पढ़ाते-पढ़ाते हम क्या छीन लेते हैं?
लगभग 95 साल पहले की बात है, दो साल का एक बच्चा था जिसके दिमाग़ में गाड़ियाँ-ही-गाड़ियाँ घूमती रहती थीं। उसे कारों से इतना प्यार था कि वह कार के सभी पुर्जों के नाम बता सकता था। वक़्त बीतने के साथ उसने समझा कि गियर कैसे काम करते हैं और फिर गियर्स से उसका इस क़दर जुड़ाव हो गया कि वे उसके पसन्दीदा खिलौनों में शुमार हो गए। उसे बोतल के ढक्कन जैसी गोलाकार चीज़ों को एक-दूसरे की उलटी दिशा में घुमाने में मज़ा आता था। उसके लिए यह देखना हैरानी भरा होता कि कैसे एक गियर को एक दिशा में घुमाने पर दूसरा गियर दूसरी दिशा में घूमता है। ‘कार्य-कारण’ शृंखलाओं के साथ अन्तर्क्रिया और समझ बनने की यह उस बच्चे की शुरुआत थी।

वह बच्चा, बाद में एक किंवदन्ती बना और बना बहुत ख़ास इन्सान, जिसे इतिहास बहुत स्नेह से याद करता है। वे सीमोर पेपर्ट थे। उनका मानना था कि अगर वे अपने इस खिलौने का बयान शिक्षाविदों के बीच करेंगे, तो ज़्यादातर उन्हें मशविरा देंगे कि वे उससे ऐसा गियर सेट बना लें जिसका इस्तेमाल करके बच्चे गियर्स के बारे में सीख सकें। लेकिन उनकी कहानी का निचोड़ यह था कि वे गियर्स पर फ़िदा थे। इसीलिए वे गियर्स के साथ लगातार खेलते रह सकते थे। उन्हें गियर्स को घुमाना पसन्द था। उन्हें लगता था कि ऐसे गियर सेट के साथ दी गई कोई भी मार्गदर्शिका खेल में अड़चन ही बनेगी।

शिक्षाशास्त्र पर अपने विचारों पर लगातार काम करने के बाद सीमोर पेपर्ट इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि स्पष्ट निर्देशों के बिना कोई गियर सेट अन्वेषण और खोज को बढ़ावा देने के लायक़ नहीं हो पाएगा, मगर शायद कम्प्यूटर यह भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने ‘लोगो’ [LOGO] खेल (देखें [2]) विकसित किया और इसे ऐसा बनाया जो उनके मुताबिक़ उस समय की ज़रूरत थी।
कुछ समय पहले मुझे पेपर्ट की पुस्तक ‘माइण्डस्टॉर्म्स’ (Mindstorms)[1] मिली। तब तक मैंने पेपर्ट के बारे में नहीं सुना था। माइण्डस्टॉर्म्स की प्रस्तावना में उन्होंने गियर्स के साथ अपने जुड़ाव और काम का ज़िक्र किया है। उनका कहना है कि कम्प्यूटर और प्रोग्रामिंग बच्चों के लिए ऐसी भूमिका निभा सकते हैं और ऐसा माहौल बना सकते हैं जिसमें गणितीय विचार थोपे हुए न लगें, बल्कि स्वाभाविक महसूस हों। उनका बुनियादी विश्वास यह है कि सीखने का मतलब ज्ञान को हासिल कर लेना भर नहीं है, बल्कि ऐसे वातावरण में रहना है जो सीखने में मददगार हो। यह वैसा ही है जैसे इंग्लैंड में परवरिश पाने वाला बच्चा अँग्रेज़ी में ही बात-चीत के माहौल में रहने की वजह से सहज ही धाराप्रवाह अँग्रेज़ी सीख जाता है, जबकि उसी बच्चे को भारत में अँग्रेज़ी में बात-चीत करने में मुश्किल पेश आ सकती है। पेपर्ट का मशविरा है कि गणितीय ‘माहौल’ बनाने के लिए स्कूल कम्प्यूटर का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे छोटे बच्चे स्कूल में गणित को किसी अजनबी और मुश्किल विषय की तरह न देखें बल्कि कम्प्यूटर की सहायता से अन्वेषण और विज़ुअल प्रोग्रामिंग के ज़रिए स्वाभाविक रूप से ज्ञान का निर्माण कर पाएँ।
कक्षा के अन्दर लोकतंत्र
अब मैं ओड़िया-माध्यम के स्थानीय प्राथमिक विद्यालय में अँग्रेज़ी पढ़ाने के अपने हाल ही के काम पर कुछ रोशनी डाल रहा हूँ। हो सकता है कि मैं इस हिस्से में कक्षा के माहौल को नए सिरे से तैयार करने की जो चर्चा करूँगा, उसका गणित सीखने से कोई सीधा सम्बन्ध न हो, लेकिन पेपर्ट के गियर्स का भी गणित से क्या रिश्ता था? मेरा विचार यह है कि उस तरह का माहौल तैयार किया जाए, जिस तरह के माहौल में कक्षा को ढलना चाहिए। ऐसी कक्षा जहाँ सीखने-सिखाने का और ज्ञान का निर्माण विद्यार्थियों द्वारा किया जाए और वे जो कुछ सीखें वह उन्हें अपना लगे। हम सिर्फ़ जहाँ ज़रूरी हो उन्हें सीखने में शुरुआती मदद के लिए कुछ निर्देश देंगे। इससे विद्यार्थी पुरजोश और मशग़ूल रहते हैं। उनके दिमाग़ को जानकारी याद करने और जवाब लिखने की बजाय लगातार लीक से हटकर सोचने में लगाया जाता है। कई विद्यार्थी गणित से जुड़ने से पहले ही उससे डरने लगते हैं। क्योंकि उनका माहौल बार-बार उनमें यही सोच बैठाता है कि यह विषय अपने आप में बहुत कठिन और डरावना है। और इसमें सिर्फ़ एक ही सही तरीक़ा होता है जो एकमेव सही जवाब तक ले जाता है। इसलिए, विद्यार्थियों पर सीधे ही गणित के प्रश्न थोपने की बजाय उन्हें पहले इस बारे में सोचना और बात करना शुरू करवाना मुझे ज़्यादा स्वाभाविक लगा।
फ़िल्म ‘डेड पोएट्स सोसायटी’ में रॉबिन विलियम्स के क़िरदार मिस्टर कीटिंग्स से प्रेरित होकर मैंने ऐसी कक्षा बनाने का इरादा किया, जो गहराई से सोचना और महसूस करना सीखे और हर दिन का पूरी तरह सदुपयोग करे। मैंने कक्षा-5 को लोकतंत्र को प्रतिबिम्बित करने वाली कक्षा बनाना तय किया। सबसे पहले, हमने मंत्रिमण्डल बनाया। प्रज्ञान मुख्यमंत्री थे, इप्सिता वाचन मंत्री। जब भी विद्यार्थी ज़ोर से वाचन करने में हिचकते, तो वे कक्षा को दो समूहों में बाँट देते और अपने साथियों की अगुवाई करते थे। कमरे में कोलाहल होता मगर मज़ा आता था। कक्षा साथियों की हौसला-अफ़ज़ाई और पुरजोश वाचन से गूँज रही होती थी। फिर, हमने विस्तार करके एक विधायी निकाय बनाया : कक्षा-5 लोकसभा बनी, कक्षा-4 राज्यसभा हुई, जिसमें शिक्षक पीठासीन अधिकारी थे। बहस हुई कि सिनेमा अच्छा है या बुरा। आख़िर में, फ़िल्मों को ज्ञान और नई-नई चीज़ों से रूबरू करवाने वाला स्रोत मानते हुए फ़िल्मों के पक्ष में सर्वसम्मत मतदान के साथ बहस समाप्त हुई।
आज का सवाल
सई निगम और स्वागत नाम के दो विद्यार्थियों को गणित बहुत पसन्द था। उन्हें ‘आज का सवाल मंत्री’ नियुक्त किया गया। उनका काम था कि वे स्कूल के ब्लैकबोर्ड पर हर रोज़ एक रोचक सवाल लिखेंगे। बाक़ी विद्यार्थी स्कूल के समय में इन्हें पढ़ व हल कर सकते थे। यह तय किया गया कि सवाल के समाधान पर चर्चा हर रोज़ स्कूल ख़त्म होने पर की जाएगी।

दोनों ‘मंत्रियों’ को ‘दिनकु खण्डिए अंका (रोज़ का एक सवाल)’ नाम की ओड़िया किताब दी गई, जिसके लेखक प्रो. चन्द्र किशोर महापात्र हैं। वे अपने समय में ओडिशा में ओलंपियाड प्रशिक्षक के तौर पर बहुत सक्रिय थे। उनकी किताब का गठन बहुत ही रोचक है। किताब में 12 अध्याय हैं, जिनमें से हर अध्याय एक महीने से जुड़ा हुआ है। हर अध्याय में 30, 31 या 28 सवाल हैं; यह संख्या उस महीने पर निर्भर करती है जिसके नाम पर अध्याय बनाया गया है। सभी सवालों के समाधान ख़ुद अध्ययन से समझ में आने लायक़ हैं और सवालों वाले अध्याय के बाद इनके जवाब दिए गए हैं। लेकिन मैंने यह साफ़ कर दिया था कि हमें सवाल का हल देखने से पहले कम-से-कम 30 मिनट से 1 घण्टे तक उस पर काम करना चाहिए। ‘आज का सवाल मंत्री’ की भूमिका के लिए विद्यार्थियों को चुनते समय उनकी ईमानदारी और निष्ठा मेरे लिए महत्त्वपूर्ण कसौटी थी। 23 जुलाई, 2025 को बोर्ड पर पहला सवाल लिखा गया, जो यह मशहूर समस्या थी ‘1 + 2 + 3 + 4……+ 97 + 98 + 99 + 100 = ?’; इसे प्रोफ़ेसर सी. के. महापात्र की एक अन्य किताब के कवर से लिया गया था।

ज़्यादातर विद्यार्थियों ने इस सवाल के हल होने की सम्भावना को ही ख़ारिज कर दिया। लेकिन तीन विद्यार्थी (सई सम्पूर्णा, प्रज्ञान और इप्सिता) इस सवाल पर काम करने में जुट गए। इससे भी महत्त्वपूर्ण यह था कि वे एक साथ मिलकर इस पर काम कर रहे थे। लोकतांत्रिक कक्षा-व्यवस्था में जिस तरह के आपसी सहयोग की मुझे उम्मीद थी, यह वैसा ही था। यहाँ तक कि मध्यान्तर में भी मैं उन्हें इस सवाल को हल करते हुए देख सकता था।
1 + 2 = 3
3 + 3 = 6
6 + 4 = 10
10 + 5 = 15
और इसी तरह आगे वे जोड़ लगाने लगे, जब तक कि वे गड़बड़ा नहीं गए। वे कभी एक संख्या को दो बार जोड़ने लगते तो कभी ग़लत योगफल प्राप्त करने लगते और तब उन्हें फिर से शुरू करने की ज़रूरत महसूस होती थी। स्कूल के बाक़ी शिक्षकों ने भी उन्हें इस सवाल को बार-बार हल करते हुए देखा। लगभग एक घण्टे बाद, जब मैं कक्षा–4 में पढ़ा रहा था, तो इन तीनों विद्यार्थियों ने सवाल के जवाब में 5050 का योगफल प्राप्त किया। उससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने सवाल का हल एक पेज पर लिखा, जिसे पाठकों की एक नज़र के लिए चित्र-5 में प्रस्तुत किया गया है।

इस समस्या का समाधान करने के लिए इन तीनों विद्यार्थियों की चरण-दर-चरण कोशिशों को कोई भी साफ़तौर से देख सकता है। क्या वे कार्ल फ़्रीड्रिक गाउस जितने होशियार हैं, जिन्होंने अपने स्कूल के दिनों में इस सवाल का एक मशहूर समाधान निकाला था? नहीं, कम-से-कम अभी तक तो नहीं। लेकिन क्या वे उन विद्यार्थियों से बेहतर हैं जो इन्तज़ार में रहे कि उन्हें इस सवाल को हल करने का तरीक़ा सिखाया जाएगा या जिन्हें ख़ुद इस सवाल को हल करने का मौक़ा न देकर गाउस पद्धति सिखा दी गई थी? मेरा मानना है कि यक़ीनन, वे तीन इन विद्यार्थियों से बेहतर हैं।
ज़ाहिर है, इसके बाद मैंने उन्हें और कक्षा के अन्य बच्चों को गाउस और उनके शिक्षक की कहानी सुनाई। आप सोचिए कि यह उन विद्यार्थियों के लिए कितना रोमांचक रहा होगा, जो पिछले एक घण्टे से उसी सवाल को हल करने में जुटे हुए थे। फिर मैंने उन्हें गाउस की तस्वीर दिखाई और मुझे यक़ीन है कि उन्होंने पहली बार आइंस्टाइन के अलावा किसी विदेशी गणितज्ञ/ वैज्ञानिक को देखा था; मुझे यक़ीन है कि यह पहली बार था जब उन्होंने गणित से जुड़ी कहानी सुनी थी, वह भी ऐसी जो कि वास्तविक थी। इसके बाद, मैंने उन्हें ‘सवाल को हल करने की कला’ का 2:49 मिनट का यूट्यूब वीडियो भी दिखाया, जिसमें रिचर्ड रस्ज़िक इसी सवाल को हल कर रहे थे। हमें उसी यूट्यूब चैनल पर सुझाए गए वीडियोज़ में 151 ‘प्री–एलजेब्रा वीडियोज़’[6] की प्लेलिस्ट भी मिली।

‘रोज़ का एक सवाल’ को कक्षा में रोज़ाना की प्रथा बना लिया जाए तो यह गणितीय सोच का अच्छा माहौल बना सकती है। ये सवाल भाँति-भाँति के हो सकते हैं और दुनिया भर की गणित प्रतियोगिताओं से उम्र के अनुसार उपयुक्त आधार पर लिए जा सकते हैं (मैंने आगे ‘सन्दर्भ’ में ऐसी कुछ प्रतियोगिताओं के लिंक दिए हैं)। ऐसे सवाल देना बच्चों के सीखने-समझने में मददगार होता है, जहाँ वे अपना समय लेते हुए उन सवालों को हल करने के अलग-अलग तरीक़े खोज पाएँ। उदाहरण के लिए, जिस तरह का सवाल चित्र-7 में दिखाया गया है, इसमें यदि वे देखें तो हर कॉलम में 1 व 0 की संख्या समान है और वह 2 के बराबर है, तो वे इस सवाल को आसानी से हल कर सकते हैं। लेकिन, यह भी हो सकता है कि विद्यार्थियों का एक समूह मिल-बैठकर सभी मुक़ाबलों का पूरा आरेख बनाए और इस तरह इस सवाल से बड़ा रचनात्मक नतीजा निकल सकता है। इस रवानी को बरक़रार रखते हुए आप मुक़ाबलों और प्रतियोगिताओं पर आधारित सवाल बनवा सकते हैं। हमें ऐसे सवालों से बचना चाहिए जो बहुत कठिन हों, क्योंकि इससे विद्यार्थियों की रुचि और उनका आत्मविश्वास दोनों कम हो जाएँगे। यदि वे इस तरह के ग़ैर-नियमित आसान सवालों को हल करना जारी रखेंगे, तो जल्दी ही वे कठिन सवालों को हल करना सीख जाएँगे, जो आमतौर पर सवालों के समाधान के दो-या-दो से ज़्यादा सरल विचारों का नतीजा होते हैं।

इसके साथ ही यह समझना ज़रूरी है कि ऐसे सवाल लेना बेहतर होगा जिनसे किसी तरह का पैटर्न बनता हो, या ऐसे सवाल जिनके एक से ज़्यादा जवाब हों। उदाहरण के लिए, विद्यार्थियों को \(n\) के बहुत छोटे मानों के लिए प्रश्न दें; उन्हें पहली \(n\) क्रमागत विषम संख्याओं को जोड़ने के लिए कहें। उन्हें जवाब में पैटर्न देखने के लिए प्रोत्साहित करें। जब वे यह समझ जाएँ कि सभी योग वर्ग संख्याएँ हैं, तो धीरे-धीरे उन्हें शतरंज के बोर्ड या ‘फ़ोर इन ए रो बोर्ड’ या ऐसा ही कोई खेल जो उपलब्ध हो, खिलाकर उनका मार्गदर्शन करें। इसमें उन्हें वक़्त तो लगेगा, लेकिन आपसे कुछ इशारे मिलते रहें तो वे ज्यामितीय रूप में पेश करने के इस अनुभव को जीवन भर याद रखेंगे। इस तरह के काफ़ी सवाल उपलब्ध हैं। आप शुरुआत के लिए, ‘एट राइट एंगल्स’ के मार्च 2025 अंक के ‘पुलआउट’ से, पद्मप्रिया शिराली के बहुत समृद्ध लेख ‘पैटर्न्स और पूर्व-बीजगणित’ से ऐसे सवाल ले सकते हैं।

आख़िरी मशविरा
ख़ुद से खोज करते हुए सीखने-सिखाने की शुरुआत धीमी रहती है, लेकिन यह तेज़ से तेज़तर होती जा सकती है। इस सवाल के हल के सिलसिले में मैंने जो क़िस्सा साझा किया है, वह भी अप्रैल की छुट्टियों में एक महीने से ज़्यादा समय तक चली कक्षाओं और गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुलने के कुछ दिनों बाद सामने आया था। उस समय हम बच्चों के साथ पूरी तरह से भाषा और सामाजिक अध्ययन पर काम कर रहे थे, ताकि गणित शुरू करने से पहले उनके सोचने-समझने के तौर-तरीक़े तैयार हो सकें।

हमारा मक़सद विद्यार्थियों को सीखने का तरीक़ा सिखाना है : इंटरनेट का इस्तेमाल कैसे करें, यू-ट्यूब की उपयोगी प्लेलिस्ट कैसे ढूँढ़ें और वीडियो से नोट्स कैसे लें। कौन जाने कि कक्षा-8 तक पहुँचते-पहुँचते वे आपको ऐसा लेख लिखकर दें जिसे वे ‘एट राइट एंगल्स’ जैसी किसी गणित पत्रिका में छपवाने के लिए भेजना चाहते हों। अन्त में, सीमोर पेपर्ट के शब्दों में :
“शिक्षक की भूमिका तैयार ज्ञान प्रदान करने के बजाय, आविष्कार के लिए परिस्थितियाँ बनाने की है।”
मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मेरे पिता भौतिकविज्ञानी हैं। उन्होंने मुझे इंटरनेट को बुद्धिमानी से इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया, मुझे शरलॉक होम्स की कहानियाँ सुनाईं और मेरे साथ ‘बायसिकल थीव्ज़’ जैसी फ़िल्में देखीं। जैसे-जैसे वक़्त बीता, मैं कूट-लेखन [cryptography] और कूट-संकेतों [codes] पर छोटी-छोटी जासूसी कहानियाँ लिखने लगा और उन्हें ‘स्टोन सूप’ जैसी पत्रिकाओं को भेजने लगा। मेरी रचनाएँ कभी छपी नहीं, लेकिन मुड़कर देखता हूँ तो यह मेरी सबसे मासूम और समृद्ध स्मृतियों में से एक है। असली काम बच्चों को गम्भीरता से लेना है, उन्हें परोसी गई जानकारियाँ जस-की-तस ग्रहण करने वाले शिक्षार्थियों के रूप में न देखकर, अपने ज्ञान के सक्रिय निर्माताओं के रूप में देखना है। बड़ा काम सिर्फ़ पढ़ाना नहीं है, बल्कि उन्हें रफ़्ता-रफ़्ता ख़ुद को पढ़ाना सिखाना है।
- Papert, S. (1980). Mindstorms: Children, Computers, and Powerful Ideas. Basic Books.
- LOGO Programming Language Wikipedia Page https://bit.ly/3J72v3f
- Weir, P. (Director). (1989). Dead Poets Society [Film]. Touchstone Pictures.
- Mahapatra, C. K. ଦିିନକୁୁ ଖଣ୍ଡିିଏ ଅଙ୍କ [One Problem A Day]. The Book Point.
- Art of Problem Solving: Sum the Numbers from 1 to 100. https://bit.ly/3Jgp2L1
- Pre-Algebra Playlist. Art of Problem Solving. https://bit.ly/4hjkyQa
- https://bit.ly/4hmPaAg
- Lenchner, George. Mathematical Olympiad contest problems for children. https://bit.ly/4nj8D6v
- Shirali, P. (2025, March). Patterns and Pre-Algebra. At Right Angles https://bit.ly/48BkEAy