2018 में, सिक्किम अपनी भाषा, गणित और पर्यावरण अध्ययन (EVS) की प्राथमिक पाठ्यपुस्तकों को नया रूप देना चाहता था। राज्य कक्षा-1 से 5 तक की मौजूदा पाठ्यपुस्तकों से सन्‍तुष्ट नहीं था। (वे कक्षा-6 से एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों का उपयोग करते थे।) इस काम के लिए सिक्किम एससीईआरटी ने महात्मा गाँधी शान्‍ति और सतत विकास शिक्षा संस्थान (MGIEP), यूनेस्को और अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी से सहायता ली। MGIEP का उद्देश्य पाठ्यपुस्तकों में सतत विकास के लिए शिक्षा [Education for Sustainable Development – (ESD)] के लक्ष्यों को शामिल करना था। दुनिया में कहीं भी प्राथमिक स्तर की पाठ्यपुस्तकों के लिए इस तरह के समावेशन का यह पहला प्रयास था। राज्य ने अतीत में ‘जोड़ो ज्ञान‘ के साथ भी भागीदारी की थी। इसलिए, अधिकांश स्रोत व्यक्ति इस बात से परिचित थे कि गणित कितना संवादात्मक और मज़ेदार हो सकता है, साथ ही वे विभिन्न शिक्षण-अधिगम सामग्रियों से भी अवगत थे। लेखकों की टीम में एससीईआरटी और डायट के शिक्षक-प्रशिक्षक और स्कूली शिक्षक शामिल थे।

गणित समूह में 12 लेखक थे जिन्हें कक्षा 1-3 के लिए तीन छोटे समान समूहों में विभाजित किया गया था। यूनेस्को के डॉ. वैगनर और अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी रिसोर्स सेंटर के दो सदस्यों ने लेखकों के इन समूहों के साथ काम किया। पहली कुछ बैठकें लेखकों को पाठ्यपुस्तक लेखन के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराने, उन्हें ESD की समझ देने और इन तीन कक्षाओं के लिए पाठ्यक्रम विकसित करने के लिए थीं। अध्याय लेखन शुरू होने के बाद हम हर महीने लगभग एक सप्ताह के लिए मिलते थे। गंगटोक डायट को अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की गणित प्रयोगशाला ‘मैथ स्पेस’ से संख्‍या किट (पूर्ण संख्याओं, भिन्नों, दशमलव और पूर्णांकों के लिए) का एक सेट पहले ही मिल चुका था।

हालाँकि लेखकों की गणित पर अच्छी पकड़ थी, लेकिन स्थानीय सन्‍दर्भों से जुड़ी और ESD के पुट वाली कहानियाँ और उदाहरण सोचना हमेशा आसान नहीं था। प्रत्येक उदाहरण पर गहराई से विचार करना पड़ता था। प्रत्येक विषय की शुरुआत स्थानीय लोगों के जीवन से जोड़ते हुए उस अवधारणा की आवश्यकता को रेखांकित करना ज़रूरी था। दूसरी चुनौती शिक्षाशास्त्र को रचनावादी (constructivist) बनाने की थी − यानी एक ऐसा माहौल तैयार करना जहाँ बच्चों को ख़ुद खोजने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, बजाय इसके कि पाठ्यपुस्तक (या कोई वयस्क प्रशिक्षक) उन्हें बताए कि क्या करना है। इसलिए, बच्चों के बीच के संवादों के साथ-साथ शिक्षकों और अन्य वयस्कों के साथ होने वाली बातचीत का भी अकसर उपयोग किया गया। कई बार, शुरुआती सवाल एक बच्चे द्वारा पूछा जाता था और वयस्क सीधे जवाब देने के बजाय बच्चे (या बच्चों) को चीज़ों को समझने में मदद करने की कोशिश करते थे। जहाँ भी सम्‍भव हुआ, खेल और गतिविधियों को भी शामिल किया गया। इनमें से कई कहानियों के रूप में किए गए थे, ताकि शिक्षक (और बच्चे) खेल के माध्यम से अपने परिवेश और गणित, दोनों से जुड़ सकें।

हालाँकि ये पाठ्यपुस्तकें एनसीईआरटी की ‘मैथ मैजिक’ शृंखला पर आधारित थीं, लेकिन उनमें इस तरह बदलाव किए गए कि अध्यायों में स्थानीय भोजन, फल, पेड़, खेल, त्योहार और उनकी संस्कृति के विभिन्न अन्य पहलुओं का प्रतिनिधित्व हो सके। इसके अलावा, अवधारणाओं को समझाने के लिए शिक्षण-सामग्रियों को शामिल किया गया। सभी लेखकों ने सामग्रियों की आवश्यकता महसूस की और उनके लाभों को समझा। हमने मारिया मोंटेसरी, रोहित धनखड़ (दिगन्‍तर), ‘जोड़ो ज्ञान’ के कार्यों और अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी तथा कम्‍युनिटी मैथमेटिक्‍स सेंटर, ऋषि वैली एंड सहयाद्री स्‍कूल,केएफआई (CoMaC) के संयुक्‍त प्रकाशन ‘एट राइट एंगल्स‘ के ‘पुलआउट्स’ से सन्‍दर्भ लिए।

राज्य के डिजाइनरों के एक समूह के जुड़ने से यह पूरी परियोजना और भी समृद्ध हो गई। उनके प्रयासों की बदौलत, पाठ्यपुस्तकें स्थानीय लोगों और उनकी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाले रंगीन चित्रों से भरपूर बन गईं।

हमने कक्षा-2 और कक्षा-3 दोनों में विषयगत (thematic) अध्याय जोड़े ताकि यह दिखाया जा सके कि दैनिक जीवन में विभिन्न गणितीय अवधारणाओं का उपयोग कैसे किया जा सकता है। ESD हम सभी के लिए नई थी। MGIEP गाइडबुक के लगभग सभी उदाहरणों में उच्च स्तर का गणित शामिल था − जैसे मॉडल बनाने और अनुकूलन (optimize) के लिए बीजगणित (algebra) और फलनों (functions) का उपयोग। इसलिए, हमें यह समझना था कि प्राथमिक गणित के शुरुआती वर्षों की बुनियादी अवधारणाओं के साथ क्या किया जा सकता है। स्थानीय सन्‍दर्भ अपनाने के अलावा, हमने कैंडी (candies) के बजाय फलों और सब्जियों पर, और शहरी स्थितियों के साथ-साथ ग्रामीण परिवेश एवं उपयोग किए जाने वाले स्थानीय मापों पर ध्यान केन्द्रित किया। भार (वजन) और क्षमता, तथा उन समस्याओं (जैसे भूस्खलन) पर ध्यान केन्द्रित किया गया जिनका सिक्किम के लोग आमतौर पर सामना करते हैं। इसके अलावा, हमने उन विकल्पों को शामिल किया जिन्हें लोग गणित के आधार पर चुनते हैं − जैसे, पहिये गोल क्यों होते हैं, या क्या होगा यदि फुटबॉल घन (cube) के आकार की हो।

इस प्रयास का सबसे अच्छा उदाहरण निम्नलिखित था : हमने कक्षा-2 के एक अध्याय में एक पैर वाले बच्चे को शामिल करने का निर्णय लिया ताकि गणितीय आवश्यकता पूरी होने के साथ-साथ समावेशिता (inclusivity) को भी बढ़ावा मिले। एक अन्य लेखक को यह विचार पसन्‍द आया और उन्होंने कक्षा-1 के एक अन्य अध्याय में एक हाथ वाले बच्चे को एक पात्र के रूप में जोड़ा। इसी तरह, हमने कक्षा-3 में पैटर्न वाले अध्याय में ब्रेल (Braille) को शामिल किया।

हम जानते थे कि ये पाठ्यपुस्तकें मौजूदा पुस्तकों से बहुत अलग होंगी और इसलिए शिक्षकों को काफ़ी मार्गदर्शन और सहयोग की आवश्यकता होगी। हमने इसे दो तरह से हल करने का निर्णय लिया − (i) जहाँ भी आवश्यकता हो, अध्यायों के भीतर ही ‘शिक्षक नोट’ शामिल करना, और (ii) प्रत्येक पाठ्यपुस्तक में चुनिन्‍दा अध्यायों के लिए ‘शिक्षक पृष्ठ’ जोड़ना। इसके अतिरिक्त, हमने प्रत्येक पाठ्यपुस्तक की शुरुआत में ‘माता-पिता और शिक्षकों के लिए नोट’ जोड़ा ताकि उन्हें इस दृष्टिकोण के पीछे के विचारों को समझने में मदद मिल सके। प्रत्येक पाठ्यपुस्तक में सम्‍बन्धित कक्षा के लिए ‘अधिगम के प्रतिफल’ (learning outcomes) भी जोड़े गए। सिक्किम ने राज्य के विशेषज्ञों से भी इन पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा करवाई और उनके सुझावों को भी शामिल किया गया।

एक साल की कड़ी मेहनत के बाद, हमने 40 पायलट स्कूलों के शिक्षकों के साथ एक ओरिएंटेशन कार्यशाला आयोजित की, जो एक साल तक इन नई पाठ्यपुस्तकों का उपयोग करने वाले थे। उन्होंने पाठ्यपुस्तक के विभिन्न चयनित अंशों, कई गतिविधियों और उसमें शामिल विभिन्न सामग्रियों के उपयोग का अभ्यास किया। वे इस बात से सहमत थे कि नई पाठ्यपुस्तकें अब तक उनके द्वारा उपयोग की जा रही पुस्तकों से बहुत अलग थीं, और इसके लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी होगी। हालाँकि, वे सभी यह प्रयास करने के लिए तैयार थे। और उन्होंने ऐसा किया भी!

अन्‍त में, प्राथमिक गणित में गहराई से काम करने के अनुभव ने हमें समृद्ध किया, हमें कई अन्य लोगों के काम को आगे बढ़ाने का सौभाग्य मिला, ‘सतत विकास के लिए शिक्षा’ के प्रति हमारे दृष्टिकोण का विस्तार हुआ और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि हम एक पूरे राज्य के स्कूली बच्चों के जीवन में सार्थक योगदान दे सके।

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