नज़रिया : कोण को मापे कौन?

अनुवाद : हिमालय तहसीन । पुनरीक्षण : सुशील जोशी । कॉपी एडिटर : अनुज उपाध्‍याय

यहाँ कोणों के दो बहुत कम चर्चित पहलुओं की चर्चा की गई है जो दो अलग-अलग क्षेत्रों से सम्बन्धित हैं। पहला हिस्सा, सीधे ही मापन की समस्याओं में जाता है और दूसरा हिस्सा कोणों को मापने के वैकल्पिक तरीक़ों की चर्चा करता है। इस आलेख को पढ़ें, ताकि आप अपनी कक्षा में कोणों को मापने की ऐतिहासिक ज़रूरत एवं वास्तविक जीवन में उनके उपयोग मात्र से कुछ अधिक की चर्चा कर सकें। — सम्पादक

कोणों के औपचारिक अध्ययन के दौरान बच्चों को जो दिक्कत पेश आती है, उससे ऐसा लग सकता है कि कोण और वर्तन के माप से छोटे बच्चों का परिचय नहीं करवाना चाहिए। लेकिन, शुरुआती बाल्यावस्था की गणित की पढ़ाई के लक्ष्यों के तौर पर इन्हें शामिल करने के जायज़ कारण भी हैं। पहला, बच्चे अनौपचारिक तौर पर कोण और वर्तन के माप की तुलना कर सकते हैं और वे ऐसा करते भी हैं। दूसरा, निहित रूप में ही सही किन्तु, कोण के आकार का इस्तेमाल आकृतियों के साथ काम करने में आवश्यक है। उदाहरण के लिए, जो बच्चे एक वर्ग और एक अ-वर्ग समचतुर्भुज में फ़र्क़ करते हैं वे अपने सहज बोध के स्तर पर ही सही, लेकिन कोण के आकार के सम्बन्धों को पहचान रहे होते हैं। तीसरा, पूरी स्कूली शिक्षा के दौरान ज्यामिति में कोण का माप एक धुरी की भूमिका निभाता है और शुरुआत में ही इसकी नींव डालना पाठ्यचर्या का एक उपयुक्त लक्ष्य है। चौथा, शोध इस ओर इशारा करते हैं कि जहाँ प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा के दौरान बहुत कम प्रतिशत में बच्चे कोणों को बख़ूबी सीख पाते हैं, वहीं छोटे बच्चे इन अवधारणाओं को सफलतापूर्वक सीख लेते हैं। स्रोत : [1]

स्रोत [1] में और पढ़ने पर हम कोण के मापन में सीखने का मार्ग देख पाते हैं, जो अपने सहज बोध से कोण बनाने वाले बच्चे (2–3 वर्ष आयु) से शुरू होकर समझ के साथ कोण का उपयोग करने वाले (4–5 वर्ष), कोण का मिलान करने वाले (6 वर्ष), कोण के आकार की तुलना करने वाले (7 वर्ष) और कोण का माप करने वाले बच्चे (8+ वर्ष) तक जाता है।

यह आलेख कोण के मापन पर केन्द्रित है, जिसे ऊपर बताए गए सीखने के क्रम के अनुसार तीसरी कक्षा में सिखाया जाना चाहिए, किन्तु जो विद्यार्थियों के लिए अगले दो या तीन वर्षों तक भी मुश्किल बना रहता है।

अधिकतर वयस्कों के लिए कोण कोई कठिनाई नहीं पेश करते हैं। किसी भी कोण का एक शीर्ष होता है और दो भुजाएँ होती हैं, जो एक निश्चित अंश [degree] तक फैली होती हैं, जो कोण का ‘माप’ [measure] कहलाता है। इस अंश को चाँदा [protractor] नाम के एक सरल उपकरण का उपयोग कर मापा जा सकता है। यह परिभाषा कई पाठ्यपुस्तकों में मौजूद है। यह तो इतनी सरल अवधारणा प्रतीत होती है कि यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि इसे समझने में किसी को कठिनाई होगी। कार्यपुस्तिकाएँ एक या दो पन्नों में कोण का परिचय देती हैं और फ़ौरन ही कोण के रेखाचित्र बनाने और मापन और कोण के हिस्सों को नाम देने की ओर बढ़ चलती हैं। लेकिन, ज़रा विद्यार्थियों से एक उल्टे शंकु [inverted cone] का माप लेने को कहें — आप पाएँगे कि अधिकतर को चाँदा ठीक तरह से रखने में भी कठिनाई होगी। या फिर, भुजाओं की अलग-अलग लम्बाई वाले दो बराबर कोण दिखाकर पूछें कि इनमें से बड़ा कौन–सा है; अधिकतर उस कोण को बड़ा बताएँगे जिसकी भुजाओं की लम्बाई अधिक है। या फिर, चित्र–1 में दर्शाई गई स्थिति पर ध्यान दें, जहाँ विद्यार्थी को लगता है चाँदा पूरी आधार रेखा पर व्याप्त होना चाहिए।

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चित्र-1. 20° कोण या 40° कोण? कुछ छात्र इसे 40° कोण बताएँगे.

ऐसी भ्रान्त धारणाएँ क्यों बनती हैं? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि हम शुरुआत से ही बच्चों के दिमाग को शीर्ष [vertex], रेखाखण्ड [line segment], किरण [ray] जैसी शब्दावली से भर देते हैं और मापन से जुड़े व्यावहारिक कार्यों को नज़रअन्दाज़ कर देते हैं? तो जरा उठाइए चाँदा और ध्यान से देखिए। इस पर बनी रेखाओं और चिह्नों (घड़ी की सुई की दिशा में व विपरीत [दक्षिणावर्त व वामावर्त]) और इस पर लिखी हुई संख्याओं के अम्बार के साथ इसे इस्तेमाल करना क्या वाक़ई इतना आसान है? सच कहें तो, यह किसी चमत्कार से कम नहीं है कि बच्चे इसका इस्तेमाल करना सीख जाते हैं!

इस आलेख में हम सीखने वाले छोटे बच्चों का कोणों से परिचय करवाने के लिए कड़ी-दर-कड़ी कुछ सुझाव पेश करेंगे। यह इस विश्वास से प्रेरित है कि जो चीज़ बच्चों के ठोस संसार से सम्बन्धित होगी उसका अधिगम परिणाम कहीं बेहतर होगा।

कोणों के साथ खेल-खिलवाड़ कोणों को दो नज़रियों से परिभाषित किया गया है — एक बिन्दु से निकलती दो किरणों से बनी ‘आकृति’ के रूप में अथवा ‘घूर्णन’ या ‘वर्तन’ की तरह। कभी-कभी विद्यार्थी सोचते हैं कि ये अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। कोणों से जुड़ी गतिविधियों में दोनों ही अभिप्रायों को शामिल करना चाहिए ताकि विद्यार्थी कोण शब्द के अन्तर्निहित अर्थ को समझ सकें।

काग़ज़ के एक वृत्त को चौथाई हिस्सों में तह करके (किनारे गोलाकार रहेंगे) शिक्षक यह दर्शा सकते हैं कि समकोण कैसे बनाया जाता है। विद्यार्थी इसे अलग-अलग कोणों की सीध में बिठाकर यह समझ सकते हैं कि दो कोणों की सही तरीक़े से तुलना कैसे की जाए (चित्र–2)। यह साधन चाँदे के एक शुरुआती रूप की तरह भी काम में लिया जा सकता है। इसी आकृति को मोड़कर या खोलकर छोटे या बड़े कोण बनाए जा सकते हैं। इसके बाद, ‘न्यून’ [acute] और ‘अधिक’ [obtuse] शब्दों से परिचय करवाना तो महज सम्बन्ध बैठाने का काम है।

चित्र-2

तह की हुई इस आकृति का एक रोचक उपयोग भुजा की लम्बाई के साथ कोण की अपरिवर्तनीयता को दर्शाने में किया जा सकता है; यह एक ऐसी अवधारणा है जिससे कभी-कभी उच्च प्राथमिक स्तर के विद्यार्थी भी जूझते पाए जाते हैं। काग़ज़ को शीर्ष से पकड़िए और फाड़ दीजिए (चित्र-3)। इति सिद्धम!

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चित्र-3

एक अन्य तरीक़ा एक डोरी और दो स्ट्रॉ उपयोग करने का है (चित्र-4)। इसमें स्ट्रॉ को भुजाओं के साथ में आगे–पीछे करते हुए न केवल भुजा की लम्बाई से कोण की अपरिवर्तनीयता को दर्शाया जा सकता है, बल्कि शीर्ष दिखाई न देने के बावजूद महज ‘कल्पना में’ कोण बन जाने की धारणा को भी दर्शा सकते हैं। त्रिकोणमिति में ‘ऊँचाइयाँ एवं दूरियाँ’ विषय को पढ़ते हुए कक्षा 9 और 10 के विद्यार्थी इस समस्या का सामना करते हैं।

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चित्र-4

क्या आपकी कक्षा में गति-संवेदी सीखने वाले विद्यार्थी हैं? यदि ऐसा है तो उन्हें कोण की धारणा का परिचय ‘कोण योगा’ के खेल से करवाइए। एक हाथ को स्थिर करके शून्य की स्थिति से शुरू करते हुए ‘सम’ [Right], ‘न्यून’ [Acute] और ‘अधिक’ [Obtuse] पुकारिए और दूसरे हाथ को उसके अनुसार ले जाइए। जब बच्चे यह करते हैं तो उन्हें कई बातें समझ में आती हैं, उदाहरण के लिए, हाथों की लम्बाई अलग-अलग होने के बावजूद सभी बच्चे समान कोण प्रदर्शित कर सकते हैं; न्यून और अधिक कोणों के लिए कई सही कोण हो सकते हैं; स्थिर भुजा का आड़ा [क्षैतिज] या खड़ा [लम्बवत] होना आवश्यक नहीं है; कोणों का अभिविन्यास अलग तरह से किया जा सकता है। सबसे महत्त्वपूर्ण तो यह कि वे कोण बनाने के लिए अपने हाथों का उपयोग करके अन्दाज़ लगाने की कला सीखते हैं।

घूर्णन को मापने का एक रोचक तरीक़ा कक्षा के दरवाज़े का इस्तेमाल है (चित्र-5)। शिक्षक ज़मीन पर 15-15° या 30-30° के अन्तराल पर 0° से 90° का कोण चिह्नित कर देते हैं। यह स्वयं सीखने का साधन बन जाता है; बच्चे इसके साथ अन्तर्क्रिया करते हुए सीखते हैं। हो सकता है कि उन्हें तुरन्त ही समझ में न आए कि अंश के चिह्न का क्या मतलब है या क्यों कहीं-कहीं चिह्न नहीं बनाए गए हैं। कुछ को यह जिज्ञासा भी हो सकती है कि यदि दरवाज़ा और ज़्यादा खुले तो क्या हो : तब भला कोण का मापन कैसे किया जाए?

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चित्र-5. स्रोत: http://business.outlookindia.com/printarticle.aspx?267253

(इससे मुझे एक विचार आता है कि चाँदे को धातु की एक पतली पत्ती से क्यों नहीं बनाया जाता है, जो एक धुरी पर घूमे और 0° से 180° तक खुल जाए?)

इस पड़ाव पर शीर्ष, रेखा खण्ड और किरण जैसी शब्दावली से परिचय कराया जा सकता है। चूँकि विद्यार्थी इकाई की पुनरावृत्ति का उपयोग करके लम्बाई का माप करने से परिचित हैं, तो मापन की इकाई के रूप में अंश उनके लिए स्वीकार्य होना चाहिए। घूर्णन की अवधारणा को समझने में विद्यार्थियों के लिए जीओजेब्रा [GeoGebra] एक बेहतरीन साधन हो सकता है।

कोणों को मापने के विभिन्न तरीक़े

अब, जबकि विद्यार्थियों ने चाँदे का उपयोग करके कोण मापना सीख लिया है तो वे कोण मापने के अन्य तरीक़ों और उनके फ़ायदे व नुक़सान की जाँच–पड़ताल कर सकते हैं।

मुमकिन है कि प्राचीन ज्यामितिज्ञ भुजाओं के बीच एक निश्चित दूरी पर एक रेखीय खण्ड को जमाकर कोणों का माप करते हों? आइए, देखें कि इससे हम क्या पाते हैं।

माना कि, ∡AOB को मापने के लिए हम शीर्ष से 1 इकाई की दूरी पर, प्रत्येक भुजा पर क्रमशः बिन्दु CD चिह्नित करते हैं, और खण्ड CD खींचते हैं। तब CD की लम्बाई ∡AOB का माप मानी जाएगी (चित्र–6)। हम इसे कोणों को मापने की जीवा विधि [chord method] कहते हैं।

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चित्र-6. यहाँ OC=OD=OD’.
यदि CD’ > CD तो ∡AOB′ > ∡AOB′ और ऐसा ही इसके विपरीत भी होगा।

यह पद्धति क्रम सम्बन्ध [order relation] को बनाए रखती है और इसे जाँचा जा सकता है। दूसरे शब्दों में, यदि ∡AOB < ∡AOB’ तो CD < CD’ होगा; और ऐसा ही इसके विपरीत भी होगा। यह देखने के लिए कि ऐसा क्यों है, हम यहाँ ‘भुजा–कोण–भुजा सर्वांगसम प्रमेय के असमान रूप’ (हम केवल समद्विबाहु त्रिभुजों [isosceles triangles] पर लागू होने वाले रूप को ही लेंगे क्योंकि हमें केवल उसी की आवश्यकता है) को लागू करेंगे, जो यह कहती है : माना कि ∆ABC और ∆PQR समद्विबाहु हैं, जहाँ AB = AC = PQ = PR है। ऐसे में : यदि ∡A < ∡P, तो BC < QR; और यदि BC < QR तो ∡A < ∡P। . इसे विशुद्ध ज्यामिति का उपयोग करके साबित किया जा सकता है, लेकिन हम इसका प्रमाण आप पर छोड़ते हैं। (हो सकता है कि कुछ पाठकों को आगे दिया गया त्रिकोणमितीय प्रमाण अधिक भाए। एक समद्विभुज ∆ABC में जहाँ b = c हो, तो a = 2b sin A/2 होगा। चूँकि b स्थिर है और sinx 0° से 90° तक के अन्तराल में x का एक बढ़ता हुआ फलन [increasing function] है, तो इस प्रकार जब ∡A 0° से 180° को बढ़ेगा है तब a भी बढ़ेगा; और इसके विपरीत भी यही होगा। यही निष्कर्ष तब भी प्राप्त होगा यदि हम कोज्या [cosine] नियम का उपयोग करें, जो यह परिणाम देगा : a2 = 2b2 (1−cos ⁡A) , लेकिन अब हम इस तथ्य का उपयोग करते हैं कि cosx 0° से 180° तक के अन्तराल में x का एक घटता फलन [decreasing function] है।)

अतः कोणों को मापने की जीवा विधि क्रम सम्बन्ध को बनाए रखती है। किन्तु यह दूसरे परीक्षण में विफल साबित होती है, जो कि उतना ही महत्त्वपूर्ण है : योज्यता [additivity]। इसे देखने के लिए कि यह क्या है, आसन्न कोणों ∡AOB और ∡BOC के युग्म को लें, OB साझा भुजा है (चित्र–7)। चूँकि ∡AOC ∡AOB∡BOC का सम्मिलन है और उन दो कोणों के बीच कोई अतिव्यापन नहीं है, तो यह मानना उचित ही होगा कि ∡AOC को ∡AOB∡BOC के माप के योग के बराबर होना चाहिए। किन्तु, क्या यह अपेक्षा जीवा विधि पर खरी उतरती है?

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चित्र-7

माना कि, OA, OB, OC किरणों पर D, E, F बिन्दु हैं, जो कि OD = OE = OF = 1 इकाई है। परिभाषा के अनुसार, ∡AOB, ∡BOC∡AOC की जीवा माप क्रमशः DE, EFDF लम्बाइयाँ होंगी। क्या यह सही है कि DE + EF = DF होगा? स्पष्ट है कि ऐसा नहीं है। दरअसल, हमें हमेशा DE + EF > DF प्राप्त होगा क्योंकि किसी भी त्रिभुज की दो भुजाएँ मिलकर तीसरी भुजा से बड़ी ही होंगी (यहाँ ∆DEF पर लागू)। अतः, ∡AOB∡BOC का योग ∡AOC से अधिक है। इस तार्किकता से हम पाते हैं कि किसी कोण का जीवा माप योज्यता के परीक्षण में विफल साबित होता है।

(नोट : उपर्युक्त तर्क यह मानकर किया गया है कि चित्र–7 में दर्शाए गए D, E, F एक सरल रेखा पर स्थित नहीं हैं। लेकिन हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि वे एक सरल रेखा पर स्थित नहीं हैं? यदि हम इसका कोई औचित्य प्रदान नहीं करते हैं तो हमने जो कहा है वह अधूरा रह जाता है। पाठकों से आग्रह है कि इसका प्रमाण वे स्वयं प्राप्त करें।)

हमें नहीं पता कि प्राचीन ज्यामितिज्ञ कोण के मापन में जीवा की लम्बाई का उपयोग करते थे या नहीं। वे जो मापन विधि इस्तेमाल करते थे वह वही है जो हम वर्तमान में उपयोग करते हैं और इसमें अपेक्षित दोनों ही गुणधर्म हैं — क्रम सम्बन्ध और योज्यता का गुण। यह चाप की लम्बाई [arc length] पर आधारित है। इसमें, दिए गए ∡AOB पर हम शीर्ष से 1 इकाई की दूरी पर, प्रत्येक भुजा पर क्रमशः बिन्दु CD चिह्नित करते हैं और एक वृत्त बनाते हैं जिसका केन्द्र O है और जो CD से होकर गुजरता है। तब, चाप CD की लम्बाई ∡AOB का माप मानी जाती है (चित्र–8)।

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चित्र-8

आइए, देखें कि यह परिभाषा योज्यता का क्या करती है। चित्र–9 में हम देखते हैं कि ∡AOB व ∡BOC की साझी भुजा OB है। जैसा कि चित्र–7 में दिखाया गया है, दोनों कोण एक–दूसरे पर अतिव्याप्त नहीं हैं। उनकी चाप का माप चाप DE व EF की लम्बाई है और ये दोनों ही उस वृत्त का हिस्सा हैं जिसकी त्रिज्या 1 इकाई है और जिसका केन्द्र O है। ∡AOC की चाप की माप इकलौते चाप DF की लम्बाई है। क्या चाप DF की लम्बाई चाप DE और EF की लम्बाइयों के योग के बराबर होगी? स्पष्ट है कि ऐसा ही होगा, क्योंकि सभी चाप एक ही वृत्त के हिस्से हैं और चाप DF ऐसी दो छोटी चापों का सम्मिलन ही तो है जो एक–दूसरे पर अतिव्यापन नहीं करती हैं।

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चित्र-9

जीवा माप की तुलना में किसी कोण का चाप से माप बहुत स्वाभाविक तो नहीं है, लेकिन और गहराई से अध्ययन करने पर हम इसकी सुगढ़ता और लाभों को पहचानने लगेंगे।

निष्कर्ष में हम कह सकते हैं कि परिभाषाओं का निर्माण, उनकी व्याख्या और उनमें कमियों या अन्तर की पहचान करना, यह सभी सीखने–सिखाने के अवसर हैं, जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी बेहतर समझ बनाने के लिए मिलकर काम कर सकते हैं। जब हम परिभाषाओं को आज़माते हैं और उनकी अपर्याप्तता को देखते हैं, तब हम मौजूदा परिभाषाओं की किफ़ायत और ख़ूबसूरती को पहचानने लगते हैं।

आभार

यह आलेख विभिन्न मंचों पर कई गहन और दिलचस्प विचार–विमर्श का नतीजा है। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के विश्वविद्यालय स्रोत केन्द्र में गणित की स्रोत व्यक्ति अनुपमा ने एक सेमीनार में ‘कोण [Angles]’ पर परचा प्रस्तुत किया। इसके बाद ऑनलाइन मैथ लर्निंग ग्रुप में एक सजीव बहस छिड़ी जो कोणों को लेकर विद्यार्थियों में व्याप्त भ्रान्तियों और शिक्षकों द्वारा उन्हें दूर करने के तरीक़ों पर केन्द्रित थी। मैथ लर्निंग ग्रुप इस चर्चा में डॉ.रवि सुब्रमण्यम (एचबीसीएसई), डॉ. शैलेष शिराली (कोमैक), डॉ. हृदय कान्त दीवान (विद्या भवन सोसायटी), रामचन्द्र कृष्णमूर्ति (अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय), राजवीर सांघा और ज्योति त्यागराजन के योगदान के लिए उनका आभार प्रकट करता है।

  1. From Learning and Teaching Early Math —The Learning Trajectories Approach Studies in Mathematical Thinking, by Clements and Sarama

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