सीट नम्बर 22
मंगलवार की एक सुबह थी। गाँव के सरकारी स्कूल की कक्षा-7 में पढ़ने वाले 12 बच्चे थोड़ा चौंक गए जब मैं उनकी मैडम की जगह कक्षा में आया। थोड़े हँसी-मज़ाक और बातें करने के बाद मैंने उनसे हल्के-फुल्के अन्दाज़ में पूछा, “आप में से कौन-कौन बस में सफ़र कर चुका है? आप कहाँ गए थे और क्यों? बस अन्दर से कैसी होती है? आपने कितनी तरह की बसें देखी हैं?”
कक्षा खिल उठी और बच्चे अपनी-अपनी यात्राओं की कहानियाँ बताने लगे। कोई नानी के यहाँ गया था, कोई मौसी के पास। साफ़ था कि सबने कभी-न-कभी बस में सफ़र किया था। मैंने उन्हें बताया कि मैं दूसरे स्कूल के बच्चों से बस की सीटों के नम्बर के बारे में बातें कर रहा था। तभी सुरभि ने एक मज़ेदार सवाल पूछा :

एक बार मैं बस से नानी के घर हरिद्वार जा रही थी। मैंने देखा कि मेरी सामने वाली सीट का नम्बर 22 था। तो मेरी सीट का नम्बर क्या था?
बच्चो, क्या आप यह पता लगाने में मेरी मदद कर सकते हो?

त्वरित अटकल नया सिखाने का एक अच्छा मौक़ा होता है

23 होगा, क्योंकि 22 के बाद 23 ही आता है!
अगर बस में सीटों का एक ही कॉलम होता, तो हाँ, उत्तर 23 हो सकता था। लेकिन जिन बसों को मैंने देखा है, उनमें एक-एक क़तार में एक से ज़्यादा सीटें होती हैं। इसलिए हमें और सम्भावनाओं पर भी सोचना होगा।


हाँ सर, मुझे लगता है कि हमें बस की सीटों का एक चित्र बनाना चाहिए ताकि हम जान सकें कि सीटें कैसे लगी होती हैं। इससे हमें सुरभि की सीट के बारे में सही पता चलेगा।
चित्र बनाकर हल ढूँढ़ना
शायद आप सभी को चित्र बनाना पसन्द है। इससे गणित और भी मज़ेदार हो जाता है। तो चलो, आप सब एक बस का चित्र बनाओ और सीटों को नम्बर दो, जैसा आपने देखा हो।





आप सबने बस की सीटें अलग-अलग ढंग से बनाईं, फिर भी आप में से ज़्यादातर एक जैसे नतीजे पर पहुँचे। बच्चो, इस बारे में आपका क्या कहना है?

उत्तर अनेक, रास्ते अनेक

सर, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम बस का चित्र कैसे बनाते हैं। सुरभि की सीट 26 भी हो सकती है, 27 भी या कुछ और भी। मतलब कई जवाब सही हो सकते हैं। जब मैंने बस का चित्र बनाया तो मैंने सीटों की गिनती एक अलग जगह से शुरू की और तब मुझे समझ आया कि हर बार सीट नम्बर अलग हो सकता है।
नेहा, क्या आप हमें दिखा सकती हैं कि आपको एक से ज़्यादा जवाब कैसे मिले?



अगर हम बाईं तरफ़ सबसे पहली सीट को 1 मानकर नम्बर देना शुरू करें, तो सुरभि की सीट 31 हो सकती है।
अगर मैं गिनती बाईं तरफ़ की सबसे पिछली सीट से शुरू करूँ, तो सुरभि की सीट का नम्बर 18 आएगा।
और अगर मधु भी गिनती बाईं तरफ़ से शुरू करता है, लेकिन सीटों को थोड़े अलग तरीक़े से नम्बर देता है, तो उस हिसाब से सुरभि का सीट नम्बर 27 हो सकता है।
इसीलिए मुझे लगता है कि इस सवाल का सिर्फ़ एक सही जवाब नहीं हो सकता। सब कुछ चित्र बनाने पर निर्भर करता है। शुरुआत में तो मैं हर सीट का बहुत बारीकी से चित्र बना रही थी, लेकिन फिर मुझे समझ आया कि इतना सटीक चित्र बनाना ज़रूरी नहीं है। मैंने बस सीटों को अलग-अलग तरीक़ों से नम्बर देना शुरू किया और तब मुझे महसूस हुआ कि सीटों की व्यवस्था बदलने से सुरभि का सीट नम्बर भी बदल सकता है।
शाबाश, नेहा! आपने अच्छे से समझाया कि हम शुरू कहाँ से करते हैं और सीटों को कैसे जमाया गया है, इससे नतीजा बदल सकता है।


सर, मैंने थोड़ी अलग तरह से काम किया। मैंने अपने चित्र में कोई नम्बर ही नहीं लिखा। मैंने बस हर सीट के लिए साधारण से डिब्बे (आयत) बना दिए। इस तरीक़े से मैं कहीं से भी नम्बर देना शुरू कर सकता था। इससे यह समझ में आता है कि सुरभि की सीट का नम्बर हर बार एक जैसा नहीं होगा। वह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम सीटों को नम्बर कैसे देते हैं।
मुझे बहुत अच्छा लग रहा है कि आप सब इस समस्या को समझने के लिए चिह्नों और चित्रों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे पता चलता है कि जब हम किसी चीज़ को दिखाने के अलग-अलग तरीक़े अपनाते हैं (चाहे वे बारीकी से बनाए गए चित्र हों या साधारण से आयत) तो हम समस्या को समझने के नए रास्ते खोलते हैं। गणित सिर्फ़ एक ‘सही’ जवाब पाने का तरीक़ा नहीं है, बल्कि यह तो विचारों की खोज और यह समझने की प्रक्रिया है कि सवाल को रखने के हमारे तरीक़े से उसके कई सही हल निकल सकते हैं।

अमूर्त सोच से खेलना
मैंने देखा कि मनीषा और अर्पित ने बाक़ी सबसे बिल्कुल अलग तरीक़ा अपनाया है। जैसे आप सबने बस की सीटों का लेआउट बनाया, वैसे इन्होंने नहीं किया, बल्कि इन्होंने एक आयताकार लहर वाला पैटर्न बनाया है। मनीषा, क्या आप बता सकती हैं, आपके बनाए हुए पैटर्न के हिसाब से सुरभि की सीट का नम्बर क्या है?


जी सर, मेरे बनाए हुए चित्र के हिसाब से, नेहा और मधु की बात सही लगती है। सुरभि की सीट का नम्बर कुछ भी हो सकता है। अगर चित्र-6 में S22 सुरभि के सामने वाली सीट है, तो उस हिसाब से सुरभि की सीट का नम्बर 25 होगा।


चित्र-6

यह तो वाकई दिलचस्प है। और आपने पूरी बस का लेआउट बनाने की जगह सिर्फ़ इतना छोटा पैटर्न क्यों बनाया?


सर, मुझे लगता है कि पूरी बस का चित्र बनाना ज़रूरी नहीं है। इस सवाल का जवाब देने के लिए हमें सिर्फ़ यह समझना था :
- हर पंक्ति में कितनी सीटें हैं
- नम्बर आगे से दिए जा रहे हैं या पीछे से
- नम्बर हमेशा बाईं ओर से दिए जाते हैं या फिर लहरदार ढंग से
हमने जो छोटा-सा पैटर्न बनाया, उसमें ये सारी बातें आ जाती हैं।
समझ गया। मतलब आपके हिसाब से, सिर्फ़ पैटर्न की मदद से ही बताया जा सकता है कि सीट नम्बर क्या होगा। मनीषा, आपने भी कहा था कि कुछ नियम हैं जिससे सीट नम्बर तय किया जा सकता है। क्या आप वे नियम समझा सकती हैं?


हाँ सर, बिल्कुल। लहरदार पैटर्न में सीट नम्बर 22 की जगह भी मायने रखती है। मैंने सुरभि की सीट को 22 में 3 जोड़कर पाया, अर्पित ने 22 में 5 जोड़कर पता किया और अमायरा ने 22 में 7 जोड़े। ये नियम इस पर बदलते हैं कि हमने सीटों को किस तरीक़े से व्यवस्थित किया है। मैंने तो एक ऐसा तरीक़ा भी देखा जिसमें सीट 22 के बाद सुरभि की सीट 22 + 1 हो सकती है! लेकिन हाँ, इसका मतलब यह भी है कि पहली सीट की जगह भी हर बार एक जैसी नहीं होती, वह ऊपर बाईं ओर हो यह ज़रूरी नहीं और यही बात तय करती है कि सीट 22 कहाँ आएगी।
वाह मनीषा, यह तो बहुत अच्छा सम्बन्ध है! कमाल है कि ये नियम किस तरह सीटों की अलग-अलग व्यवस्था पर लागू किए जा सकते हैं। इससे यह भी पता चलता है कि हमारी सोच कितनी लचीली हो सकती है, जब हम एक ही चीज़ को अलग-अलग तरीक़ों से सोचने की कोशिश करते हैं। मुझे बहुत अच्छा लगा कि आप सबने इतनी रचनात्मकता और समझदारी से इस समस्या को हल करने की कोशिश की।

सीट 22 का राज़ : मैंने बच्चों से क्या सीखा
कक्षा का यह अनुभव दिखाता है कि खुले सवाल बच्चों को गहराई से सोचने और मिलकर सीखने में किस तरह मदद करते हैं। जब बच्चों से सुरभि की सीट का नम्बर पूछा गया तो शुरू में उनके जवाब सीधे और सामान्य थे, जैसे कि यह मान लेना कि अगला नम्बर ही जवाब होगा (जैसे 22 के बाद 23)। लेकिन जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ी, बच्चों ने अपनी पहले की धारणाओं पर सवाल उठाना शुरू किया और दूसरी सम्भावनाओं को भी देखने लगे। इस बदलाव में मदद मिली जब उन्हें बस का चित्र बनाने और अपनी कल्पनाओं को दिखाने का मौक़ा मिला। इससे वे समस्या से गहराई से जुड़ सके। उदाहरण के लिए, दीपक, प्रियांशु और ऋतिक ने बस के चित्र बारीकी से बनाए जिससे उन्हें यह समझ में आया कि सुरभि का सीट नम्बर हर बार अलग हो सकता है। इससे यह साबित होता है कि जब विद्यार्थी अपनी सोच को चित्रों के ज़रिए व्यक्त करते हैं, तो वे समस्याओं को नए नज़रिए से देख पाते हैं।
नेहा और मधु के काम में दिखे चिह्नों और अमूर्त तरीक़ों के इस्तेमाल से यह और भी साफ़ होता है कि सोच में लचीलापन होने से एक से ज़्यादा सही उत्तर निकल सकते हैं। मिसाल के तौर पर, नेहा को यह समझ आया कि सीट नम्बर इस पर निर्भर कर सकता है कि गिनती कहाँ से शुरू की गई है। इसलिए उसने यह नतीजा निकाला कि सुरभि का सीट नम्बर 26 या 27 हो सकता है। इस तरह की सोच तब ही सम्भव है जब बच्चों को यह आज़ादी दी जाती है कि वे समस्या को बिना किसी एक ‘सही’ उत्तर की बाध्यता के समझें। इसी तरह मनीषा, अर्पित और अमायरा ने एक क़दम और आगे बढ़कर सीटों की व्यवस्था को दिखाने के लिए एक आयताकार लहरदार पैटर्न का इस्तेमाल किया। इससे उन्होंने यह दिखाया कि अमूर्त सोच से जटिल समस्याओं को आसान बनाया जा सकता है और उनके अन्दर छिपे नियमों को पहचाना जा सकता है। इन विद्यार्थियों की सोच यह दिखाती है कि जब बच्चों को ठोस चित्रों से आगे बढ़ने की आज़ादी दी जाती है, तो वे गणितीय विचारों को अमूर्त स्तर पर भी समझने लगते हैं।
जब शिक्षक बाद में इस तरह के प्रश्न पूछते हैं : “आप ऐसा क्यों सोचते हैं?” या “क्या आप अपनी सोच को समझा सकते हैं?” तो इससे बच्चों को अपने विचारों को शब्दों में रखने का मौक़ा मिलता है और वे दूसरों के विचारों को भी समझने की कोशिश करते हैं। इससे न केवल उनकी समझ गहरी होती है बल्कि आपस में सहयोग की भावना भी बनती है, क्योंकि बच्चे एक-दूसरे की बात ध्यान से सुनते हैं और उनसे सीखते हैं। जैसे जब प्रियांशु ने यह सवाल उठाया कि क्या सुरभि की सीट वाकई 23 है, तो पूरी कक्षा ने फिर से सोचने की कोशिश की और बस के लेआउट को और ध्यान से समझा। इस तरह की बातचीत बहुत ज़रूरी होती है ताकि बच्चों में सोचने-समझने की क्षमता विकसित हो और वे यह जान पाएँ कि हर समस्या का एक ही उत्तर नहीं होता।
इस कक्षा की चर्चा यह दिखाती है कि कैसे एक खुला सवाल — जिसका कोई एक तय उत्तर नहीं है — बच्चों को सोचने, चर्चा करने और अर्थ निकालने की दिशा में आगे बढ़ाता है। इस प्रक्रिया में बच्चे केवल जानकारी लेने वाले नहीं रह जाते बल्कि वे ख़ुद अपनी समझ को बनाने में भागीदारी करने लगते हैं।


आख़िर में, यह लेख यह भी बताता है कि बच्चों को अपनी सोच पर विचार करने और उसे सुधारने के लिए समय देना बहुत ज़रूरी है। जब नेहा और मधु जैसे विद्यार्थियों को अपनी पहली सोच पर दोबारा सोचने का मौक़ा मिला, तो वे अपनी बात को और अच्छी तरह से समझ पाए और ज़्यादा साफ़ नतीजे तक पहुँच सके। इस तरह का मन्थन गणितीय विचारों को गहराई से समझने के लिए ज़रूरी है और यह बच्चों के अन्दर समस्या सुलझाने का आत्मविश्वास बढ़ाता है। अगर कक्षा में ऐसा माहौल बनाया जाए जहाँ ग़लती को सीखने का मौक़ा माना जाए, तो गणित बच्चों में आत्मबल और आगे बढ़ने की सोच पैदा कर सकता है।
ख़ुद मेरे लिए भी यह एक सीखने का मौक़ा था। अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि अगर हमने बस की सीटों को नम्बर ग्रिड से जोड़ दिया होता तो बहुत अच्छा होता। यह एक आसान तरीक़ा होता जिससे बच्चे पंक्तियों और कॉलम में पैटर्न को आसानी से पहचान लेते और नम्बरों के साथ खेलना और भी मज़ेदार हो जाता।
हाँ सर, बिल्कुल