कक्षा-1 व 2 की एनसीईआरटी की गणित की नई पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा

अनुवाद : हिमालय तहसीन । पुनरीक्षण : प्रतिका गुप्‍ता

यह लेख कक्षा-1 व 2 के लिए एनसीईआरटी की गणित की नई पाठ्यपुस्तकों को परखता है, और उनकी तुलना एनसीएफ़-एफ़एस में पेश किए गए नज़रिए से करता है। लेख में कुछ शिक्षकों के अनुभव और प्रतिक्रियाएँ भी हैं जो उन्होंने लेखकों से साझा किए हैं। साथ ही, इन नई पाठ्यपुस्तकों के बारे में मध्य प्रदेश, उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और कर्नाटक के लगभग 90 शिक्षकों से जो गहरी समझ हासिल हुई है, उसका सारांश यहाँ पेश किया गया है।

कक्षा-1 व 2 के लिए एनसीईआरटी की नई पाठ्यपुस्तकें अपने पिछले संस्करणों के मुक़ाबले ज़्यादा जीवन्त, सुघड़, सुव्यवस्थित और समग्र हैं। ‘आमुख’ और ‘पुस्तक के बारे में’ वाले हिस्से इन संशोधनों के पीछे के सन्दर्भ और उद्देश्यों को बख़ूबी समझाते हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अन्तर्गत उल्लिखित सिद्धान्तों और उद्देश्यों, तंत्रिका विज्ञान एवं प्रारम्भिक बाल्‍यकाल शिक्षा सहित विभिन्न विषयों के अनुसन्धान, व्‍यावहारिक अनभुव व संचरित ज्ञान तथा राष्‍ट्र की आकांक्षाओं एवं लक्ष्‍यों के आधार पर, आधारभूत स्तर की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफ़-एफ़एस) का विकास किया गया जिसका विमोचन 20 अक्‍टूबर 2022 को किया गया था। तत्पश्‍चात एनसीएफ़-एफ़एस के पाठ्यचर्या सम्बन्धी उपागम के अनुरूप पाठ्यपुस्तकों की संरचना की गई। ये पाठ्यपुस्तकें कक्षा में सीखने और परिवार तथा समुदाय में सार्थक अधिगम-संसाधनों के साथ सीखने को महत्त्व देते हुए बच्चों के व्यावहारिक जीवन से जुड़ने का प्रयास करती हैं। – आनन्दमय गणित, 2023

पाठ्यपुस्तकों में कई तरह की विषयवस्तुएँ शामिल हैं। साथ ही, इनमें कई बातें सीधे तौर पर कहने के बजाए विभिन्न इशारों (या ज़रियों) से उभारी गई हैं। जैसे इनमें बड़ों, विशेष रूप से नानी-दादी, नाना-दादा, की अहमियत और अलग तरह से सक्षम लोगों को सबके साथ शामिल करना, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, सामाजिक मुद्दों के बारे में जागरूकता, और साझा करने, जिज्ञासु होने तथा अवलोकन करने के हुनर जैसे मूल्यों को बहुत सूक्ष्म तरीक़े से बढ़ावा दिया गया है। एनसीएफ़–एफ़एस में सीखने के लिए खेल-आधारित दृष्टिकोण को अपनाया गया है। इसको अमल में लाते हुए ‘आनन्दमय गणित’ (Joyful Mathematics) की कक्षा-1 व 2 की पाठ्यपुस्तकों में कक्षा के अन्दर और बाहर दोनों जगह की जाने वाली ऐसे कई गतिविधियाँ दी गई हैं, जो समग्र विकास के लिए अनुभव से सीखने के लक्ष्य को हासिल करने में मददगार हैं।

गणितीय अवधारणाओं को स्पष्ट, प्रासंगिक चित्रों के ज़रिए पेश किया गया है। ये चित्र समझ बनाने में मदद करते हैं, और बच्चों के दृश्यात्मक कौशल तथा पढ़ने के कौशल को भी बढ़ाते हैं। आगे लेख में पाठ्यपुस्तकों के सचित्र विशिष्ट उदाहरण दिए गए हैं। अध्यायों में, बच्चों के साथ मौखिक चर्चाओं को शामिल किया गया है जिससे उन्हें अपनी विचार प्रक्रियाओं को बोलकर व्यक्त करने के लिए बढ़ावा दिया जाए। इन किताबों को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि ये पाठ्यपुस्तक के साथ-साथ कार्यपुस्तिकाओं (text-cum-workbooks) के रूप में काम आएँ, जिससे बच्चों को इन्हें पढ़ते वक़्त ही चित्र बनाने, रंग भरने और लिखने के मौक़े मिल पाएँ। हालाँकि, कुछ शिक्षकों का कहना ​​है कि आमतौर पर किसी मानक कार्यपुस्तिका में सवालों को हल करने के लिए जो जगह दी जाती है, वह इन किताबों में कम है।

“गतिविधियों को पूरा करने के लिए कोई जगह नहीं है। यह जगह या तो पाठ्यपुस्तक में दी जानी चाहिए, या अगर इससे किताब भारी/मोटी हो जाती है, तो एक अलग कार्यपुस्तिका होनी चाहिए जिसमें इससे जुड़े सवाल हों।” — गरिमा भट्ट, अज़ीम प्रेमजी स्कूल, उधमसिंह नगर, उत्तराखण्ड

अभ्यास की मात्रा के बारे में जानने के लिए सर्वेक्षण किया गया। (सर्वेक्षण का सारांश लेख के आख़िर में साझा किया गया है)। पाया गया कि सर्वेक्षण में भाग लेने वाले लगभग 13% शिक्षक अभ्यास की मात्रा कम करवाना चाहते हैं, जबकि 48% शिक्षक अभ्यास के सवालों को बढ़ाना चाहते हैं। कुछ शिक्षकों ने ख़ास वजहों से ज़्यादा अभ्यास की ज़रूरत का ज़िक्र किया।

“इस स्तर पर गणित के प्रक्रियात्मक पहलुओं का अभ्यास करने की अहमियत पर ज़ोर देने की ज़रूरत है। पाठ्यपुस्तकों में सबसे पहले, अभ्यास को उसकी अहमियत के कारणों के साथ बताया जा सकता है, साथ ही शिक्षकों के लिए अपने विद्यार्थियों को अभ्यास करवाने के विशिष्ट सुझाव और संसाधन शामिल किए जा सकते हैं।

पाठ्यपुस्तकों में ‘तथ्यात्मक प्रवाह’ (Fact fluency) का भी ज़िक्र नहीं है। पाठ्यपुस्तक के आख़िर में ‘जोड़ के तथ्य’ (addition facts) व ‘घटाव के तथ्य’ (subtraction facts) जैसी ‘तथ्य–शीट’ (Fact sheets) देने से विद्यार्थियों को तथ्यात्मक प्रवाह विकसित करने में मदद मिल सकती है, वरना वैचारिक समझ पर ज़्यादा ज़ोर देने की वजह से यह बात छूट सकती है।” अनघ, अज़ीम प्रेमजी स्कूल, बेंगलूरु, कर्नाटक


“अधिगम के अलग-अलग स्तरों वाले विविध विद्यार्थियों की कक्षा के लिए, अभ्यास के अलग-अलग स्तरों के सवाल होना अच्छा है। मैं पाठ्यपुस्तक की सीमाओं को समझती हूँ। वह सभी की माँगों को पूरा नहीं कर सकती है। फिर भी, अगर इसमें अलग-अलग स्तरों के लिए अभ्यास के ज़्यादा सवाल शामिल हों तो यह बेहतर हो सकती है। हर गतिविधि/अवधारणा के लिए, एक विवरण, तस्वीरें और फिर ‘आओ, इसे करें’ वाला हिस्सा हो, जिसमें गतिविधि पर आधारित 3-4 सवाल शामिल हों, जिन्हें बढ़ाया जा सकता है। आमतौर पर बच्चों को नोटबुक या वर्कशीट में काम करने की तुलना में पाठ्यपुस्तक को हल करने में ज़्यादा मज़ा आता है।”आकांक्षा, अज़ीम प्रेमजी स्कूल, बाड़मेर, राजस्थान

इन पाठ्यपुस्तकों में कई गतिविधियाँ हैं, जो सुझाव के तौर पर दी गई हैं। इसके पीछे विचार यह है कि शिक्षकों को प्रोत्साहित किया जाए कि वे अपनी ख़ुद की गतिविधियाँ बनाएँ, और उनमें स्थानीय खिलौनों, खेलों या बच्चे के आस-पास के माहौल में पाई जाने वाली सामग्रियों का इस्तेमाल करें, जिससे बच्चों के लिए प्रत्यक्ष चीज़ों के साथ ख़ुद करके सीखना सुलभ किया जा सके। शिक्षकों के पास अपने ख़ास सन्दर्भ के मुताबिक़ गतिविधियों को ढालने, बदलने और तैयार करने की छूट होती है। बस, इसे इस तरह किया जाए कि इस स्तर पर बच्चों के लिए बताई गई ख़ास योग्यताएँ विकसित करने पर शिक्षकों का ध्यान बना रहे। शिक्षकों के पास अपने ख़ास सन्दर्भ के मुताबिक़ गतिविधियों को ढालने, बदलने और तैयार करने की छूट होती है। बस, इसे इस तरह किया जाए कि इस स्तर पर बच्चों के लिए बताई गई ख़ास योग्यताएँ विकसित करने पर शिक्षकों का ध्यान बना रहे।

यह शिक्षक की अपनी क्षमता, उसके इरादे, संसाधनों की उपलब्धता और मार्गदर्शन जैसे कारकों पर निर्भर करता है कि वह अपने विद्यार्थियों के लिए किस हद तक शिक्षण का विश्व स्तरीय अनुभव बना सकता है, और जो एनसीएफ़-एफ़एस दस्तावेज़ में पेश नज़रिए के साथ भी मेल रखता हो। हमारे सर्वे के अनुसार 80% शिक्षकों ने बताया कि उन्होंने अतिरिक्त गतिविधियाँ की हैं, जैसे कि टोकन और नक़ली रुपयों के साथ ख़रीदारी का अनुभव करवाना; ऊँगलियों, पत्थरों, कांउटरों और पासों से गिनना; या भारी और हल्के की अवधारणा को गतिविधियों के ज़रिए ख़ुद करके समझना। यक़ीनन, ये प्रयास सही दिशा में बढ़ाए गए क़दम हैं!

अब, अध्याय की संरचना पर एक नज़र डालते हैं। शिक्षकों को क्या करना चाहिए (चित्र-1), इस पर दोनों कक्षाओं की किताबों के प्रत्येक अध्याय में उचित निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही विभिन्न विषयों पर बातचीत के लिए बिन्दु और चर्चा के मौक़े देने वाली बातें जैसे कि ट्रेन, झण्डे, जानवर, आपस में साझा करना, एकता दिवस, सन्तुलित आहार और ज़रूरत से ज़्यादा खाने के बुरे असर आदि शामिल किए गए हैं।

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चित्र-1 : शिक्षकों के लिए निर्देश (कक्षा-1, अध्याय-2, पृष्ठ 10; कक्षा-1, अध्याय-1, पृष्ठ 2 व 4)

इन पाठ्यपुस्तकों में बच्चों की शब्दावली में बढ़ोतरी करने, राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने और देशभक्ति को प्रोत्साहित करने के लिए गतिविधियाँ रची गई हैं (चित्र-2)। ‘आओ सोचें’ जैसे हिस्से बच्चे की समझ को जाँचने के काम आते हैं। वहीं, तरह-तरह के खेलों की युक्तियाँ (जैसे मौखिक निर्देशों के ज़रिए छिपी हुई चीज़ को ढूँढ़ना, या टोकरी में गेंद फेंकना) और कविताएँ (जिनके साथ समझ बनाने वाले सवाल होते हैं) सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा देती हैं। एक गतिविधि में बच्चे रेलगाड़ी की तरह क़तार बनाते हैं, फिर एक कविता को पढ़ते हुए दूसरों के सापेक्ष अपनी स्थिति की पहचान करते हैं (चित्र-3)।

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चित्र-2 : राष्ट्रीय ध्वज के इर्द-गिर्द चर्चा (कक्षा-1, अध्याय-1, पृष्ठ 6)
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चित्र-3 : रेलगाड़ी का खेल (कक्षा-1, अध्याय-1, पृष्ठ 8)

नई पाठ्यपुस्तकों में एक और ख़ास तत्त्व प्रोजेक्‍ट कार्य है, जो विद्यार्थियों को रचनात्मक और व्यावहारिक तरीक़ों से गणितीय अवधारणाओं को अमल में लाने के मौक़े देता है। यह गणित को रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से जोड़कर अनुभवजन्य शिक्षा को बढ़ावा देता है, टीमवर्क को प्रोत्साहित करता है, और समालोचनात्मक सोच तथा समस्या-समाधान के कौशल विकसित करता है।

अध्यायों की समाप्ति किसी प्रोजेक्‍ट या वास्तविक दुनिया की समस्या का समाधान करने वाली गतिविधि के साथ होती है, जैसे कि घर पर चीज़ों को मापना, संख्याओं के पैटर्न बनाना, या मात्राओं को मापना इत्यादि।सोनिया कुण्डू, अज़ीम प्रेमजी स्कूल, उत्तरकाशी, उत्तराखण्ड

प्रोजेक्‍ट कार्य (जैसे कि ख़रीदारी के लिए सामानों की सूची बनाना और ख़रीदारी करते वक़्त उनकी क़ीमत नोट करना) (चित्र-4क) के साथ-साथ, अध्यायों में मज़ेदार गतिविधियाँ (जैसे संख्या 3 या 4 को ऊँगलियों के ज़रिए अलग-अलग तरीक़ों से दिखाना) (चित्र-4ख), और अलग-अलग संस्कृतियों और जगहों (जैसे कि कश्मीर में डल झील, कर्नाटक के छाया खेल, गुजरात का गरबा और केरल की सर्प-नौका स्पर्धा) का परिचय शामिल है (चित्र-4ग)।

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चित्र-4क : कक्षा-2, अध्याय-10, पृष्ठ 122
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चित्र-4ख : कक्षा-1, अध्याय-3, पृष्ठ 21
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चित्र-4ग : कक्षा-2, अध्याय-1, पृष्ठ 14

हर एक अध्याय की शुरुआत में सबसे ऊपर स्कैन करने के लिए ‘क्यूआर कोड’ (QR code) दिया हुआ है। इसके ज़रिए शिक्षक अध्याय में दिए गए विषयों से जुड़े ऑडियो, वीडियो, मल्टीमीडिया, लिखित पाठ्य आदि ई-संसाधनों तक आसानी से पहुँच सकते हैं। उदाहरण के लिए, कक्षा-1 के अध्याय-2 (‘क्या लम्बा है? क्या छोटा है?’) में जो क्यूआर कोड दिया गया है, वह ऑडियो संसाधन तक ले जाता है जहाँ पूरे अध्याय को पढ़कर सुनाया गया है, और वीडियो संसाधन पर भी ले जाता है जिसमें कार्टून के रूप में ‘समझदार दादी’ की कहानी है; उसके बाद अध्याय में शामिल बातों से जुड़े सवाल और अभ्यास हैं, जो इंटरैक्टिव ढंग से दिए गए हैं।

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चित्र-5 : कक्षा-1, अध्याय-2, पृष्ठ 10 और 14

सर्वे में शामिल 60% शिक्षकों ने दावा किया कि उन्होंने इस डिजिटल सामग्री का इस्तेमाल किया है। शिक्षकों ने बताया कि इसमें दी हुई गतिविधियाँ और ऑडियो संसाधन फ़ायदेमन्द हैं और सीखने–सिखाने को आसान बनाते हैं। अतिरिक्त संसाधन उन्हें सही ढंग से समझाने का आत्मविश्वास देते हैं। हालाँकि, कुछ शिक्षकों ने यह भी बताया कि स्कूल में फ़ोन/इंटरनेट की अनुमति नहीं है और इसलिए वे स्कूल में रहते हुए इस सुविधा का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं।

पाठ्यपुस्तकों के बारे में, उनको अमल में लाने पर और विद्यार्थियों के साथ उनके अनुभव को लेकर शिक्षकों के नज़रिए को जानने के लिए कुछ शिक्षकों का साक्षात्कार किया गया। हम इसे आपके लिए व्हाट्सएप चैट, टेलीफ़ोन पर साक्षात्कार और बातचीत की दस्तावेज़ी रिपोर्ट के रूप में यहाँ पेश कर रहे हैं।

गरिमा भट्ट के साथ क्षमा चक्रवर्ती की व्हाट्सएप चैट। गरिमा अज़ीम प्रेमजी स्‍कूल उधमसिंह नगर, उत्‍तराखण्‍ड में कक्षा-2 से 5 तक की शिक्षिका हैं।

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पूनम से क्षमा चक्रवर्ती की फ़ोन पर बातचीत। पूनम अज़ीम प्रेमजी स्कूल, उधमसिंह नगर, उत्तराखण्ड में कक्षा-1 और 2 को पढ़ाती हैं

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यहाँ एक और शिक्षिका के विचार पेश हैं, जिन्होंने सर्वे में भाषा की कठिनाई के बारे में बात की थी :

“गणित पढ़ाने के भाषाई पहलुओं को ऐसी ख़ास शब्दावली, वाक्यांश और वाक्यों की रचना देकर सुधारा जा सकता है, जिससे विद्यार्थियों को लगातार उनका अभ्यास करने में मदद मिल पाए। ऐसे कई शब्द हैं जो भारत में सब जगह समझ में नहीं आते हैं (दीया, नीम्बू पानी, बिन्दी); ख़ासकर पाठ्यपुस्तक के अँग्रेज़ी संस्करण में इनसे बचा जा सकता है।”अनघ, अज़ीम प्रेमजी स्कूल, बेंगलूरु, कर्नाटक

भारती जी.एस. और एन. पुष्पलता के साथ क्षमा चक्रवर्ती की बातचीत। दोनों शिक्षिकाएँ कर्नाटक पब्लिक स्कूल, सरक्की, बेंगलूरु में कक्षा-1 व 2 पढ़ाती हैं।

क्षमा चक्रवर्ती : पाठ्यपुस्तकों के नए संस्करण के बारे में आप क्या सोचती हैं?
भारती : इस नए संस्करण को बनाने में जो काम किया गया है, उसकी हम तारीफ़ करते हैं। इसके साथ ही यह बात भी है कि कर्नाटक के सरकारी स्कूलों के मद्देनज़र शिक्षकों के लिए इन पाठ्यपुस्तकों के इस्तेमाल में बहुत मुश्किल आती है। ऐसा इसलिए क्योंकि यहाँ ज़्यादातर छात्र–छात्राएँ जब पहली कक्षा में आते हैं, तो उन्हें भाषा या पढ़ाई-लिखाई का पहले से कोई अनुभव नहीं होता है। शिक्षकों को आमतौर से कहीं ज़्यादा काम करना पड़ता है और विद्यार्थियों को क़दम-क़दम पर बहुत मदद की ज़रूरत पड़ती है।
क्षमा : अच्छा, तो क्या भाषा और शब्दावली कठिन है?
पुष्पलता : हाँ, लिखा हुआ पाठ्य बहुत कम होना चाहिए और, जहाँ भी सम्‍भव हो, चित्र ऐसे हों कि उन्हें देखकर बात ख़ुद-ब-ख़ुद समझ में आ जाए।
क्षमा : ठीक है। जिस तरह से टॉपिक लिए गए हैं, उसके बारे में आप क्या सोचती हैं?
भारती : उनमें जिस तरह से अवधारणाओं से परिचय कराया गया है और सिखाया गया है वह बहुत बढ़िया है। इस तरीक़े में बच्चे बिना यह महसूस किए कि उन्हें सिखाया जा रहा है बहुत कुछ सीख लेते हैं।
क्षमा : क्या आप इसे ज़रा विस्तार से समझाएँगी?
भारती : इसका मतलब यह है कि अवधारणाओं को उदाहरणों, कहानियों, टीएलएम आदि के ज़रिए पढ़ाया जाता है, जिससे विद्यार्थियों पर यह बात हावी न हो कि वे कुछ नया या मुश्किल सीख रहे हैं, और वे इसी में अटककर न रह जाएँ। जैसे दहाई और इकाई में समूह बनाने को अलग-अलग तरीक़ों से पेश किया गया है।
क्षमा : क्या आपकी नज़र में कोई ऐसी बात आई है जिस पर ध्यान देने की ज़रूरत है?
पुष्पलता : पाठ्यपुस्तक में एक ऐसी ग़लती है जिसे ठीक करने की ज़रूरत है। यहाँ दी गई तस्वीर देखें (चित्र-10 देखें)। आप पाएँगे कि तीसरी पंक्ति में जो दर्ज किया गया है उसके आधार पर चौथी पंक्ति उन संख्याओं से नहीं भरी जा सकती है जो किताब में छापी गई हैं।

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चित्र-9 : कक्षा-1, अध्याय-4, पृष्ठ 44
चित्र-10 : कक्षा-2, अध्याय-6, पृष्ठ 90
चित्र-10 : कक्षा-2, अध्याय-6, पृष्ठ 90

पुष्पलता : इसके साथ ही, सरकारी स्कूलों को द्विभाषी किताबों (अँग्रेज़ी और कन्नड़) का इस्तेमाल करना है, और सवाल दोनों भाषाओं में दिखाई देते हैं, जिन पर काम या जिनका हल दो बार दिया जाना है। इसमें समय लगता है और विद्यार्थी परेशान होते हैं। हमारा सुझाव है कि सवाल दोनों भाषाओं में पूछें और जवाब के लिए एक ही उत्तर का ख़ाना या कार्य के चरण दें। (चित्र-11 देखें)

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चित्र-11 : कक्षा-2 की द्विभाषी किताब, अध्याय-6, पृष्ठ क्रमशः 70 और 88

क्षमा : क्यों न शिक्षक ही विद्यार्थियों से सिर्फ़ एक बार उत्तर देने के लिए कहें?
पुष्पलता : हम कोशिश करते हैं मगर उन्हें ख़ाली ख़ाना छोड़ना अच्छा नहीं लगता है इसलिए वे सभी में जवाब लिख देते हैं। इससे कक्षा में वक़्त बर्बाद होता है। किताब में बदलाव करने से यह काम आसान हो जाएगा।

नोट : द्विभाषी पाठ्यपुस्तकों का मुद्दा एनसीईआरटी के अधिकार–क्षेत्र में नहीं बल्कि राज्य के अधिकार-क्षेत्र में आता है। इस संवाद को सहेजने के मक़सद से इसे यहाँ बनाए रखा गया है।

विभिन्न शिक्षकों के अनुभवों के अंश पढ़ने के बाद, आइए अब वह विस्तृत रिपोर्ट देखें जो अज़ीम प्रेमजी स्‍कूल, उत्तराखण्ड की शिक्षिका सुश्री सोनिया कुण्डू ने हमसे साझा की।

नई पाठ्यपुस्तक के सकारात्मक पहलू (कक्षा-1)

नई गणित पाठ्यपुस्तकों की मुख्य विशेषताएँ
फिर से बनाई गई पाठ्यपुस्तक का मक़सद नए तौर-तरीक़ों, अन्तर्क्रियात्मक (इंटरैक्टिव) साधनों और वास्तविक दुनिया में लागू हो सकने वाली बातों का मेल करके विद्यार्थियों को सीखने का ऐसा अनुभव देना है, जो दिलचस्प हो और समग्र हो। नई किताब की ये विशेषताएँ जिज्ञासा को प्रोत्साहित करती हैं, सक्रिय रूप से सीखने को बढ़ावा देती हैं और गणितीय अवधारणाओं की गहरी समझ विकसित करती हैं। इस नए संस्करण में मुझे जो बातें सबसे अलग लगीं, वे यहाँ दी गई हैं।

  1. अवधारणा का परिचय
    अवधारणाओं को आसान तरीक़ों से पेश किया गया है। बच्चे के लिए इन्हें समझना आसान हो इसलिए तस्वीरों और खेलों के ज़रिए बात कही गई है। यहाँ कुछ उदाहरण दिए गए हैं।

सहज ज्ञान से फ़ौरन गणना (Perceptual subitizing) : ऐसी गणना सहज ही होती है। हम चीज़ों के किसी छोटे समूह को देखते ही बिना गिने फ़ौरन जान सकते हैं कि उस समूह में कितनी चीज़ें हैं। यह बुनियादी अवधारणा है कि संख्याएँ दहाई और इकाई से बनी होती हैं और इसे समझ जाने से बड़ी संख्याओं को समझने की राह बनती है। ‘स्थानीय मान’ की समझ विकसित करने और दिमाग़ी गणनाएँ करने के लिए समूह के रूप में ‘दहाई’ को समझना ज़रूरी है। पाठ्यपुस्तक में इसे अच्छी तरह से बताया गया है।

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चित्र-12 : विद्यार्थी ‘दस के फ्रेम’ का इस्तेमाल करके संख्या–बन्ध (number bonds) या संख्याओं के जोड़े (number pairs) बना रहे हैं।
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चित्र-13 : कक्षा-1, अध्याय-4, पृष्ठ 33

अवधारणात्मक रूप से फ़ौरन गणना (Conceptual subitizing) : इसमें यह पहचानना होता है कि कैसे चीज़ों का एक समुच्चय दरअसल कई छोटे समूहों से मिलकर बना है। मिसाल के तौर पर पासे को लें : हमें जब 6 दिखाई देता है, तो हम इसे तीन के दो समूहों के रूप में देख सकते हैं, जिसे हम छह होना समझते हैं।

संख्याओं को कई तरीक़ों से देखा जा सकता है और उनके तरह-तरह से समूह बनाए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, संख्या 8 को 3 व 5 के मेल, या 4 व 4 के रूप में देखा जा सकता है। ‘अवधारणात्मक रूप से फ़ौरन गणना’ में कुशलता हासिल करना ज़रूरी है क्योंकि यह कौशल कई अन्य गणितीय अवधारणाओं की बुनियाद रखता है, जिनमें संख्याओं का संयोजन व विघटन (composing and decomposing numbers), संख्याओं के बीच सम्बन्ध आदि शामिल हैं।

दस के फ्रेम का इस्तेमाल (Use of Tens Frames) : दस के फ्रेम (टेन फ्रेम) आसान मगर असरदार साधन हैं, जो विद्यार्थियों को संख्याओं की कल्पना करने और उनके स्थानीय मान को समझने में मदद करते हैं।

यह पाठ्यपुस्तकें समूहीकरण, जोड़, घटा और संख्या के पैटर्न की पहचान करने जैसी गतिविधियों के लिए दस के फ्रेम का इस्तेमाल करती हैं, और इस तरह वे संख्याओं को दर्शाने का व्यवस्थित तरीक़ा मुहैया करवाती हैं। दस के फ्रेम विद्यार्थियों को यह दिखाते हैं कि कैसे संख्याओं के दहाई और इकाई के समूह बनाए जा सकते हैं, और इस तरह ये फ्रेम विद्यार्थियों को स्थानीय मान को समझने के लिए तैयार करते हैं। मिसाल के तौर पर, ‘13’ को एक पूर्ण दस के फ्रेम (10) और तीन अतिरिक्त काउंटरों के रूप में देखने से ‘1 दहाई और 3 इकाई’ का ख़्याल बनता है। इस तरह से, इसके ज़रिए स्थानीय मान और संख्या बोध की गहरी समझ को बढ़ावा मिलता है। यह आसान दिमाग़ी गणनाओं के लिए समूह बनाने और ‘दहाइयाँ बनाने’ को प्रोत्साहित करता है (चित्र-9 व 12)।

  1. बच्चों को अचरज में डालने वाले दिलचस्प तथ्य
    जिज्ञासा जगाने और सीखने को ख़ुशनुमा बनाने के लिए पाठ्यपुस्तकों में ऐसे दिलचस्प और अचरज में डालने वाले तथ्य शामिल किए गए हैं, जो गणित और वास्तविक दुनिया के बीच रिश्ता बताते हैं।

पाठ्यपुस्तकों में शामिल उदाहरण : सूर्य मन्दिर, दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा आदि के बारे में चर्चा।

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चित्र-14 : कक्षा-1, अध्याय-7, पृष्ठ 74
  1. चित्रात्मक इंटरैक्टिव अभिव्यक्तियाँ
    दृश्यात्मक साधन और चित्रात्मक प्रस्तुतियाँ अमूर्त अवधारणाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करती हैं जो इन अवधारणाओं को तुलनात्मक रूप से अधिक मूर्त रूप में और ख़ुद से जुड़ाव के साथ समझाने में मददगार हैं। इसके उदाहरणों में सममिति, आकार और माप जैसी अवधारणाओं के लिए रंगीन चित्र, आरेख और इन्फ़ोग्राफ़िक्स; शाब्दिक प्रश्नों और विवेक-बुद्धि के प्रश्नों के लिए कॉमिक-शैली की व्याख्याएँ शामिल हैं।
  1. सुझाने वाली गतिविधियों को शामिल करना
    सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करने और कोशिश व ग़लतियाँ करते हुए सीखने के मौक़े मुहैया करने के लिए पूरे अध्याय में इंटरैक्टिव हैंड्स-ऑन गतिविधियों को सोच-समझकर शामिल किया गया है।

पाठ्यपुस्तकों में शामिल उदाहरण

  • जोड़ या घटाव के खेल के लिए पासे का इस्तेमाल करना
  • मनकों या डण्डियों जैसी चीज़ों से गिनती करना और समूह बनाना
  • संख्या रेखाएँ खींचना और इन पर आधारित पर पहेलियाँ हल करना
  1. अवधारणाओं का प्रवाह बख़ूबी डिज़ाइन किया गया है
    नई पाठ्यपुस्तकों में अवधारणाओं को तार्किक ढंग से जमाया गया है। इसमें विभिन्‍न टॉपिक को आसान से उन्नत/जटिल तक धीरे-धीरे पेश किया गया है। अध्याय आपस में जुड़े हुए हैं, जिससे विद्यार्थी पिछले अध्याय में सीखे हुए विचारों का आधार लेकर आगे सीख सकते हैं और अलग-अलग गणितीय अवधारणाओं के बीच के रिश्ते को देख सकते हैं, जिससे उनमें ज़्यादा गहरी और समग्र समझ विकसित होती है।
  • अवधारणाओं को बढ़ते क्रम में पेश करने से संज्ञानात्मक बोझ महसूस नहीं होता है।
  • नए कौशलों को बनाने के साथ ही इससे पहले हासिल ज्ञान को मज़बूती मिलती है।
  1. तार्किक सवाल
    पाठ्यपुस्तकों में तर्क (विवेक-बुद्धि) पर आधारित सवालों को शामिल किया गया है, जो विद्यार्थियों को समालोचनात्मक रूप से सोचने और अपने जवाबों के तर्क देने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
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चित्र-15 : कक्षा-1, अध्याय-13, पृष्ठ 128
  • तार्किक विवेक-बुद्धि और विश्लेषणात्मक सोच बढ़ती है।
  • रटने के बजाय गहरी अवधारणात्मक समझ बनती है।
  1. सीखने–सिखाने को बढ़ावा देने वाले खेल
    गणित पर आधारित खेल, गणित को मज़ेदार बनाते हैं और गणित विषय के बारे में किसी तरह के डर या फ़िक्र को कम करने में मदद करते हैं। ऐसे खेल विद्यार्थियों को अपने सहपाठियों के साथ संवाद और काम करने के लिए भी बढ़ावा देते हैं, जिससे सीखने-सिखाने का साझा अनुभव बनता है। इससे आत्मविश्वास बनता है और विद्यार्थियों में विषय की सबसे ख़ास बातों की समझ मज़बूत होती है। अंकगणित के अभ्यास के लिए बोर्ड गेम, समालोचनात्मक सोच-विचार के लिए पहेलियाँ, सहयोग को बढ़ावा देने के लिए समूह में आपसी संवाद और व्यवहार वाले खेल इसके कुछ उदाहरण हैं।

विशिष्ट उदाहरण

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चित्र-16 : कक्षा-1, अध्याय-13, पृष्ठ 124

पाठ्यपुस्तक पर आधारित गतिविधियाँ

पाठ्यपुस्तक का यह पृष्ठ जोड़ और घटाव का परिचय करवाने के लिए मनकों और संख्या पट्टियों जैसे दृश्यात्मक साधनों का इस्तेमाल करता है, जिससे ये अवधारणाएँ बच्चों को दिलचस्प लगें और वे इनके साथ जुड़ाव महसूस कर पाएँ। मनकों से आगे गिनते हुए जोड़ को दिखाया गया है, जहाँ बच्चे ‘गिनलड़ी’ पर मनकों को जोड़कर योग होता हुआ देख सकते हैं (जैसे 13+4 = 17)। इसी तरह, एक संख्या पट्टी पर पीछे की ओर कूदते हुए घटाव को दिखाया गया है, जो यह बताता है कि कैसे क़दम पीछे लेने से संख्याएँ घटती जाती हैं (जैसे 9-3 = 6)। ये गतिविधियाँ ख़ुद करते हुए समझ बनाने वाले तरीक़ों से विद्यार्थियों में अनुक्रमिक गिनती, जोड़ और घटाव की अवधारणाओं को पक्का करती हैं, और साथ-ही-साथ मूर्त बातों की समझ से अमूर्त बातों की समझ की ओर ले जाती हैं।

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संख्या पट्टी पर पीछे की ओर कूदें।

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चित्र-17 : कक्षा-1, अध्याय-6, पृष्ठ 66-67 और अध्याय-5, पृष्ठ 63

सुधार के लिए सुझाव

मौजूदा मुद्दासमाधान का सुझाव
निर्देशों में ऐसी स्थितियों के लिए स्पष्टता की कमी है जहाँ पासा फेंकने पर जो संख्या आती है, उससे जुड़े सभी ख़ानों में पहले से ही रंग भरे हुए हों।
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चित्र-18 : कक्षा-1, अध्‍याय-4, पेज 34
यह पंक्ति जोड़ें : ‘अगर पासा फेंकने पर ऐसी संख्या आती है जिससे जुड़े सभी ख़ानों में पहले से ही रंग भरे हुए हों, तो अपनी बारी को छोड़ दें।’ इस तरह, बिना किसी भ्रम के गतिविधि सहज जारी रह सकती है।
यहाँ दी गई तस्वीर में सीमित स्थान की वजह से रेखाएँ एक-दूसरी पर आ जाती हैं, जिससे अवधारणा को समझना मुश्किल हो जाता है।
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चित्र-19 : कक्षा-1, अध्याय-3, पृष्ठ 23
  1. दृश्यात्मक स्थान को फैलाएँ, जिससे रेखाएँ एक-दूसरे के ऊपर नहीं आएँ।
  2. एक और तरीक़ा यह हो सकता है कि विद्यार्थियों से कहें कि वे तस्वीर के बग़ल में वस्तुओं की संख्या लिखें और उनकी तुलना बच्चों की संख्या से करें। इससे यह प्रक्रिया सरल हो जाएगी, तथा ‘इससे अधिक’, ‘इससे कम’, या ‘इसके बराबर’ जैसी अवधारणाओं से बच्चों को परिचित करवाया जा सकेगा।
विद्यार्थी दोनों समूहों के बीच सम्बन्ध को समझने के बजाय एक साथ सभी छवियों को गिनने लगते हैं, जिससे ग़लतियाँ होती हैं।
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चित्र-20 : कक्षा-1, अध्याय-5, पृष्ठ 49
  1. बच्चों को इस गतिविधि को चरणों में विभाजित करने के लिए प्रोत्साहित करें, जैसे कि दोनों समूहों को अलग-अलग पहचानना और उन्हें जोड़ने से पहले गिनना।
  2. ऐसे सवाल करें जिनसे बच्चे ख़ास दिशा में सोचें, जैसे : “पहले समूह में कितने बच्चे हैं? दूसरे में कितने बच्चे हैं? जब हम उन्हें साथ मिलाएँगे तो क्या होगा?”
इस तरह की मदद बच्चों को संख्याओं की समझ विकसित करने और ग़लतियों से बचने में सहायक होगी।

आइए, अब उस सर्वे के ब्यौरे पर नज़र डालें, जिसमें देश भर के 90 शिक्षक शामिल थे। यह सर्वे हमें बताता है कि शिक्षक कक्षा-1 व 2 की गणित की पाठ्यपुस्तकों के नए संस्करण को किस तरह देखते हैं।

क्या आपने कक्षा-1 या 2 के विद्यार्थियों को एनसीईआरटी की गणित की पुरानी पाठ्यपुस्तक से पढ़ाया है?
90 जवाब

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NCERT-Math-textbook
गणित की पाठ्यपुस्तक का कौन–सा संस्करण ज़्यादा दृश्यात्मक (ज़्यादा चित्रों वाला) है?
70 जवाब
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गणित की पाठ्यपुस्तक का कौन–सा संस्करण ज़्यादा दिलचस्प है?
70 जवाब
Math-textbook-is-more-engaging
किस संस्करण में शिक्षक के लिए ज़्यादा निर्देश हैं?
70 जवाब
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आपके मुताबिक़ विद्यार्थियों को किस संस्करण में ज़्यादा मज़ा आया?
70 जवाब
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आपको कौन–सा संस्करण पसन्द है?
70 जवाब
Which-version-do-you-prefer
नए संस्करण में 3 सबसे अच्छी बातें :
  • बहुत सारी तस्वीरें
  • कई अवधारणाओं का अच्छा चित्रण
  • कहानियाँ और गतिविधियाँ
ऐसी 3 सबसे ज़रूरी बातें जो नए संस्करण में बदलनी/अलग तरीक़े से करनी चाहिए :
  • अभ्यास को बढ़ाएँ
  • ऐसे शब्द/शब्दावली का इस्तेमाल करें जिनको अमूमन सभी समझते हों
  • कहानियों/खेलों/गतिविधियों की संख्या बढ़ाएँ
1 से 5 की रेटिंग पर, आप कक्षा-1 की गणित की वर्तमान पाठ्यपुस्तक को कितना रेट करेंगे? 80 जवाब current-Grade-1-Math-textbook

60% ने कक्षा-1 की पाठ्यपुस्तक के नए संस्करण के लिए 4 या उससे ज़्यादा की रेटिंग दी है।
1 से 5 की रेटिंग पर, आप कक्षा-2 की गणित की वर्तमान पाठ्यपुस्तक को कितना रेट करेंगे? 84 जवाब
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56% ने कक्षा-2 की पाठ्यपुस्तक के नए संस्करण के लिए 4 या उससे ज़्यादा की रेटिंग दी है।

कक्षा-1 व 2 के लिए एनसीईआरटी की गणित की नई पाठ्यपुस्तकों को जिन शिक्षकों ने पसन्द किया है, उन्होंने बहुत सोच-समझकर डिज़ाइन किए गए अध्यायों और उनमें शामिल तौर–तरीक़ों की तारीफ़ की है। शिक्षक पाते हैं कि इन नई पाठ्यपुस्तकों में क्यूआर कोड के ज़रिए अतिरिक्त सामग्री तक आसान पहुँच है। शिक्षकों के लिए साफ़-साफ़ निर्देश होने के साथ-साथ हर अध्याय में सीखने-सिखाने की कई दिलचस्प विधियाँ दी गई हैं, जिनमें कहानियाँ, कविताएँ, तस्वीरें, वास्तविक जीवन से जुड़ी गतिविधियाँ, सांस्कृतिक सन्दर्भ और प्रोजेक्‍ट कार्य शामिल हैं। इसके अलावा, इनमें शामिल पहेलियाँ विद्यार्थियों और शिक्षकों दोनों के लिए स्फूर्तिदायक हैं।

हालाँकि, सुधार के लिए कुछ सुझाव भी हैं। ख़ासकर अध्यायों के क्रम और कक्षा-2 में लिखित पाठ्य की मात्रा, अभ्यास के कामों के लिए दी गई जगह, अभ्यास के प्रश्नों की संख्या, और साथ ही कुछ अवधारणाओं के महत्त्व पर शिक्षकों के लिए ज़्यादा स्पष्ट मार्गदर्शन की ज़रूरत और इन्हें पढ़ाने के लिए अलग तरीक़ों की आवश्यकता शामिल हैं। पाठ्यपुस्तकों के अगले संस्करण में इन बातों पर ज़्यादा ध्यान दिया जा सकता है।

हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि पाठ्यपुस्तकों का नया संस्करण बेहतर सम्भावनाएँ लिए हुए एक उम्मीद भरा क़दम है, जो ज़्यादा इंटरैक्टिव, व्यावहारिक और शिक्षण के समग्र अनुभव को बढ़ावा देता है। हालाँकि अभी भी कुछ जगहों पर सुधार की ज़रूरत है, लेकिन शिक्षकों से मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया और पाठ्यपुस्तकों की नई ख़ूबियाँ यह दिखाती हैं कि ये पाठ्यपुस्तकें युवा शिक्षार्थियों के लिए गणित को ज़्यादा आनन्ददायक और सार्थक अनुभव बनाने की दिशा में हैं।

  1. Joyful Mathematics: Class 1 (2023), NCERT https://ncert.nic.in/textbook.php?aejm1=0-13
  2. Joyful Mathematics: Class 2 (2023), NCERT https://ncert.nic.in/textbook.php?bejm1=0-11
  3. The National Curriculum Framework for Foundational Stage (NCF-FS) (2023)

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