया। बच्चों ने अपने विचार साझा किए, अलग-अलग तरीक़ों की तुलना की और ज़रूरत पड़ने पर अपने तरीक़ों में सुधार या बदलाव भी किए [1]। गतिविधि की समाप्ति तक शिक्षिका को यह स्पष्ट हो गया कि उनके अधिकांश विद्यार्थी संख्यात्मक तथ्यों और उनके पारस्परिक सम्बन्धों को चित्रों के माध्यम से दर्शा सकते हैं, संख्याओं को बारम्बार जोड़ सकते हैं और उचित गणितीय शब्दावली का इस्तेमाल करते हुए आत्मविश्वास के साथ अपनी बात समझा सकते हैं। इसके ज़रिए उन्हें यह भी समझ में आया कि कौन-से विद्यार्थी इससे भी बेहतर कर सकते हैं और किन्हें कुछ विशेष क्षेत्रों में अभी और मदद की दरकार है।

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अभिराज का प्रदर्शन
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पार्थ का प्रदर्शन
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माला का प्रदर्शन
चित्र-1

महीने के आख़िर में श्रीमती टी ने उसी कक्षा में एक वर्कशीट के ज़रिए अंकगणितीय संक्रियाओं पर आधारित योगात्मक आकलन किया, यानी एक परीक्षा ली। विद्यार्थियों के हाथों में जैसे ही प्रश्नपत्र आए, उनमें से कुछ के चेहरों पर घबराहट दिखाई देने लगी। पहले के उस खेल-खेल में सीखने और गतिविधियों वाले अनुभव के उलट ‘परीक्षा’ के एहसास ने उन्हें बेचैन कर दिया। बच्चों के इस तनाव को भाँपते हुए श्रीमती टी ने बड़े स्नेह से उनसे कहा कि वे जल्दबाज़ी न करें और हर सवाल को बड़े आराम से सोच-समझकर हल करें।

आमतौर पर आत्मविश्वास से भरे रहने वाले अपने विद्यार्थियों की इस घबराहट को देखकर श्रीमती टी यह सोचने को विवश हो गईं कि प्रिपरेटरी स्‍टेज (कक्षाओं) में योगात्मक आकलन होना भी चाहिए या नहीं। बेशक, औपचारिक योगात्मक आकलन का अपना महत्त्व है, लेकिन उच्‍च प्रभाव वाला आकलन बच्चों में तनाव पैदा कर देता है और उनका ध्यान सीखने की ख़ुशी से हटकर केवल अच्‍छे अंक प्राप्‍त करने के लिए प्रदर्शन करने पर केन्द्रित हो जाता है। इस उम्र में बच्चे अभी भी अपनी संज्ञानात्मक क्षमताओं (जैसे समझ-बूझ, समस्या समाधान, तर्क आदि) और भावनात्मक कौशल (जैसे सहयोग, टीम वर्क, आत्म-जागरूकता आदि) को विकसित कर रहे होते हैं। श्रीमती टी ने अब तक योगात्मक आकलन मुख्य रूप से पारम्परिक लिखित परीक्षाओं के माध्यम से ही किए हैं। इसके विपरीत, कक्षा में अनौपचारिक और रचनात्मक आकलनों के साथ उनके अनुभव बेहद सकारात्मक रहे हैं। इससे वे बच्चों की ग़लतफ़हमियों को पहचान पाती हैं, उन्हें समय पर फ़ीडबैक दे पाती हैं और अपनी शिक्षण पद्धति में आवश्यकतानुसार बदलाव भी कर पाती हैं। तो सवाल यह है कि क्या ऐसा कोई बीच का रास्ता निकल सकता है, जहाँ योगात्मक आकलन का दबाव कम हो और उसे बड़ी सहजता से नियमित रचनात्मक आकलनों के साथ जोड़ा जा सके?

किसी बच्चे की सीखने की यात्रा में प्रिपरेटरी स्‍टेज (कक्षा-3 से 5 तक यानी 8 से 11 वर्ष की उम्र) एक बेहद अहम पड़ाव होता है। यह फ़ाउण्डेशनल स्टेज के खेल-आधारित अनुभवों और माध्यमिक स्तर की औपचारिक शिक्षा के बीच एक सेतु का कार्य करता है। इस चरण में बच्चे भाषा, गणित, कला, शारीरिक शिक्षा और अपने आस-पास की दुनिया जैसे विषयों के साथ गहराई से जुड़ना प्रारम्भ करते हैं। इस तरह ‘खेल-खेल में सीखने’ से आगे बढ़कर अब वे एक व्यवस्थित और औपचारिक पढ़ाई की तरफ़ क़दम बढ़ाते हैं। इस उम्र के बच्चे स्वभाव से जिज्ञासु होते हैं, धीरे-धीरे आत्मनिर्भर होने लगते हैं और हर बात को तर्क की कसौटी पर परखने के लिए तत्पर होते हैं। स्वयं प्रयोग करने, मिल-जुलकर काम करने और शिक्षकों के मार्गदर्शन में अपनी बातों पर विचार करने से अमूर्त सोच और जटिल अवधारणाओं की समझ के विकास में मदद मिलती है।

इसी दौरान आकलन के स्वरूप में भी बदलाव आता है। अब आकलन कम प्रभाव वाले आकलन (low-stakes assessment) से उच्च प्रभाव वाले आकलन (High-stakes assessment) में बदल जाता है। कम प्रभाव वाले आकलन में जहाँ नतीजों से डराया नहीं जाता और मक़सद सिर्फ़ सीखने में मदद करना, फ़ीडबैक देना, कमियाँ पहचानना तथा मार्गदर्शन देना होता है, वहीं उच्च प्रभाव वाले आकलन के परिणाम विद्यार्थियों, शिक्षकों और स्कूल के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं। इसके नतीजे विद्यार्थी के अगली कक्षा में प्रमोशन, प्रमाण-पत्र, दाख़िले या जवाबदेही से सम्बन्धित निर्णयों से जुड़ जाते हैं।

इस आलेख में हम प्रिपरेटरी स्‍टेज के योगात्मक आकलनों से सम्बन्धित सवालों की पड़ताल करेंगे और इन्हें अधिक प्रभावी तथा अर्थपूर्ण बनाने के ज़रूरी उपाय सुझाएँगे। कुछ उदाहरणों के ज़रिए हम संज्ञानात्मक (cognitive) और भावनात्मक (affective) जैसे जटिल शब्दों की गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास भी करेंगे। साथ ही, योगात्मक आकलन के अलग-अलग तरीक़ों पर भी विचार करेंगे।

योगात्मक आकलन की प्रकृति

विभिन्न शोध और नीतिगत साक्ष्य [3] स्पष्ट करते हैं कि यदि शुरुआती चरण में योगात्मक आकलन को समझ-बूझ के साथ डिज़ाइन किया जाए और इसे नियमित रचनात्मक अभ्यासों के साथ जोड़ दिया जाए तो यह बच्चों के विकास में काफ़ी अहम भूमिका निभा सकता है। जहाँ रचनात्मक आकलन बच्चे को निरन्तर फ़ीडबैक देने, उसे प्रेरित करने और स्व-नियंत्रण में मदद करता है, वहीं योगात्मक आकलन हर विषय में सीखने का एक भरोसेमन्द प्रमाण होता है। यह स्कूलों को जवाबदेह बनाने के अलावा भविष्य के पाठ्यक्रमों की योजना तैयार करने में भी मदद करता है। इसके अलावा, यदि योगात्मक आकलन केवल रटे-रटाए जवाबों तक सीमित न हो, बल्कि उसमें प्रयोग, विश्लेषण और उच्च स्तरीय सोच की परख करने वाले कार्य/ अभ्यास जोड़े जा सकें तो इससे बच्चों में विषय की गहरी समझ विकसित होती है। ऐसी सीखी हुईं बातें उनके ज़ेहन में लम्बे समय के लिए दर्ज हो जाती हैं।

शालेय शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 [2] के अनुसार, इस चरण में लिखित परीक्षाएँ शुरू की जा सकती हैं, लेकिन बच्चे की योग्यता का आकलन केवल इन्हीं के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। बच्चे ने वास्तव में क्या और कितना सीखा है, इसकी एक समग्र तस्वीर हासिल करने के लिए पोर्टफ़ोलियो, उसके सहपाठियों का आकलन, आत्म-आकलन और शिक्षकों के अवलोकन जैसे अन्य तरीक़ों का भी उपयोग किया जाना चाहिए। अगर योगात्मक आकलन को एक व्यापक प्रक्रिया के रूप में देखा जाए तो इससे अनेक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य पूरे हो सकते हैं।

योगात्मक आकलन से निम्नलिखित उद्देश्य पूरे किए जा सकते हैं :

  • निर्धारित क्षमताओं के आधार पर विद्यार्थियों की प्रगति पर नज़र रखना।
  • विद्यार्थियों को यह अवसर देना कि वे सीखी गईं बातों को एक-दूसरे से सम्बद्ध कर सकें। यानी किसी पाठ या विषय को पढ़ने के दौरान सीखी गईं अलग-अलग बातों को जोड़ना, समझना और एक साथ समाहित करना, न कि उन्हें अलग-थलग तथ्यों के रूप में महज़ रटना। यह सोचने-समझने का एक उच्च स्तर है।
  • यह तय करना कि विद्यार्थी अगले पड़ाव पर जाने के लिए तैयार है या नहीं।
  • विद्यार्थियों की प्रगति की रिपोर्ट अभिभावकों, स्कूल के प्रबन्धकों और अन्य सम्बन्धित हितधारकों तक पहुँचाना।

कुल मिलाकर, शोध और नीतिगत तरीक़ा दोनों ही एक सन्तुलित पद्धति का समर्थन करते हैं। प्रिपरेटरी स्‍टेज में योगात्मक आकलन तब अधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं, जब वे विविधतापूर्ण हों और साथ ही बच्चों के विकास पर केन्द्रित आकलन प्रणाली का हिस्सा हों। यह प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जो निरन्तर, दबाव से मुक्त, सृजनात्मक और बाल-केन्द्रित दृष्टिकोण को प्राथमिकता दे, जिससे न केवल सीखने की गुणवत्ता निखरे, बल्कि शिक्षण को भी एक सार्थक दिशा मिल सके।

योगात्मक आकलन के मुख्य सिद्धान्त

  1. उद्देश्य चाहे रचनात्मक आकलन के ज़रिए शिक्षण को दिशा देना हो या योगात्मक आकलन के माध्यम से बच्चों की प्रगति को परखना, दोनों ही स्थितियों में शिक्षक के पास किसी भी विषय (जैसे गणित) की गहन समझ होनी ज़रूरी है। उसे यह भी पता होना चाहिए कि विद्यार्थी किस तरह से सोचते हैं। साथ ही आकलन के विभिन्न तरीक़ों का ज्ञान होने के अलावा उसमें अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त जानकारी की व्याख्या करने की क्षमता भी होनी चाहिए। इसे पैडागॉजिकल कॉन्टेंट नॉलेज (PCK) कहा जाता है। यह विद्यार्थिेयों की सीखने की प्रक्रिया के बारे में उपयोगी जानकारी जुटाने और सटीक निष्कर्षों पर पहुँचने के लिए अनिवार्य है।
    उदाहरण के लिए, कक्षा में भिन्न के बारे में पढ़ते समय कोई-कोई विद्यार्थी ‘8 को 4 से बड़ा’ होने की वजह से यह मान लेते हैं कि 1/8 भी 1/4 से बड़ा होता है। एक समझदार शिक्षक तुरन्त जान जाता है कि यह गणित को लेकर एक सामान्य ग़लतफ़हमी है और वह उसी समय कक्षा में ही उसका समाधान कर देता है (रचनात्मक आकलन)। पाठ के अन्त में जब वह छोटा-सा टेस्ट लेता है (योगात्मक आकलन) तो आकलन के तरीक़ों की अपनी जानकारी के आधार पर ऐसे सवाल तैयार करता है कि उससे बच्चे की अवधारणात्मक समझ की परख हो सके, न कि सवाल को हल करने के प्रक्रियात्मक चरणों की। जैसे, वह केवल 73 और 52 जोड़ने की बजाय बच्चों को ऐसे किन्हीं भी दो अंकों की दो संख्याओं को जोड़ने के लिए कह सकता है, जिसका योग तीन अंकों की कोई संख्या हो।
  2. योगात्मक आकलन को व्यापक और बहुआयामी होना चाहिए। विद्यार्थी कितना सीख रहा है, इसे समझने के लिए अलग-अलग तरीक़ों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे कि शिक्षक का अवलोकन, लिखित कार्य, मौखिक उत्तर और गतिविधि आधारित कार्य। इसके अलावा, इसे निरन्तर और संचयी (यानी नए पाठ के साथ पिछले पाठ की भी समझ) भी होना चाहिए। इसका मतलब है कि मौखिक और गतिविधि आधारित मूल्यांकनों के साथ-साथ इसमें समय-समय पर उम्र के अनुकूल छोटी लिखित परीक्षाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए।
    उदाहरण के लिए, बुनियादी ज्यामिति के एक पाठ की समाप्ति के बाद शिक्षक इस बात की जाँच-परख के लिए अनेक तरीक़ों का इस्तेमाल कर सकता है कि विद्यार्थियों ने क्या सीखा। वह कक्षा की गतिविधियों के दौरान विद्यार्थियों को आकृतियों को पहचानते तथा वर्गीकृत करते हुए देख सकता है, उनके उस लिखित कार्य का आकलन कर सकता है जहाँ बच्चों ने आकृतियाँ बनाकर उनके नाम लिखे हों, उनसे आकृतियों की विशेषताओं को मौखिक रूप से बताने के लिए कह सकता है या उन्हें काग़ज़ अथवा मिट्टी के उपयोग से कोई भी साधारण-सी 2D आकृति बनाने का एक छोटा प्रोजेक्ट भी दे सकता है। पूरे पाठ के दौरान विद्यार्थियों की प्रगति को ट्रैक करने के लिए इसमें छोटे-छोटे क्विज़ भी शामिल किए जा सकते हैं। इस तरह, अवलोकन, लिखित कार्य, मौखिक जवाब और गतिविधि आधारित तरीक़ों की मदद से शिक्षक हर बच्चे की ज्यामितीय समझ की समग्र तस्वीर हासिल कर सकता है।
  3. योगात्मक आकलन का उपयोग केवल यह जाँचने के लिए होना चाहिए कि विद्यार्थियों ने अपने स्तर के अनुरूप दक्षताओं को कितनी ख़ूबी से हासिल किया है। इसका इस्तेमाल किसी बच्चे पर कोई ठप्पा लगाने या दूसरे बच्चों के साथ उसकी तुलना करने में नहीं किया जाना चाहिए। [ऐसे आकलनों को मानदण्ड-आधारित (criterion referenced) कहा जाता है, जिसका उद्देश्य केवल यह बताना होता है कि किसी विद्यार्थी ने अपनी निर्धारित दक्षताओं के मुक़ाबले कितना कुछ सीखा है [2])।
    उदाहरण के लिए, प्रिपरेटरी स्‍टेज में जोड़-घटा का पाठ पूरा होने के बाद शिक्षक अपने विद्यार्थियों को ऐसी वर्कशीट देता है, जिसमें सवाल अपेक्षित दक्षताओं के अनुरूप होते हैं। हर विद्यार्थी के उत्तरों को इन्हीं निर्धारित दक्षताओं के आधार पर परखा जाता है, जैसे दो अंकों का घटाना कर लेना या इबारती सवालों को हल कर लेना। इससे बच्चों की आपस में तुलना किए बग़ैर ही यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक विद्यार्थी ने किस चीज़ में महारत हासिल कर ली है और किन क्षेत्रों में उसे और अभ्यास की ज़रूरत है।
  4. योगात्मक आकलन विद्यार्थियों को रोज़ पढ़ाने वाले शिक्षकों द्वारा ही किया जाना चाहिए, ताकि बच्चों की पृष्ठभूमि और पहले से मौजूद जानकारियों के अनुरूप उसे सही ढंग से डिज़ाइन किया जा सके। इस स्तर पर आकलन किसी बाहरी संस्था, जैसे शिक्षा बोर्ड या स्कूल सिस्टम द्वारा थोपा हुआ नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सीखने की प्रक्रिया का ही एक अभिन्न अंग होना चाहिए।

वे कारक जो योगात्मक आकलन को गुणवत्तापूर्ण बना सकते हैं

इस तरह के रचनात्मक योगात्मक आकलन की तरफ़ बढ़ना आसान नहीं है, लेकिन इसकी आवश्यकता तो है। इसके लिए एक स्पष्ट योजना और तरीक़े की ज़रूरत होगी, ताकि योगात्मक आकलन बच्चों की सीखने की यात्रा का वास्तव में एक सार्थक हिस्सा बन सके। इस वास्ते हमें पारम्परिक तरीक़े से हटकर कुछ अलग क़दम उठाने होंगे।

  1. शिक्षकों को उन तमाम साधनों और पद्धतियों में छिपी सम्भावनाओं से परिचित कराने की ज़रूरत है, जिनका इस्तेमाल योगात्मक आकलन के लिए किया जा सकता है। दुर्भाग्य से, अब तक योगात्मक आकलन का मतलब केवल काग़ज़-पेंसिल वाली परीक्षा ही माना जाता रहा है। इस सोच को बदलना होगा। आकलन के अलग-अलग तरीक़ों का इस्तेमाल करते समय शिक्षकों को रूब्रिक्स या एक विस्तृत स्कोरिंग गाइड/मार्किंग स्कीम्स भी तैयार करनी चाहिए। इससे आकलन में निष्पक्षता बनी रहती है और शिक्षक को यह समझने में भी आसानी होती है कि उसके विद्यार्थियों ने कितना सीखा है।
  2. इस प्रकार की लर्निंग से जो निष्कर्ष निकलते हैं, उनका इस्तेमाल पाठ की योजना तैयार करने और उन बच्चों की मदद करने में किया जा सकता है, जो अभी तक किसी क्षेत्र विशेष में दक्षता हासिल नहीं कर पाए हैं। हम इसे योगात्मक आकलन का रचनात्मक उपयोग के नाम से जानते हैं। इस सिद्धान्त का सुझाव शालेय शिक्षा के लिए राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCFSE) में भी दिया गया है। यह प्रक्रिया योगात्मक आकलन को सीखने-सिखाने की मुख्यधारा से जोड़ देती है। साथ ही इससे शिक्षकों को रचनात्मक आकलनों के लिए भी दिशा मिलती है, जिन्हें वे भविष्य में अपनी कक्षाओं में अपना सकते हैं।
    (सम्पादकीय टिप्पणी : हालाँकि ऐसी पाठ-योजनाएँ इस लेख के दायरे से बाहर हैं, लेकिन हम आगामी लेखों में इन्हें शामिल करने की योजना बना रहे हैं।)
  3. योगात्मक आकलन का रिपोर्ट कार्ड केवल अंकों और ग्रेड तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसमें बच्चे की क्षमताओं का ऐसा गुणात्मक विवरण होना चाहिए जो आसानी से समझ में आ सके। उदाहरण के तौर पर अगर हम चित्र-1 को देखें, जिसमें तीसरी कक्षा की शुरुआती तीन महीनों की पढ़ाई के बाद अभिराज, पार्थ और माला ने 20×7 की गणना को चित्रों के ज़रिए प्रस्तुत किया है। अभिराज ने 20-20 की पाँच इकाइयों को जोड़कर एक बड़ी इकाई (100) और दो अन्य इकाइयों को जोड़कर 40 में बदल दिया। इससे इन दो बड़ी इकाइयों का योग करना आसान हो गया। पार्थ ने बार-बार जोड़कर अपना उत्तर हासिल किया। जबकि माला ने हल करने के लिए 20 को 10+10 में तोड़ दिया। इन तीनों के तरीक़ों से यह तो साफ़ है कि उन्हें अवधारणा की अच्छी समझ है। हालाँकि, अभी भी वे उस गणितीय शब्‍दावली को विकसित कर रहे हैं, जिसके ज़रिए उन्हें अपने विचारों को और स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में आसानी हो सके।
    ऐसे विवरण न केवल यह बताते हैं कि बच्चा क्या कर सकता है, बल्कि ये भविष्य की कार्ययोजना के लिए भी स्पष्ट दिशा प्रदान करते हैं।
  4. गणित के शिक्षकों के लिए विद्यालय या क्षेत्रीय स्तर पर पेशवर अधिगम समुदाय बनाए जा सकते हैं, जहाँ वे साथ बैठकर नई-नई युक्तियों पर विचार-विमर्श कर सकते हैं और गतिविधियाँ तथा प्रश्न-बैंक जैसे साझा संसाधन विकसित कर सकते हैं। इसके अलावा, समय-समय पर श्रेष्ठ शिक्षण पद्धतियों का दस्तावेज़ीकरण व प्रकाशन करके उन्हें व्यापक शिक्षक समुदायों के साथ साझा भी किया जा सकता है।
  5. अभिभावकों को संवेदनशील बनाने की ज़िम्मेदारी स्कूलों की है, ताकि वे अपने बच्चों की क़ाबिलियत को समझकर जान सकें कि इसे केवल अंकों, नम्बरों या ग्रेड के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता। अभिभावक अकसर यह जानना चाहते हैं कि उनका बच्चा दूसरों के मुक़ाबले कहाँ खड़ा है। इस तरह की मानसिकता और अपेक्षाएँ योगात्मक आकलन के उद्देश्य को केवल अंकों तक समेट देती हैं। इसलिए यह बेहद ज़रूरी है कि स्कूल अभिभावकों के लिए ऐसे विशेष शिविरों और ओरिएंटेशन कार्यक्रमों का आयोजन करें, जहाँ वे विद्यार्थियों की सीखने की क्षमताओं में विकास के लिए आकलन प्रक्रियाओं में बदलाव की आवश्यकता को समझ सकें।

अन्त में, यह कहा जा सकता है कि प्रिपरेटरी स्‍टेज पर योगात्मक आकलनों को पूरी तरह से छोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं है। इसकी बजाय बच्चों की विकासात्मक आवश्यकताओं और अर्थपूर्ण सीखने के लक्ष्यों के अनुरूप उन्हें नए सिरे से गढ़े जाने की दरकार है। अगर इन्हें दबाव-मुक्त, मानदण्‍ड-आधारित और शिक्षक-नेतृत्व वाली प्रक्रिया के रूप में तैयार किया जाए तो ये केवल रटने की क्षमताओं को परखने की बजाय रचनात्मक आकलन के पूरक बनकर विषय की गहरी समझ विकसित करने में मददगार हो सकते हैं। आकलन के अलग-अलग तरीक़ों को एकीकृत करने से शिक्षक अपने विद्यार्थियों की क्षमताओं की समग्र स्थिति को समझ पाते हैं और साथ ही सीखने की ख़ुशी भी बरकरार रहती है। ऐसा तरीक़ा न केवल शिक्षण प्रक्रिया को दिशा देता है, बल्कि बच्चों को लक्षित सहयोग प्रदान करने और सीखने की भावी राह तय करने में भी मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। सन्तुलित और बाल-केन्द्रित योगात्मक आकलन सीखने एवं सिखाने की प्रक्रिया को सशक्त बना सकते हैं, साथ ही यह भी सुनिश्चित कर सकते हैं कि ये केवल बच्चों को निर्णय सुनाने का ज़रिया न बनकर उनके विकास के साधन बन सकें। योगात्मक आकलन की रणनीतियों और तरीक़ों के बारे में विस्तार से जानने के लिए ‘प्रिपरेटरी स्‍टेज गणित में योगात्मक आकलन को देखने का एक नज़रिया’ शीर्षक से लिखे लेख को पढ़ा जा सकता है, जिसमें विकास में मददगार इन तमाम पहलुओं को बारीक़ी से समझाया गया है।

  1. Adapted from Formative assessment Vignettes in this handout
  2. NCERT. (2022). National Curriculum Framework. New Delhi
  3. NCERT Taras, M. (2005). Assessment–summative and formative–some theoretical reflections. British journal of educational studies, 53(4), 466-478

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