गणित दिवस : एक बार फिर

एट राइट एंगल्स के सम्पादकों द्वारा संकलित

अनुवाद : जयजीत अकलेचा | पुनरीक्षण : प्रतिका गुप्ता | कॉपी एडिटर : अनुज उपाध्याय

दिसम्बर नज़दीक आते ही देश-भर के संस्थान श्रीनिवास रामानुजन की जयन्‍ती यानी 22 दिसम्बर या उसके आस-पास राष्ट्रीय गणित दिवस मनाने की तैयारियों में जुट जाते हैं। एट राइट एंगल्स की टीम ने सोचा कि क्यों न इस दिन होने वाले आयोजनों पर गणित के क्षेत्र से जुड़े विभिन्न लोगों से उनकी राय और सुझाव माँगे जाएँ।

हमने उनके सामने ये कुछ सवाल रखे :

  • क्या राष्ट्रीय गणित दिवस मनाने का विचार सार्थक है?
  • क्या आपको लगता है कि साल-भर होने वाली गणित की रोज़मर्रा की पढ़ाई पर इस तरह के आयोजनों का कोई प्रभाव पड़ता है?
  • क्या इस तरह के आयोजनों से जुड़ी आपकी कोई व्यक्तिगत यादें या दिलचस्प क़िस्से हैं?
  • क्या आपके पास ऐसे कोई सुझाव हैं, जिससे यह दिन और ज़्यादा सार्थक व प्रभावी बन सके?

इसके जवाब में हमें गणित क्षेत्र के कई शिक्षकों, शिक्षक-प्रशिक्षकों और विशेषज्ञों से प्रतिक्रियाएँ मिलीं। अधिकांश का मानना था कि गणित को समर्पित एक विशेष दिवस मनाना वाक़ई एक सराहनीय विचार है और इससे उन विद्यार्थियों में भी दिलचस्पी जगाई जा सकती है, जो सामान्यतः इस विषय से दूर भागते हैं।

जयश्री सुब्रमणियन कहती हैं कि स्कूल-कॉलेजों में गणित को अकसर परीक्षा के मद्देनज़र रखकर ही पढ़ाया जाता है और इसकी पढ़ाई रोज़मर्रा की नीरस दिनचर्या में फँसकर रह जाती है। ऐसे में इस एकरसता को तोड़ने और गणित के परीक्षा दायरे से इतर उसके किसी अन्य पहलू से विद्यार्थियों को रूबरू कराने वाला कोई भी अवसर न सिर्फ़ स्वागतयोग्य है, बल्कि अनिवार्य भी।

सौम्याश्री एन. जे. का भी मानना है कि राष्ट्रीय गणित दिवस मनाना एक अच्छी पहल है। यह गणित को लेकर विद्यार्थियों में फैले भय को, जो कि बहुत आम है, दूर करने का अवसर देता है। साथ ही यह गणित विषय में आनन्द, खोज और उद्देश्य को महसूस करने का मौक़ा देता है।

लेकिन आशीष गुप्ता आगाह करते हुए कहते हैं कि सिर्फ़ किसी एक दिन को त्योहार की तरह मनाने से कोई स्थायी बदलाव नहीं आ जाएगा। जैसे केवल एक दिन दिवाली मनाने भर से ऐसा नहीं होता कि अच्छाई हमेशा के लिए बुराई पर विजय पा ले, उसी तरह केवल राष्ट्रीय गणित दिवस मना लेने से हमारे स्कूलों में गणित शिक्षण की वास्तविकता अपने-आप नहीं बदल जाएगी। असल ज़रूरत इस बात की है कि हम ऐसे आयोजनों के मूल उद्देश्य को समझें।

इस तरह के आयोजन कब अधिक सार्थक और स्थायी प्रभाव डाल सकते हैं, आशीष इस पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं। उनके मुताबिक़ राष्ट्रीय गणित दिवस मनाने का बड़ा उद्देश्य यही है कि विद्यार्थी गणितीय संसार की पड़ताल करने और शिक्षक अपनी कक्षाओं को अधिक रोचक व आनन्ददायक बनाने के लिए प्रेरित हों, ताकि बच्चे इस विषय को हौव्वा न मानते हुए आगे बढ़ सकें। ऐसे आयोजन विद्यार्थियों व इस विषय से जुड़े लोगों में गणितीय सोच और समस्या-समाधान कौशल को बढ़ावा देने का एक अवसर भी देते हैं। गणित तथा रामानुजन जैसे गणितज्ञों के प्रति एक पूरा दिन समर्पित करके हम स्वीकार करते हैं कि यह विषय राष्ट्र की प्रगति के लिए तो महत्त्वपूर्ण है ही, साथ ही प्रत्येक व्यक्ति की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में भी मायने रखता है। यह दिन भारत की समृद्ध गणितीय विरासत, फिर चाहे वह शून्य से लेकर दशमलव पद्धति जैसी प्राचीन देन हो या आधुनिक उपलब्धियाँ, सभी को रेखांकित करता है। यह हमें याद दिलाता है कि गणित न केवल एक सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि भविष्य को आकार देने वाला महत्त्वपूर्ण औज़ार भी है। साथ ही यह शिक्षकों को प्रेरित करता है कि वे अपनी रोज़मर्रा की कक्षाओं में ऐसे तरीक़े अपनाएँ, जिनसे बच्चों में विश्लेषण क्षमता, तार्किक सोच और रचनात्मकता विकसित हो सके। हालाँकि यह बदलाव सिर्फ़ एक दिन में नहीं आ सकता। इसे गणित की प्रत्येक कक्षा में रोज़ाना की शिक्षण एवं प्रशिक्षण गतिविधियों का एक अभिन्न हिस्सा बनाना होगा।

नुज़हत अंजुम इस तरह के आयोजन को लेकर शिक्षकों के मन में उठने वाले कई तरह के सवाल साझा करती हैं :

  • जो बच्चे साल भर पढ़ाई करने पर भी नहीं सीख पाते हैं, वे क्या सिर्फ़ एक ही दिन में सीख जाएँगे?
  • हमें तो पढ़ाने का ही समय नहीं मिल पाता है, तो ऐसे कार्यक्रमों के लिए अतिरिक्त समय कहाँ से लाएँ?
  • हमारे पास इसकी कोई बुनियादी समझ नहीं है कि इसे हम आगे कैसे बढ़ाएँ?
  • मैं तो इस विषय का/ की शिक्षक/ शिक्षिका ही नहीं हूँ, तो मुझे यह सब क्यों करना चाहिए?
  • हमारे विद्यार्थियों को न संख्याओं का ज्ञान है और न बुनियादी संक्रियाओं का, तो ऐसे में हम क्या करें?
  • हमारे स्कूल के अन्य शिक्षकों को इसकी परवाह नहीं है, तो मैं अकेले ही इसके बारे में क्यों सोचूँ?

इन सारे सवालों के मुझे जो जवाब मिले, उनका निचोड़ यह था कि मैं एक शिक्षक/ शिक्षिका हूँ, और इसलिए :

  • मैं बच्चों की समझ को बेहतर बनाने के लिए अलग-अलग तरीक़े आज़माता/ आज़माती हूँ और गणित दिवस भी उन्हीं तरीक़ों में से एक है।
  • मैं बच्चों के लिए ऐसा समय तय करता/ करती हूँ, जिसमें वे विभिन्न टीएलएम के साथ खेल सकें और उनसे सीख सकें।
  • बच्चों को संख्या ज्ञान और बुनियादी संक्रियाओं की समझ देना मेरा काम है। बच्चे इस ज्ञान को आत्मसात कर सकें, इसके लिए मैं रोज़मर्रा के तरीक़ों के अलावा कुछ नए तरीक़े भी आज़माता/ आज़माती हूँ।
  • मैं उदाहरणों के साथ पढ़ाता/ पढ़ाती हूँ और कोई नया तरीक़ा आज़माने पर उससे मुझे ख़ुद भी सीखने का अवसर मिलता है।

कंचन कहती हैं कि यदि इस दिवस को किसी उद्देश्य के साथ मनाया जाए तो इससे शिक्षकों को यह विचार करने का मौक़ा मिलता है कि उनके विद्यार्थी कैसे सीखते हैं और उन्हें कहाँ-कहाँ कठिनाइयाँ या चुनौतियाँ पेश आती हैं। इस तरह के आयोजनों के बाद कक्षाओं में अकसर गणित की शिक्षण सामग्रियों का अच्छा संग्रह हो जाता है। कई स्कूलों में इस पूरी प्रक्रिया का असल नायक गणित किट होता है। जब ऐसे कार्यक्रमों के प्रति शिक्षक और विद्यार्थी पहले से जिज्ञासु हों या फिर उनका आयोजन केवल खानापूर्ति के लिए किया गया हो, दोनों ही स्थितियों में मैंने देखा है कि ये गणित किट विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को कुछ नया खोजने, समझने और उस पर विचार-मन्थन करने का अवसर देते हैं। इस प्रक्रिया में कई अवधारणाएँ जीवन्त होकर सामने आती हैं।

पते की बात : राष्ट्रीय गणित दिवस मनाने के उद्देश्य क्या हैं, हमें इसकी पूरी स्पष्ट समझ होनी चाहिए।

भारत में होने वाले गणित दिवस आयोजनों की झलक

जयश्री : जहाँ मैं पली-बढ़ी उस छोटे-से क़स्बे पलक्कड़ के मेरे कॉलेज में रामानुजन का जन्म शताब्दी वर्ष मनाए जाने की यादें आज भी मेरी स्मृतियों में ताज़ा हैं। उस समय मैं कक्षा 11वीं में थी। मेरे कॉलेज ने रामानुजन के व्यक्तित्व व कृतित्व पर क्विज़ और भाषण प्रतियोगिता आयोजित की थी। तब मुझे रामानुजन द्वारा किए गए कार्यों के बारे में ज़्यादा कुछ पता नहीं था। शायद मैंने इससे पहले उनका नाम भी नहीं सुना था। उस वक़्त मैं सोच भी नहीं सकती थी कि कोई ‘मैथ्स क्विज़’ भी हो सकती है। भला गणित में किस तरह के सवाल पूछे जा सकते हैं? मुझे याद है कि इस क्विज़ में भाग लेने पर पहली बार मैंने गणित को अपनी पाठ्यपुस्तकों से कुछ अलग हटके महसूस किया था। तब मेरे सामने ‘गणितज्ञ’ शब्द का एक अलग मतलब उजागर हुआ था। इससे पहले तक मेरे लिए गणितज्ञ वही थे, जिनके नाम मैंने अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़े थे, जैसे पाइथागोरस और यूक्लिड। कुम्भकोणम और चेन्नई ऐसी जगहें थीं, जहाँ मैं जा चुकी थी और मुझे एहसास हुआ कि कोई गणितज्ञ इन जगहों से भी हो सकता है। रामानुजन ने यहाँ के जिन स्कूलों और कॉलेजों से पढ़ाई की, वे अस्तित्व में थे और मेरे लिए इसके बड़े मायने थे। मुझे महसूस हुआ कि ‘गणितज्ञ’ होना कोई दूर की कौड़ी नहीं है।

जीवन के बाद के दिनों में मैं गुजरात के एक छोटे से क़स्बे में रही, जहाँ मेरे बच्चों की परवरिश हुई। जब आस-पास के बहुत से लोग सिर्फ़ कम्प्यूटर स्क्रीन पर द्वि-आयामी चेहरों में सिमट गए थे, तब मुझे याद है कि ‘पाई डे’ पर मेरे बच्चे कितनी दीवानगी के साथ ऑनलाइन सवाल हल किया करते थे। उस समय कोई ऑनलाइन प्रतिस्पर्धा हो रही थी, जिसकी जानकारी स्कूल ने अपने सभी विद्यार्थियों को दी थी। और फिर जिस उत्साह के साथ बच्चे रोज़मर्रा के अभ्यास (गणितीय गणनाएँ) में जुट गए थे, वह उत्साह देखने लायक था। वे चाहते थे अधिक-से-अधिक सवालों को हल करके वे अपने स्कूल के नाम को ‘लीडरबोर्ड’ पर सबसे आगे कर सकें! यह दो-तीन साल तक चला। मैं बच्चों में ‘प्रतिस्पर्धा की भावना’ का समर्थन नहीं कर रही हूँ और न ही इस बात के पक्ष में हूँ कि वे सदैव निरर्थक गणनाओं में उलझे रहें, लेकिन इस अनुभव के ज़रिए केवल यह बताना चाहती हूँ कि बच्चों ने इसे किस तरह एक ‘मिशन’ की तरह अपनाया। मेरा मानना है कि अगर कोई उत्सव इसी ऊर्जा को अधिक सार्थक व रोचक गतिविधियों की तरफ़ मोड़ सके, जिससे कि गणित के प्रति बच्चों में स्वाभाविक दिलचस्पी विकसित हो, तो यह अच्छा ही होगा।

मेरा मानना है कि किसी भी पहल का असर तभी दिखता है, जब वह छोटे-छोटे क़स्बों और गाँवों तक पहुँच सके। मैं इंटरनेशनल मैथमेटिक्स यूनियन (IMU) के ‘पाई डे’ उत्सव की भी सराहना करती हूँ, जहाँ सारी गतिविधियाँ एक निश्चित थीम के साथ आयोजित होती हैं। यहाँ आप अपनी छोटी-सी गतिविधि भी अन्य लोगों के साथ साझा कर सकते हैं और यह भी जान सकते हैं कि उन्होंने इस उत्सव को किस तरह मनाया। इस आदान-प्रदान से आपकी समझ और अधिक समृद्ध होती जाती है।

जी. जगदीश एक व्यावहारिक सुझाव देते हैं : यदि इसे संकुल (क्लस्टर) स्तर पर मनाया जाए और तालुक के सभी स्कूलों को इसमें शामिल किया जा सके तो यह काफ़ी प्रभावी साबित होगा।

करण सिंह का अनुभव इस तरह रहा : गत वर्ष 17 से 20 दिसम्बर, 2024 तक हमने रुद्रप्रयाग में प्राथमिक स्कूलों के 35 शिक्षकों की चार दिवसीय गणित टीएलएम निर्माण कार्यशाला आयोजित की थी। इसमें शिक्षकों ने विभिन्न गणितीय अवधारणाओं पर अपने-अपने टीएलएम तैयार किए। बाद में उन्‍हें डाइट रुद्रप्रयाग में आयोजित टीचर्स मेले में प्रदर्शित किया गया। आस-पास के उच्च प्राथमिक विद्यालयों व शासकीय इंटर कॉलेज के विद्यार्थी भी इस मेले में आए। उन्‍होंने शिक्षकों से बातचीत की और प्रत्येक टीएलएम के उपयोग के बारे में जानकारी ली। शिक्षकों ने विस्तार से अपनी अवधारणाएँ समझाईं और इस तरह विद्यार्थियों के लिए यह सीखने का एक शानदार अनुभव बन गया। कार्यशाला के आख़िर में हमने शिक्षकों को सलाह दी कि वे 22 दिसम्बर को अपने-अपने स्कूलों में राष्ट्रीय गणित दिवस मनाएँ और उसमें इस आयोजन की तस्वीरें व वीडियोज़ दिखाएँ। इस पहल को काफ़ी अच्छी प्रतिक्रियाएँ मिलीं और फ़ील्ड में इसे प्रभावी तरीक़े से लागू किया गया। यहाँ तक कि उत्तराखण्ड सरकार ने राष्ट्रीय गणित दिवस मनाने के लिए सभी स्कूलों को एक एडवाइज़री भी जारी की। इस आयोजन के लिए हमने अपनी तरफ़ से कुछ आइडियाज़, गतिविधियाँ और उपयोगी सामग्री साझा की। इस तरह, यह दिन आनन्द, रचनात्मकता और स्वतंत्रता के साथ गणित सीखने का अवसर बन गया। साथ ही, पूरे साल गणित की पढ़ाई किस तरह से होनी चाहिए, इसके लिए भी एक सकारात्मक माहौल तैयार हुआ।

पूजा दुमागा कहती हैं कि उन्हें पौड़ी में आयोजित गणित की एक डीआरजी (डिस्ट्रिक्ट रिसोर्स ग्रुप) कार्यशाला याद है, जिसमें कुछ चयनित डीआरजी सदस्य शामिल हुए थे। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय गणित दिवस के सन्दर्भ में प्राथमिक कक्षाओं में टीएलएम के उपयोग पर चर्चा करना था। इसकी फॉलोअप बैठक में 3-4 शिक्षक उनके द्वारा तैयार टीएलएम लाए और उन्होंने अपने अनुभव अन्य शिक्षकों के साथ साझा किए। एक शिक्षिका ने बताया कि पूर्णांकों के जोड़ और घटा को सिखाने के लिए वे किस तरह से संख्या-रेखा (नम्बर-लाइन) वाली स्केल का प्रभावी उपयोग करती हैं। एक अन्य शिक्षक ने बताया कि \(√{2}\) और \(√{3}\) की अवधारणाओं को समझाने के लिए उन्होंने कैसे एक व्यावहारिक उपकरण का इस्तेमाल किया। कार्यशाला के बाद 7 से 8 शिक्षकों ने अपने स्कूलों में बनाए गए मैथ्स कॉर्नर की तस्वीरें और वीडियोज़ साझा किए। कुछ शिक्षकों ने कट-आउट्स की मदद से गणितीय पहचानों को समझने का प्रयोग भी शुरू किया।

पते की बात : राष्ट्रीय गणित दिवस के आयोजन विशेष रूप से दूरस्थ क्षेत्रों में काफ़ी सार्थक हैं। ऐसे क्षेत्रों के स्कूल यदि मिलकर संयुक्त गतिविधियाँ आयोजित करें, तो न सिर्फ़ संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होगा, बल्कि अपने अनुभवों व सीखों का आदान-प्रदान करने के लिए वे साझा मंच भी बना सकेंगे।

सार्थक आयोजन के लिए सुझाव

पूजा : उक्त अनुभवों से मुझे यह समझ में आया कि कई तरह के टीएलएम पर चर्चा करने के बनिस्बत कुछ चुनिन्दा टीएलएम पर ही ध्यान देना और सही गणितीय भाषा का उपयोग कर उन्हें स्पष्ट रूप से समझाना ज़्यादा बेहतर रहेगा। इससे शिक्षक बग़ैर समझ-बूझ के महज़ खानापूर्ति के वास्ते टीएलएम बनाने की बजाय समग्र रूप से सोच पाएँगे।

पूजा ज़ोर देती हैं कि विद्यार्थियों को महान गणितज्ञों के जीवन और उनके कार्यों के बारे में ज़रूर बताया जाना चाहिए। इससे बच्चों में गणित के प्रति सराहना बढ़ती है और वे समझ पाते हैं कि यह अंकों या समीकरणों से भी आगे वास्तविक लोगों की कहानियों से जुड़ा एक जीवन्त विषय है।

ऐसी गतिविधियाँ जो बच्चे ख़ुद से करके सीखें, काफ़ी महत्त्वपूर्ण हैं। सद्दाम हुसैन बताते हैं कि पिछली बार चौथी-पाँचवीं व उससे ऊपर की कक्षाओं के बच्चों के साथ पेपर क्राफ्ट गतिविधियों की योजना बनाई गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि बच्चे दृश्यात्मक समझ विकसित कर परिकल्पनाएँ कर सकें। यह देखा गया है कि जब गणित दिवस पर बच्चों से ऐसी रोचक गतिविधियाँ करवाई जाती हैं, तो इसका असर बाद में भी शिक्षकों के पढ़ाने के तरीक़ों पर पड़ता है।

मोख़्तर ज़मान : हमारे स्कूल के बाल शोध मेले में हमने एक मैथमेटिक्स कॉर्नर बनाया था। वहाँ बच्चों ने पहेलियों को हल करने, नम्बर गेम्स खेलने और इसी तरह की अलग-अलग गतिविधियों में ख़ूब उत्साह से भाग लिया। मैंने पाया कि इसके बाद जब हमने नियमित कक्षाओं में पढ़ाई के दौरान मापन अध्याय में वज़न और ज्यामिति अध्याय में कोण के बारे में बताया तो उन्हीं विद्यार्थियों ने काफ़ी अधिक रुचि दिखाई।

बकौल मोख़्तर ज़मान, जब मैं छात्र था, उस वक़्त हमारे स्कूल में एक गणित प्रयोगशाला स्थापित की गई थी। हमसे कहा गया कि हम अपने छोटे-मोटे शोध कार्य भी यहाँ कर सकते हैं। उस समय हम सभी विद्यार्थी उलझन में थे और यह सोचकर आश्चर्यचकित भी कि ‘भला गणित में कोई शोध कैसे हो सकता है?’ लेकिन जल्दी ही हमारी जिज्ञासा उत्साह में बदल गई, जब हमसे अपने-अपने छोटे प्रोजेक्ट तैयार करने को कहा गया। मुझे आज भी याद है कि तब मैंने अपने प्रोजेक्ट के लिए बीजगणितीय सूत्र \((a + b)^{2}\) = \(a^2\) + \(b^2\) + \(2ab\) को चुना था। उस वक़्त मेरे घर में कुछ निर्माण कार्य चल रहा था। तो मैंने संगमरमर के एक टुकड़े पर दो वर्ग और दो आयत उकेरकर इस सूत्र को समझाया था। भले ही यह बेहद साधारण-सा आइडिया था, मगर मुझे ख़ुद पर बड़ा फ़क्र महसूस हो रहा था। बाद में जब सभी विद्यार्थियों ने अपने मॉडल जमा किए, तो 22 दिसम्बर को राष्ट्रीय गणित दिवस के अवसर पर एक प्रदर्शनी आयोजित की गई। यह पहला मौक़ा था, जब हमारे स्कूल में गणित दिवस मनाया गया और इसकी शुरुआत हमारे ही प्रोजेक्ट्स एवं रचनात्मकता से हुई थी।

सौम्याश्री कहती हैं कि इस दिवस को कई अलग-अलग तरीक़ों से मनाया जा सकता है। मुझे ऐसे ही एक ख़ास आयोजन की याद है, जब मैं शिक्षिका थी। मुझे हाईस्कूल के विद्यार्थियों के साथ गतिविधियों की योजना बनाने का अवसर मिला था। हमने अन्य शिक्षकों और अभिभावकों के साथ मिलकर एक ऐसा कार्यक्रम तैयार किया, जिसके आयोजन की पूरी ज़िम्मेदारी विद्यार्थियों को ही दी गई थी।

विद्यार्थियों ने सम्भाला था मोर्चा : कक्षा आठवीं से दसवीं तक के विद्यार्थियों ने छोटे बच्चों के प्रशिक्षण और मार्गदर्शन की ज़िम्मेदारी ली। एक समूह ने स्कूल की सड़क पर खड़े होकर यह जानने के लिए एक सरल सर्वे किया कि कितने बच्चे प्लास्टिक की बोतल लेकर स्कूल आते हैं। उन्होंने सारे आँकड़े एकत्रकर अपने निष्कर्ष स्कूल असेंबली के समक्ष पेश किए। आँकड़ों को एकत्र करने, उनको व्यवस्थित करने और फिर साझा करने की पूरी प्रकिया से उन्हें गणित के एक नए उद्देश्य का बोध हुआ। सबसे महत्त्वपूर्ण बात, उनके काम का सीधा असर भी हुआ : प्रधान अध्यापक ने स्कूल में ‘नो प्लास्टिक यूजेस वीक’ मनाने का निर्णय लिया। इससे विद्यार्थियों को समझ में आया कि गणित असल दुनिया के फ़ैसलों को प्रभावित कर समाज में सकारात्मक बदलाव भी ला सकता है।

साथ मिलकर सीखना : एक दूसरा समूह उन छोटे बच्चों के साथ जुड़ा, जिन्हें गणित में अकसर कठिनाई होती थी। हाईस्कूल के विद्यार्थियों ने क्षेत्रफल और परिधि जैसी अवधारणाओं को बेहद व्यावहारिक और सहज तरीक़ों से सिखाया। वे छोटे बच्‍चों और मापने वाली टेप को लेकर खेल के मैदान में गए। फिर ग्राफ़ पेपर का इस्तेमाल करके क्षेत्रफल निकालना सिखाया। इस तरह बड़े विद्यार्थियों ने इन अवधारणाओं को जीवन्त बनाकर सीखने की पूरी प्रक्रिया रोचक बना दी। इन सत्रों में अभिभावकों और शिक्षकों ने भी पूरा सहयोग किया। छोटे बच्‍चों को सारी बातें न केवल अच्छे से समझ में आईं, बल्कि गणित को लेकर उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा। बड़े विद्यार्थियों को धैर्य के साथ पढ़ाते और समझाते हुए देखना दिल को छू लेने वाला था। इसने गणित को एक सहभागी, सहायक और आनन्ददायक विषय बना दिया।

इस तरह के आयोजनों से क्या सीखने को मिलता है, इस बारे में नरेन्द्र कोठियाल कहते हैं : गणित को रोज़मर्रा के अनुभवों से जोड़ना ज़रूरी है। इसलिए असाइनमेंट्स भी ऐसे होने चाहिए, जो गणितीय अनुप्रयोगों से सीधे जुड़े हों।

ज़्यादातर विद्यार्थियों को मॉडल बनाना पसन्द होता है। बस ज़रूरत इस बात की है कि इसे कक्षाओं में पढ़ाई जाने वाली थ्योरियों के साथ अर्थपूर्ण तरीक़े से जोड़ा जाए, ताकि सीखने की गुणवत्ता बढ़ सके। उदाहरण के लिए, यदि एक सिलेंडर की त्रिज्या (रेडियस) कुछ बढ़ा दी जाए और दूसरे सिलेंडर की ऊँचाई भी उतनी ही बढ़ा दी जाए, तो उनके आयतन (वॉल्यूम) में क्या बदलाव आएगा? इस तरह के प्रश्न और गतिविधियाँ विद्यार्थियों की समझ व गणनात्मक क्षमता को गहराई देती हैं। इसे सुनिश्चित करने के लिए यहाँ कुछ प्रमुख तरीक़े दिए गए हैं :

  • विद्यार्थियों को उस विषय से जुड़े सवालों के लिए पहले से तैयार करना चाहिए, ताकि वे पूरे आत्मविश्वास के साथ उनका सामना कर सकें।
  • विद्यार्थियों को स्वतंत्र रूप से खोज-पड़ताल करने और समझने के लिए अधिक-से-अधिक अवसर दिए जाने चाहिए।
  • आयोजन के लिए विद्यार्थियों को तैयारी और उसकी रिहर्सल करनी चाहिए।
  • तैयारी के लिए विद्यार्थियों को पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।

कंचन इस पूरी चर्चा का सार इस तरह से पेश करती हैं : राष्ट्रीय गणित दिवस मनाना अच्छा है, लेकिन इसकी सार्थकता तभी है, जब यह केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसा माहौल बनाना है, जिसमें विद्यार्थी नई-नई पड़ताल करने, सवाल पूछने, ग़लतियाँ करने और मज़े-मज़े में गणित सीखने के लिए प्रेरित हो सकें। मैंने दोनों तरह के आयोजन देखे हैं। एक प्राथमिक कक्षा में बच्चे पज़ल्स हल करने व पैटर्न को पहचानने की प्रक्रिया के दौरान नए विचार सोचते हैं, गेम्स खेलते हैं, चुनौतियों का सामना करते हैं और यहाँ तक कि ग़लतियाँ भी करते हैं। वहीं, एक अन्य कक्षा में इसकी केवल खानापूर्ति की जाती है और इसके असल मक़सद से इसका कोई जुड़ाव नहीं रहता है। हालाँकि दोनों ही स्थितियों की सकारात्मक बात यह है कि इससे शिक्षक और विद्यार्थी अपनी रोज़मर्रा की दिनचर्या से बाहर निकलकर कुछ नया सोचने को प्रेरित ज़रूर होते हैं। पहले ही पढ़ाए जा चुके विषयों से अर्जित ज्ञान पर आधारित डिज़ाइनिंग प्रॉब्लम्स, पज़ल्स और गेम्स तैयार करना एक मज़ेदार व बिना दबाव वाला आकलन का तरीक़ा बन जाता है, जो शिक्षकों को यह जानने में मदद करता है कि बच्चे अवधारणाओं को कितना समझ पाए हैं। साथ ही यह विद्यार्थियों के लिए खेल-खेल में सीखने का अवसर भी बन जाता है।

पते की बात : सभी गतिविधियाँ पाठ्यक्रम से सम्बद्ध होनी चाहिए और साथ ही वे विद्यार्थियों को यह समझने में मदद करें कि किताबों में दिया गया विषय केवल लिखने-पढ़ने वाले अभ्यासों तक सीमित नहीं है।
यह दिवस न सिर्फ़ विद्यार्थियों के लिए, बल्कि शिक्षण की प्रभावशीलता को परखने के लिए भी एक अनौपचारिक आकलन का अवसर बन सकता है।
जब विद्यार्थियों को ज़िम्मेदारी दी जाती है, तो वे केवल गणित ही नहीं सीखते हैं, बल्कि इससे उन्हें अपने जीवन-कौशल को विकसित करने का भी मौक़ा मिलता है। यह आयोजन गणितज्ञों व उनके अनथक प्रयासों की कहानियों, गणित के अनुप्रयोगों के उदाहरणों और गणितीय सवालों को हल करने की ख़ुशी के ज़रिए बच्चों को प्रेरित करने का एक अवसर भी होता है।
हर कक्षा के अधिगम प्रतिफलों को ध्यान में रखते हुए जब ऐसे दिवस आयोजित होते हैं, तो स्कूली गणित शिक्षण की परिकल्पना कोई दूरवर्ती सपना नहीं रह जाती, बल्कि एक वास्तविक सम्भावना बन जाती है।

निष्कर्ष :

देश भर में गणित दिवस मनाने के लिए जो तैयारियाँ की जाती हैं और जिस स्तर पर विचार-विमर्श किया जाता है, उसे देखना सुखद था। यह दिवस पाठ्यक्रम को जीवन्त और सीखने-सिखाने को रोमांचक बनाने का अवसर होता है, बशर्ते ऐसे आयोजन के उद्देश्यों की समझ एकदम स्पष्ट हो। यह अलग-अलग क्षमताओं वाले विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर भी देता है और साथ ही उनकी व्यक्तिगत योग्यता व आत्मविश्वास को मज़बूत बनाने में भी मददगार होता है।

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