डेटा संग्रहण : उच्च प्राथमिक विद्यार्थियों द्वारा किया गया एक प्रयोग
कक्षा में सवाल पूछा गया था : “मैं एक लड़का हूँ और मेरा एक सहोदर है। वह लड़का है या लड़की?”
जब हमने कक्षा में पहली बार यह सवाल सुना, तो हममें से अधिकांश को लगा कि लड़का या लड़की होने की सम्भावना तो बराबर है।
लेकिन हमारी इस सोच की पुष्टि करने के लिए हमें आँकड़े जुटाने को कहा गया, ताकि देखा जा सके कि क्या हमारे संकलित आँकड़े भी इसी निष्कर्ष तक पहुँचते हैं। इस तरह हमने सांख्यिकी और गणित का इस्तेमाल किया। नीचे बताया गया है कि इस कार्य को अंजाम देते समय हममें से प्रत्येक ने किस प्रक्रिया का पालन किया।
व्यान : मैंने यह प्रयोग एक व्हाट्सएप पोल के ज़रिए किया। यह पोल ऐसे समूह में साझा किया गया, जिसमें 129 सदस्य लड़के थे और हर किसी का केवल एक ही सहोदर (लड़का या लड़की) था।
मुझे कुल 129 जवाब प्राप्त हुए। इनमें 94 ने बताया कि उनका सहोदर एक लड़की है। प्रायिकता की जो बुनियादी समझ मुझे थी, उसके आधार पर लड़के का सहोदर लड़की होने की सम्भावना 94/129 यानी लगभग 2/3 पाई गई।

अश्वत : मैंने अपनी माँ से हमारे उन पुरुष रिश्तेदारों की जानकारी देने को कहा, जिनका केवल एक ही सहोदर है। मैंने दो कॉलम बनाए। पहले कॉलम में लड़का-लड़की की जोड़ियाँ और दूसरे में लड़का-लड़का की जोड़ियाँ दर्ज कीं। मेरे द्वारा एकत्र किए गए आँकड़ों का परिणाम इस प्रकार रहा :
- 16 लड़का-लड़की/ लड़की-लड़का की जोड़ियाँ (अगर लड़का बड़ा है तो ‘लड़का-लड़की’ और लड़की बड़ी है तो ‘लड़की-लड़का’ की जोड़ी)
- 7 लड़का-लड़का की जोड़ियाँ

लड़का-लड़की/ लड़की-लड़का जोड़ियों का कुल जोड़ियों में अनुपात 16/23 यानी 2/3 पाया गया।
निधि : जब मेरे सामने यह सवाल आया तो मैंने बिना किसी डेटा को देखे यह मान लिया कि किसी व्यक्ति का सहोदर लड़का या लड़की होने की सम्भावना 50% होगी। यह जानने के लिए कि मेरी ये धारणा सही है या नहीं, मैंने अपनी हाउसिंग सोसायटी के कुछ पुरुषों और अपने स्कूल के कुछ लड़कों से पूछा कि क्या उनका सिर्फ़ एक ही सहोदर है और यदि हाँ, तो वह लड़का है या लड़की? जो आँकड़े सामने आए, वो मेरे अनुमान के बिल्कुल विपरीत थे। मैंने विभिन्न लोगों से जो आँकड़े एकत्र किए, उसका सार नीचे प्रस्तुत है।
चूँकि दोनों सहोदर में से एक तो लड़का है ही, इसलिए उत्तरदाताओं को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है :
- ऐसा लड़का, जिसका सहोदर भी लड़का है (लड़का-लड़का की जोड़ी)
- ऐसा लड़का, जिसकी सहोदर लड़की है (लड़का-लड़की की जोड़ी या लड़की-लड़का की जोड़ी)
मुझे जो आँकड़े मिले, वे इस प्रकार हैं :

लड़का-लड़की की जोड़ी/ कुल जोड़ियों की संख्या = 34/49 = 2/3
विनय : जैसी कि मुझे उम्मीद थी, अधिकांश विद्यार्थियों के लिए प्रासंगिक इस उदाहरण के ज़रिए डेटा संग्रह और डेटा प्रबन्धन दोनों ही रोचक बन गए। उनके लिए ये डेटा इकट्ठा करना मुश्किल नहीं था और इस प्रक्रिया में उन्हें आँकड़े एकत्र करने के अलग-अलग तरीक़ों और उनके विश्लेषण का प्रत्यक्ष अनुभव भी हुआ।
जब विद्यार्थियों के हाथों में निष्कर्ष आ गए, तो मैंने बातचीत को इस तरह से आगे बढ़ाया।मान लीजिए कि हमारे पास 100 सहोदर जोड़ियाँ हैं। तो चार प्रकार की जोड़ियाँ सम्भव हैं। सांख्यिकी के अनुसार हम कह सकते हैं कि प्रत्येक प्रकार की जोड़ी की सम्भावना 25% होगी।
मान लीजिए कि हमारे पास 100 सहोदर जोड़ियाँ हैं। तो चार प्रकार की जोड़ियाँ सम्भव हैं। सांख्यिकी के अनुसार हम कह सकते हैं कि प्रत्येक प्रकार की जोड़ी की सम्भावना 25% होगी।

यदि हम लड़का-लड़की की जोड़ियों को गिनते हैं, तो ऐसी कुल 50 जोड़ियाँ होंगी (25 जोड़ियाँ ऐसी होंगी, जिनमें लड़की बड़ी होगी और लड़का छोटा, जबकि 25 जोड़ियाँ ऐसी होंगी जिनमें लड़की छोटी होगी और लड़का बड़ा)।
लड़का-लड़का की जोड़ियाँ सिर्फ़ 25 होंगी। लड़की-लड़की की जोड़ियों का भी एक वर्ग है, लेकिन यहाँ हम इसे शामिल नहीं कर रहे, क्योंकि जोड़ियों में एक लड़के का होना अनिवार्य है। लिहाज़ा, यह साफ़ है कि लड़का-लड़का की जोड़ी के तुलना में लड़का-लड़की की जोड़ी की सम्भावना अधिक होगी।
P (लड़का-लड़की जोड़ी मिलने की सम्भावना) = 50/75 = 2/3
जब हमने अपने डेटा संग्रह अभ्यास के नतीजों को तर्क के आधार पर समझा, तो पाया कि किसी लड़के का सहोदर लड़का या लड़की होने की सम्भावना बराबर नहीं है। और अपने उस दोस्त के सवाल के जवाब में हमें कहना चाहिए था कि सहोदर एक लड़की होने की सम्भावना अधिक है, लड़का होने के!
हमने यह भी देखा कि सर्वेक्षण करने के लिए हर किसी ने अलग-अलग तरीक़ा अपनाया था।

हालाँकि इस सवाल को हल करने के लिए हम सबने अलग-अलग तरीक़े अपनाए, लेकिन सभी लगभग एक ही जवाब (यानी 2/3) पर पहुँचे। कुल मिलाकर, यह सवाल हम सभी के लिए बेहद रोचक था और जवाब एकदम चौंकाने वाला रहा। हमने शुरू में जो सोचा था, वह आख़िर में ग़लत साबित हुआ।
शिक्षक की टिप्पणियाँ
जब यह सवाल पूछा गया कि “मैं एक लड़का हूँ और मेरा एक सहोदर है। वह लड़का है या लड़की?” तो अधिकांश विद्यार्थियों को यह सवाल बेहद सीधा और साधारण लगा। सभी का सहज अनुमान यही था कि लड़का या लड़की होने की सम्भावना 50:50 यानी बराबर होगी। लेकिन यही सहज अनुमान बाद में चर्चा का विषय बन गया कि क्या वास्तव में यह सही है? और अगर नहीं, तो इसे कैसे परखा जा सकता है? चूँकि विद्यार्थियों ने अभी तक सापेक्ष प्रायिकता (conditional probability) का अध्ययन नहीं किया था, इसलिए उनके पास तर्क कम और अनुमान ज़्यादा थे। इसके बाद बातचीत दो निष्पक्ष सिक्कों (fair-coins) को एक साथ उछालने के उदाहरण की तरफ़ मुड़ गई। विद्यार्थी इस पर चर्चा करने लगे कि अगर पहले सिक्के पर चित (H) और दूसरे सिक्के पर पट (T) आए या पहले सिक्के पर पट (T) और दूसरे पर चित (H) आए, तो क्या ये दोनों स्थितियाँ एक जैसी मानी जाएँगी? विद्यार्थी इस बात से तो सहमत थे कि सिक्का उछालने में HT और TH दो अलग-अलग परिणाम सम्भावित होते हैं, लेकिन जब यही बात उन्होंने लड़का-लड़की के क्रम पर लागू करने की कोशिश की, तो दुविधा में पड़ गए। वे इस बात को लेकर पक्का नहीं थे कि ‘लड़का-लड़की’ और ‘लड़की-लड़का’ दो अलग-अलग सम्भावनाएँ मानी जानी चाहिए या एक।
चर्चा के आख़िर में कुछ विद्यार्थियों को तो यक़ीन हो गया था कि यदि एक बच्चा लड़का है, तो दूसरे बच्चे के लड़की होने की सम्भावना 2/3 रहेगी। लेकिन कक्षा के कुछ विद्यार्थी अब भी इससे सहमत नहीं थे। वे यह जानना चाहते थे कि क्या यह गणितीय निष्कर्ष वास्तविक जीवन में भी उतना ही सटीक साबित होगा। यही जिज्ञासा उन्हें एक और प्रयोग की ओर ले गई, ताकि वे ख़ुद यह जाँच सकें कि गणितीय उत्तर वास्तविक जीवन के आँकड़ों से मेल खाता है या नहीं।
इसके बाद विद्यार्थियों से कहा गया कि वे ख़ुद से आँकड़े एकत्रकर उनका विश्लेषण करें। इस बार उन्हें आँकड़ों के संग्रहण की प्रक्रिया के बारे में कोई दिशा-निर्देश या संकेत नहीं दिए गए। यह उनकी अपनी पसन्द पर निर्भर था कि वे किस तरह से आँकड़े जुटाते हैं। आँकड़ों के संग्रहण के बाद विद्यार्थियों ने एक-दूसरे की विधियों को देखकर मतदान किया और बताया कि किसका तरीक़ा दूसरे से बेहतर था। जैसे, किसी ने तर्क दिया कि व्हाट्सएप ग्रुप से जुटाए गए आँकड़ों पर उतना भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि ग्रुप के हर सदस्य को हम व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते हैं। वहीं किसी और ने कहा कि एक परिवार से आँकड़े जुटाने पर कुछ जैविक कारकों की वजह से किसी एक लिंग (लड़का या लड़की) की संख्या अधिक हो सकती है। इससे आँकड़ों में विसंगतियों की आशंका रह सकती है।
इन चर्चाओं से विद्यार्थियों को यह भी समझ में आया कि आँकड़ों के संग्रहण की प्रक्रिया कितनी जटिल हो सकती है और यदि हमें उन्हीं आँकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकालने हैं, तो कितनी सावधानी बरतनी चाहिए। गणित की कक्षाओं में आमतौर पर डेटा प्रस्तुति और डेटा प्रबन्धन पर ज़ोर दिया जाता है, लेकिन डेटा संग्रहण को भी एक शैक्षणिक गतिविधि के तौर पर शामिल किया जा सकता है। जब आँकड़ों के संग्रहण के बाद इस तरह की चर्चाएँ होती हैं, तो विद्यार्थी आलोचनात्मक सोच और मूल्यांकन के लिए प्रेरित होते हैं। सटीक एवं सार्थक आँकड़ों का संग्रहण तो इस प्रक्रिया का एक पहलू था ही, साथ ही प्रायिकता की बुनियादी समझ के ज़रिए तर्क की संरचना को समझना भी उतना ही ज़रूरी हिस्सा था।