समस्या-समाधान के माध्यम से गणित शिक्षण : जापान से एक शिक्षण तकनीक
लेखक : अकिहिको ताकाहाशी, समीक्षक : अनुषा टी.
यह पुस्तक गणित शिक्षा के साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण योगदान है। यह जापानी कक्षा अभ्यासों और वर्षों से चले आ रहे शोध को एक साथ समेटकर इस प्रकार प्रस्तुत करती है कि शिक्षक और शोधकर्ता, दोनों आसानी से समझ सकें। इसकी एक बड़ी ख़ूबी यह है कि यह Teaching Through Problem-Solving (TTP) नामक शिक्षण-पद्धति की विस्तृत और स्पष्ट व्याख्या प्रदान करती है। मैं इस बात से बहुत प्रभावित हूँ कि यह पुस्तक शैक्षणिक सिद्धान्त को कक्षा में वास्तव में होने वाली प्रक्रियाओं से बेहद प्रभावी तरीक़े से जोड़ती है। अकसर शैक्षिक अवधारणाएँ शोध-पत्रों तक सीमित रह जाती हैं और शिक्षकों तक नहीं पहुँच पातीं, लेकिन यह पुस्तक उन विचारों को व्यवहार में उतारने योग्य और कक्षाओं में प्रयोग करने लायक़ बनाती है। लेखक वास्तविक पाठों के उदाहरण, कक्षाओं की कहानियाँ और व्यावहारिक शिक्षण रणनीतियाँ देकर सिद्धान्त और व्यवहार के बीच मौजूदा दूरी को कम करते हैं। उनका लेखन केवल शोधकर्ताओं के लिए नहीं है, यह शिक्षकों और सामग्री तैयार करने वालों को भी कई ठोस विचार देता है जिन्हें वे आज़मा सकते हैं।

कई वर्षों से जापानी विद्यार्थी TIMSS (Trends in International Mathematics and Science Study) और PISA1 (Programme for International Student Assessment) जैसे अन्तर्राष्ट्रीय टेस्ट में गणित में लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन करते आए हैं। लेकिन अकसर इस महत्त्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान नहीं दिया जाता कि वास्तव में उन्हें गणित किस प्रकार पढ़ाया जाता है।
कई भारतीय कक्षाओं में समस्या-समाधान को प्रायः मुख्य पाठ के बाद ख़ुद से करने के अभ्यास की तरह देखा जाता है, यानी जब अवधारणाएँ पढ़ा दी जाती हैं और सूत्र समझा दिए जाते हैं, तभी विद्यार्थी सवाल हल करते हैं। लेकिन जापान में यह क्रम बिल्कुल उलटा है : वहाँ सवाल ही पाठ होते हैं। विद्यार्थियों को एक सोच-समझकर चुना गया सवाल दिया जाता है, और उसी पर काम करते हुए वे नई अवधारणाएँ और तरीक़े स्वयं खोजते हैं। यह पुस्तक इस शिक्षण पद्धति का एक बहुत स्पष्ट और व्यापक चित्र प्रस्तुत करती है। इसमें बताया गया है कि जापानी शिक्षक ऐसे पाठों की रूपरेखा कैसे बनाते हैं, कक्षा में किस प्रकार की चर्चाएँ होती हैं {इन्हें नेरिएगे (Neriage) कहा जाता है}, और विद्यार्थियों की सोच किस तरह क्रमबद्ध रूप से विकसित होती है। गणित शिक्षा से जुड़े सभी लोगों के लिए यह दृष्टिकोण इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह कई देशों में प्रचलित व्याख्यान और अभ्यास आधारित मॉडल का एक सार्थक विकल्प प्रस्तुत करता है। यह दिखाता है कि गणित को इस प्रकार भी पढ़ाया जा सकता है कि वह विद्यार्थियों के लिए चुनौतीपूर्ण होने के साथ-साथ आनन्ददायक भी बने।

अन्त में, यह पुस्तक शिक्षकों के आपसी सहयोग की भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित करती है। यदि शिक्षक अलग-अलग काम करते हैं तो समस्या-समाधान के माध्यम से शिक्षण प्रभावी ढंग से सफल नहीं हो सकता। ज्यूग्यो केनक्यू (पाठ अध्ययन) की जापानी व्यवस्था यह दर्शाती है कि शिक्षक किस प्रकार मिलकर पाठों की रूपरेखा तैयार कर सकते हैं, उनका अवलोकन कर सकते हैं तथा उन्हें और बेहतर बना सकते हैं। इस प्रकार, यह पुस्तक न केवल गणित पढ़ाने के लिए, बल्कि यह सोचने के लिए भी महत्त्वपूर्ण है कि शिक्षक पेशेवर रूप से कैसे विकसित हो सकते हैं।
पुस्तक का सिंहावलोकन
पहले अध्याय ‘जापानी ‘‘समस्या-समाधान के माध्यम से शिक्षण’’ (TTP) का विकास और प्रमुख अवधारणाएँ’ में लेखक बताते हैं कि जापानी शिक्षक और विद्यालय किस प्रकार मिलकर TTP को एक प्रभावशाली शिक्षण तकनीक के रूप में विकसित और प्रसारित करने में सफल हुए। वे TTP पाठों के तीन प्रकारों और नेरिएगे के चार रूपों की रूपरेखा बहुत स्पष्टता से प्रस्तुत करते हैं, जो इन पाठों की संरचना का आधार बनते हैं। यह अध्याय पाठक को यह समझने के लिए एक ठोस वैचारिक आधार प्रदान करता है कि TTP को कैसे सोच-समझकर तैयार किया जा सकता है और किस प्रकार प्रभावी रूप से कक्षा में लागू किया जा सकता है।
अध्याय-2, ‘TTP पाठ जिनका आप इस्तेमाल कर सकते हैं’ विशेष रूप से रोचक है क्योंकि इसमें कक्षा में सीधे इस्तेमाल किए जा सकने वाले TTP पाठों की एक व्यापक शृंखला प्रस्तुत की गई है। इसमें अलग-अलग प्रकार के पाठों के लिए कई उदाहरण शामिल हैं। इस अध्याय को विशिष्ट बनाने वाली बात यह है कि यह सिद्धान्त और व्यवहार के बीच सन्तुलन बनाता है जिससे शिक्षक तुरन्त देख सकते हैं कि TTP के अमूर्त विचार वास्तविक कक्षा के परिवेश में कैसे आकार लेते हैं।
अध्याय-3, ‘अपना TTP पाठ तैयार करें’ उन शिक्षकों के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका का काम करता है जो अब अगला क़दम उठाने के लिए तैयार हैं। इस अध्याय के सबसे दिलचस्प विचारों में से एक है नेरिएगे मानचित्रों का परिचय; सरल, किन्तु अत्यन्त प्रभावी रेखाचित्र, जो पूरी कक्षा में होने वाली चर्चाओं के प्रवाह को दर्शाने में मदद करते हैं। ये मानचित्र न केवल पाठ योजना की कल्पना करने में मदद करते हैं, बल्कि शिक्षकों को सार्थक गणितीय संवाद को प्रोत्साहित करने के लिए एक ठोस और उपयोगी उपकरण भी प्रदान करते हैं।
अध्याय-4, ‘TTP और सहयोगात्मक पाठ शोध (Collaborative Lesson Research—CLR) आपके विद्यालय को कैसे बदल सकते हैं’ मेरे लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा क्योंकि यह मात्र एक कक्षा की प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं रहता; यह इस बात पर विचार करता है कि जब शिक्षक मिलकर काम करते हैं और एक-दूसरे से सीखते हैं तो कैसे पूरा विद्यालय विकसित हो सकता है। लेखक TTP को जापानी पाठ अध्ययन की परम्परा के सन्दर्भ में रखते हैं और दिखाते हैं कि जापान में शिक्षक किस तरह व्यवस्थित अवलोकन और चर्चा के माध्यम से अपने पाठों को सहयोगात्मक रूप से परिष्कृत करते हैं। मुझे जो सबसे मूल्यवान लगा, वह है उनका सहयोगात्मक पाठ शोध का परिचय, जो जापान के बाहर के शिक्षकों के लिए डिज़ाइन किया गया एक रूपान्तरण है। CLR को एक व्यावहारिक मॉडल के रूप में प्रस्तुत करते हुए, यह अध्याय रेखांकित करता है कि दुनिया भर के विद्यालय किस प्रकार सामूहिक शोध की संस्कृति विकसित कर सकते हैं, जिससे TTP केवल एक शिक्षण रणनीति न रहकर विद्यालय-स्तरीय सुधार का एक महत्त्वपूर्ण चालक बन जाता है।
पुस्तक में मुझे क्या पसन्द आया
मुझे अध्याय-2 में प्रस्तुत सामग्री विशेष रूप से पसन्द आई, क्योंकि यह समस्या-समाधान को, हर कक्षा और हर पाठ के एक अभिन्न हिस्से के रूप में स्थापित करती है, और ऐसा केवल सैद्धान्तिक स्तर पर नहीं बल्कि कुछ सोच-समझकर चुने गए उदाहरणों के ज़रिए करती है। जो बात मुझे सबसे अधिक प्रभावित करती है, वह यह है कि पुस्तक में दिए गए TTP पाठ सामान्य उदाहरण नहीं हैं। ये पाठ वास्तविक जापानी कक्षाओं से लिए गए हैं और दिखाते हैं कि किस प्रकार TTP का उपयोग नई अवधारणाओं को प्रस्तुत करने, समझ को व्यापक बनाने और कई सही उत्तरों वाले खुले सवालों के माध्यम से गणितीय सोच को प्रोत्साहित करने के लिए किया जा सकता है। यह अध्याय शिक्षकों को विद्यार्थियों के पूर्व ज्ञान और कक्षा की आवश्यकताओं के आधार पर पाठों में संशोधन करने की गुंजाइश भी देता है, जिससे यह विविध भारतीय सन्दर्भों में अत्यन्त उपयोगी हो जाता है। विभिन्न अनुभागों में दिए गए पाठ विद्यार्थियों को जूझने, पड़ताल करने और अपनी सोच को व्यक्त करने का अवसर देते हैं, जो गहरे और सार्थक अधिगम की ओर ले जा सकता है।
जापानी विद्यालय प्रणाली में छह वर्ष की प्रारम्भिक शिक्षा (6-12 वर्ष) और तीन वर्ष की निम्न माध्यमिक शिक्षा (12–15 वर्ष) शामिल होती है। इसके बाद तीन वर्ष की उच्च माध्यमिक शिक्षा (15–18 वर्ष) होती है। लेखक विद्यालयी शिक्षा के विभिन्न चरणों में TTP पाठों के अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। लेखक अध्याय-2 को तीन खण्डों में विभाजित करते हैं; खण्ड-2.1 में वे पाँच TTP पाठ देते हैं जहाँ प्रत्येक इकाई में 3-4 क्रमिक पाठ शामिल हैं। खण्ड-2.2 और 2.3 में, लेखक स्पॉटलाइट पाठों (विषय-केन्द्रित) को प्रस्तुत करते हैं। नीचे इन तीनों खण्डों की चर्चा कुछ उदाहरणों सहित की गई है।
खण्ड-2.1 : वैचारिक और प्रक्रियात्मक समझ विकसित करने के लिए पाठ
इस खण्ड में, लेखक ‘क्या आप इन संख्याओं को एक-एक करके बिना गिने जोड़ सकते हैं”, ‘भीड़-भाड़ और गति को मापने के विचार’, ‘समान्तर चतुर्भुज का क्षेत्रफल सूत्र निकालना’, ‘भिन्नों का परिचय’ और ‘अंकगणित से बीजगणित तक सेतु निर्माण’ जैसी इकाइयों पर चर्चा करते हैं। सभी इकाइयाँ रोचक हैं, लेकिन मैं विशेष रूप से ‘अंकगणित से बीजगणित तक सेतु निर्माण’ इकाईयों पर चर्चा करना चाहूँगी। इन पाठों में लेखक बीजगणित सीखने की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण नींव स्थापित करते हैं। TTP पाठ सुव्यवस्थित हैं और क्रमिक रूप से आगे बढ़ते हैं, जो विद्यार्थियों को रटन्त पद्धति पर निर्भर रहने के बजाय गहराई से सोचने को प्रोत्साहित करते हैं। बिन्दुओं को व्यवस्थित करने और छड़ियों की व्यवस्था वाले कार्य जैसे सवालों के माध्यम से विद्यार्थी पैटर्न का सामान्यीकरण करना, गणितीय व्यंजकों का निर्माण और परीक्षण करना, तथा बिना प्रत्यक्ष गिनती के तर्क करना सीखते हैं। वे अर्ध-चर (quasi-variable) जैसी अवधारणाओं के माध्यम से बीजगणितीय सोच की पड़ताल भी करते हैं और कोष्ठकों तथा संक्रियाओं के क्रम जैसे अंकगणितीय नियमों पर चर्चा करते हैं। तर्क, अभिव्यक्ति और सत्यापन पर ध्यान देना, विद्यार्थियों में गणितीय चिन्तन की मज़बूत आधारशिला विकसित करता है। इससे यह खण्ड शिक्षकों के लिए एक मूल्यवान संसाधन बन जाता है।
उदाहरण के लिए, TTP पाठ ‘आइए, बिन्दुओं की संख्या गिनने के तरीक़ों के बारे में सोचें’ बिन्दुओं को गिनने के विभिन्न तरीक़ों और उन्हें गणितीय व्यंजकों के माध्यम से व्यक्त करने पर चर्चा करता है। यह पाठ इस उद्देश्य से तैयार किया गया है कि विद्यार्थी गणितीय व्यंजकों की सामान्यीकरण क्षमता को समझें और प्रतीकात्मक व्यंजकों को ठोस निरूपणों से जोड़ सकें। चित्र-3 उन विभिन्न रणनीतियों को दर्शाता है जिनका उपयोग विद्यार्थियों ने बिन्दुओं को गिनने में किया, और उन गणितीय व्यंजकों को भी, जो इन रणनीतियों से उत्पन्न हुए। इनके बारे में लेखक ने पुस्तक में विस्तार से चर्चा की है।

खण्ड-2.2 : समझ बढ़ाने वाले पाठ
इस खण्ड में, लेखक विद्यार्थियों की गणितीय सोच और समस्या-समाधान क्षमता को चुनौती देने के लिए अपने-आप में परिपूर्ण स्वतंत्र पाठ (stand-alone lessons) प्रस्तुत करते हैं। वे इन्हें ‘स्पॉटलाइट पाठ’ कहते हैं ताकि यह स्पष्ट हो कि इन्हें मौजूदा पाठ्यचर्या में किसी भी स्थान पर जोड़ा जा सकता है। स्पॉटलाइट पाठों में शामिल हैं — ‘जिज्ञासु घटाव’, ‘पैटर्न ब्लॉक का उपयोग करके क्षेत्रफलों की तुलना’, ‘चलो, एक कैलेंडर बनाते हैं’, ‘समान्तर चतुर्भुज के भीतर त्रिभुजों का क्षेत्रफल ज्ञात करना’, और ‘सर्वांगसम त्रिभुज बनाने के तरीक़े विकसित करना’। सभी पाठ अपने-आप में रोचक हैं, लेकिन इस खण्ड के पाठों की प्रकृति को समझने के लिए मैं ‘चलो, एक कैलेंडर बनाते हैं’ पाठ पर चर्चा करूँगी। इस पाठ में बच्चों से अपेक्षा की जाती है कि वे स्थानीय मान और संक्रियाओं के गुणधर्मों की अपनी समझ का उपयोग करते हुए बहु-अंकीय गणनाएँ करें। 1 से 31 तक की संख्याएँ बनाने के लिए आवश्यक न्यूनतम कार्डों की संख्या ज्ञात करने की जो शिक्षण प्रक्रिया अपनाई गई है, और इस प्रक्रिया में उभरने वाला सार्थक नेरिएगे, जो विचारों की तार्किक प्रगति को विकसित करता है, दोनों ही अत्यन्त प्रभावशाली हैं। यह पाठ दस-आधारीय स्थानीय मान प्रणाली की गहन समझ विकसित करने के साथ-साथ ज्यामिति के आयामों को भी विस्तार देता है।
खण्ड-2.3 : अनेक सही उत्तरों वाले सवालों के पाठ
इस खण्ड में, लेखक कई प्रमुख स्पॉटलाइट पाठों पर चर्चा करते हैं : ‘एक घन को खोलना’, ‘आप एक जियोबोर्ड पर कितने अलग-अलग वर्ग बना सकते हैं?’, ‘जियोबोर्ड पर बनाए जा सकने वाले सभी समद्विबाहु त्रिभुज ज्ञात कीजिए’, और ‘आइए, गणित का एक नया सवाल बनाएँ! (पुस्तक Mondai kara Mondai e से एक पाठ)’। ये सभी पाठ खुले (open-ended) सवाल प्रस्तुत करते हैं जिनके कई सही हल सम्भव हैं, और इस प्रकार वे विद्यार्थियों को उच्च-स्तरीय चिन्तन कौशल विकसित करने के लिए प्रेरित करते हैं (Becker & Shimada, 1997)। ‘आइए, गणित का एक नया सवाल बनाएँ!’ पाठ सभी कक्षा स्तरों के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसे जापानी शोधकर्ताओं और शिक्षकों द्वारा विकसित किया गया था। यह लोकप्रिय जापानी पुस्तक Mondai kara Mondai e (Takeuchi & Sawada, 1984) से लिया गया है। यह पाठ विद्यार्थियों को नए सवाल बनाकर पिछले खण्डों में वर्णित “छड़ी के सवाल” का विस्तार करने का अवसर प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, मूल सवाल में केवल एक छोटा-सा परिवर्तन करने से नए और चुनौतीपूर्ण सवाल उत्पन्न हो सकते हैं, जैसे : “यदि हम समान लम्बाई की छड़ियों से 50 आसन्न वर्ग बनाते हैं, तो कुल कितनी छड़ियों की आवश्यकता होगी?” या फिर इस विचार को आगे बढ़ाते हुए, “यदि हम आसन्न घन (adjacent cubes) बनाएँ, तो यह पैटर्न कैसे बदलेगा?” “आइए, गणित का एक नया सवाल बनाएँ!” पाठ का नेरिएगे मानचित्र चित्र-4 में देखा जा सकता है।

चित्र 4 : “आइए, गणित का एक नया सवाल बनाएँ! Mondai kara Mondai e से एक पाठ” [From Problem to Problem] का नेरिएगे मानचित्र
पुस्तक के अध्याय-4 में, लेखक शोध को व्यवहार से जोड़ते हैं और दर्शाते हैं कि किस प्रकार CLR पूरे विद्यालय में शिक्षण पद्धतियों को रूपान्तरित कर सकता है। चित्र-5 में प्रस्तुत CLR की प्रक्रिया एक उदाहरण है कि शोध कैसे वास्तविक कक्षा अभ्यास बन जाता है। शिक्षक ऐसी शिक्षण रणनीतियों का उपयोग करते हैं — मसलन, विद्यार्थियों की सोच का पूर्वानुमान लगाना, विद्यार्थी-केन्द्रित गणितीय संवादों को प्रोत्साहित करना, और संज्ञानात्मक रूप से चुनौती देने वाले कार्यों को अमूर्त विचारों की तरह नहीं, बल्कि पाठ रचना और पाठ चिन्तन के ठोस उपकरण के रूप में प्रयोग करना। CLR व्यावसायिक विकास को अलग-थलग कार्यशालाओं की जगह अन्तर्निहित, सहयोग-आधारित अन्वेषण में बदल देता है। शिक्षक एक- दूसरे से, विद्यार्थियों से, और विशेषज्ञों से सीखते हैं, जिससे एक सक्रिय और गतिशील फ़ीडबैक लूप बनता है जो शिक्षण की गुणवत्ता में निरन्तर सुधार लाता है। CLR के माध्यम से विद्यालय एक ऐसा स्थाई मॉडल विकसित कर सकते हैं जिसमें शिक्षक सह-शोधकर्ता की भूमिका में सशक्त होते हैं, और विद्यार्थियों का सीखना शिक्षण डिज़ाइन के केन्द्र में रहता है।

भारतीय सन्दर्भ और पाठ्यक्रम सुधारों की प्रासंगिकता
समस्या-समाधान के माध्यम से गणित शिक्षण, विद्यालयी शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF-SE) 2023 में प्रस्तुत क्षमता-आधारित अधिगम के सिद्धान्तों से गहराई से मेल खाता है। यह पुस्तक विद्यार्थी-अगुआई वाली पड़ताल पर बल देती है, जहाँ शिक्षार्थी औपचारिक निर्देश मिलने से पहले अपरिचित सवालों से जुड़ते हैं। यह प्रक्रिया आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता, गहन समझ और आवश्यक कौशलों के विकास को पोषित करती है, जो NCF-SE की उस दृष्टि को प्रतिबिम्बित करती है जिसमें रटने के बजाय क्षमताओं के विकास को केन्द्र में रखा गया है। इसके अलावा, TTP ढाँचे में तर्क, निरूपण और चिन्तनशील संवाद पर दिया गया ज़ोर, NCF की निर्माणात्मक (formative), प्रतिक्रिया-आधारित आकलन की दृष्टि को मज़बूती देता है। दोनों ही विचारधाराएँ विद्यार्थियों को अपने सीखने की ज़िम्मेदारी अपने हाथ में लेने के लिए सशक्त बनाती हैं, साथ ही लचीले सीखने के मार्ग और समग्र विकास को प्रोत्साहित करती हैं। इन दोनों का सम्मिलित प्रभाव भारतीय कक्षाओं में गणित शिक्षा को अधिक रोचक, समतामूलक, और प्रभावी बनाने के लिए एक अत्यन्त सशक्त मॉडल प्रस्तुत करता है।
भारतीय सन्दर्भ में, TTP के क्रियान्वयन के सामने कई सीमाएँ हैं जिनमें बड़ी कक्षाएँ, शिक्षकों के सहयोगी प्रयासों के सीमित अवसर, और ऐसी परीक्षा-चालित प्रणालियाँ जो सतत व्यावसायिक संवाद को बाधित करती हैं, शामिल हैं। CLR का क्रियान्वयन भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है; फिर भी, यह ढाँचा उल्लेखनीय सम्भावनाएँ प्रस्तुत करता है। यदि इसे सोच-समझकर अपनाया जाए, तो CLR ऐसे व्यावसायिक शिक्षण समुदायों को विकसित कर सकता है जिनमें शिक्षक एक-दूसरे का सहयोग करते हुए समस्या-समाधान आधारित तरीक़ों को अपनी कक्षाओं में क्रमशः एकीकृत कर सकें।
निष्कर्ष
यह पुस्तक वर्षों के शोध, कक्षा-आधारित अनुभव और चिन्तन को एक साथ लाती है। मेरे लिए इसे वास्तव में विशेष बनाने वाली बात यह है कि यह गहरे और सार्थक विचारों को बहुत ही स्पष्ट, सहज और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करती है। यह दिखाती है कि समस्या-समाधान का दृष्टिकोण कैसे विद्यार्थियों को स्वयं सोचने, सहयोग करने और गणित को अधिक गहराई से समझने में मदद करता है। विषय भले ही समृद्ध और जटिल हैं, लेकिन लेखक ने उन्हें ऐसे ढंग से प्रस्तुत किया है कि वे आसानी से समझे और लागू किए जा सकें। यह पुस्तक उन सभी के लिए एक मूल्यवान मार्गदर्शिका है जो गणित शिक्षण को अधिक आकर्षक, विद्यार्थी-केन्द्रित और प्रभावी बनाना चाहते हैं।
मुझे CLR और TTP के लिए निम्नलिखित संसाधन भी उपयोगी लगे। इच्छुक पाठक इन्हें देख सकते हैं :
- The Lesson Study Group at Mills College https://bit.ly/4hlbRVP
- The Lesson Study Group at Mills College and Teaching through problem solving https://bit.ly/47eF5Ru
- Lesson Study Alliance. (2020). Lesson Study Resources. Retrieved from https://www.lsalliance.org/
- Takahashi, A., & Yoshida, M. (2004). How Can We Start Lesson Study? Ideas for Establishing Lesson Study Communities. Teaching Children Mathematics, 10(9), 436-443.
- Takahashi, A. (2008). Beyond Show and Tell: Neriage for Teaching Through Problem-solving – Ideas from Japanese Problem-solving Approaches for Teaching Mathematics. Paper presented at the 11th International Congress on Mathematics Education in Mexico.
आभार : लेखिका इस लेख में समीक्षित पुस्तक से स्कैन किए गए (चित्र 2.3.4.02) को पुनः प्रस्तुत करने और उसका अनुवाद करने की अनुमति देने के लिए पुस्तक के प्रकाशक रूटलेज, टेलर एंड फ़्रांसिस समूह का आभार व्यक्त करती हैं।
1Ikeda Y, Kita Y, Takagi R, Suzuki K, Mammarella IC, Caviola S, Lanfranchi S, Pulina F, Giofrè D. The Abbreviated Math Anxiety Scale (AMAS): Applicability and Utility in a Sample of Japanese Elementary School Children. Int J Psychol. 2025 Apr;60(2):e70015. doi: https://doi.org/10.1002/ijop.70015PMID: 39933572; PMCID: PMC11813552.