प्रिय पाठको,
जुलाई अंक हाज़िर है…। उधर उत्तर में गर्मी विदा हो रही है, इधर दक्षिण में मानसून दस्तक दे रहा है। पूरे भारत में यह समय शिल्प और चिन्तन के लिए एक आदर्श समय लगता है। बुनाई की जो मानक परिभाषा है उसमें दो प्रकार के धागों का उपयोग होता है – ताना और बाना। गणित के शिक्षक और पढ़ाई जाने वाली विषयवस्तु क्या ये दो धागे (ताना- बाना) बन सकते हैं? इस अंक के लेख सुन्दर गणित और उसके उपयुक्त शिक्षाशास्त्र के पैटर्न बुनते हैं – आप इन्हें विशेष से लेकर पुलआउट तक सभी खण्ड में देखेंगे।
क्या एक ही मॉडल उन सभी सन्दर्भों के लिए ठीक है जहाँ भिन्न का उपयोग किया जाता है? क्या हमें भिन्न को देखने का नज़रिया बदलना चाहिए? नारायण मेहर इस अंक के विशेष खण्ड में भिन्नों के मायने एवं व्याख्या लेख के माध्यम से इस पर बात करते हैं। इसमें पाठ्यपुस्तकों से उदाहरण लेकर भिन्न के विभिन्न निर्माणों का वर्णन करते हैं। साथ ही इस पर विचार करते हैं कि पाठ योजनाएँ बनाते समय और आकलन तैयार करते समय शिक्षकों को इन निर्माणों को क्यों समझना चाहिए।
खण्ड ‘कक्षा में’, आकांक्षा और गरिमा ने आकार-आकृतियों के विषय पर आधारित अपनी पाठ योजनाओँ के बारे में बताया है। क्या होता है जब विद्यार्थी खोज करते हैं, सवाल उठाते हैं और शिक्षक उन्हें सीखने की प्रक्रिया का नेतृत्व करने की स्वतंत्रता देते हैं? उनका अनुभव आपको इस दिशा में काम करने के लिए प्रेरित करेगा। ज़मीनी और प्रासंगिक उदाहरणों तथा सरल अभ्यासों के माध्यम से, अनुष्का अलग-अलग तरह के एल्गोरिदम को समझाती हैं। विद्यार्थी निधि, अश्वत और व्यान ने अपनी डेटा संग्रहण गतिविधि का वर्णन किया है, जिससे उन्हें गणित शिक्षक द्वारा दिए गए एक प्रश्न को हल करने में मदद मिली।
बच्चे हर जगह गणित को देख सकते हैं – चाहे वे बस यात्रा पर हों, नृत्य कर रहे हों, या समस्याओं को हल करने के शॉर्टकट खोज रहे हों। जब वे सोचना और अपने निष्कर्षों को दर्ज करना सीखते हैं, तो वे गणित का मज़ा खण्ड को समृद्ध करते हैं। क्षमा चक्रवर्ती ने थ्री फ़ायरफ़ाइटर कहानी की समीक्षा की है। ऐसी कहानियों के ज़रिए शिक्षक सीख सकते हैं कि वे कैसे अपने विद्यार्थियों को यह समझाएँ कि जब आप अपनी शर्ट के बटन लगा रहे होते हैं, तब भी आपको आकार, माप और संख्या के बारे में सोचना ही होता है! और अन्त में, पुलआउट की बात! कक्षा के दौरान गणित को बुनने की बारीक़ियाँ – यह सिर्फ़ एक सुन्दर विचार नहीं है, बल्कि हम आपको वास्तव में यह करने का तरीक़ा बता रहे हैं! इस सुन्दर विचार के साथ पाठ तैयार करने का आनन्द लें!
हालाँकि ये सभी रोचक विचार आपको लेखों से जोड़े रख सकते हैं, फिर भी एक नज़र पिछले कवर पर ज़रूर डालें। यहाँ हमने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विकसित बुनाई शैलियों को प्रस्तुत किया है। क्या विविधता है! और क्या प्रतिभा है! हम इन शिल्पकारों को प्रोत्साहित करने और इस सामंजस्यपूर्ण सम्पूर्णता को बनाए रखने के लिए क्या कर सकते हैं?
स्नेहा टाइटस
मुख्य सम्पादक, एट राइट एंगल्स
AtRightAngles.editor@apu.edu.in
हम ऐसे लेखों का स्वागत करते हैं जो गणित के सीखने के अनुभव को बढ़ाते हैं, विशेषकर 6-14 वर्ष की आयु वर्ग के विद्यार्थियों के लिए।
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