अमूर्त अवधारणाओं से व्यावहारिक उपयोग तक : ज्यामिति का एक अनुभव
यह लेख अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के एमए एजुकेशन कार्यक्रम के तहत अक्टूबर से नवम्बर 2022 के बीच ग्रामीण राजस्थान के एक सरकारी स्कूल में मेरी फ़ील्ड प्रैक्टिस के दौरान पढ़ाने के अनुभवों पर आधारित है। फ़ील्ड में हुए अनुभव से मुझे बच्चों को होने वाली कठिनाइयों,विशेषकर गणितीय अवधारणाओं में, को समझने में मदद मिली। बच्चे अलग-अलग दिशाओं में खुले हुए कोणों (angles) को समझने में और उन्हें मापने में जिन चुनौतियों का सामना कर रहे थे, मैंने उनका अवलोकन किया और उन्हें दूर करने की कोशिश की। वहाँ ठोस सामग्रियों का अभाव था, जो ज्यामिति सीखने-सिखाने के लिए बहुत ज़रूरी होती हैं। यहाँ पाठ्यपुस्तकों को ही पढ़ाने के एक मात्र संसाधन के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था। इन समस्याओं को दूर करने के लिए सीखने-सिखाने के जिन कुछ तरीक़ों को आज़माया गया और जिन्हें प्रभावी पाया गया, उनकी चर्चा यहाँ की गई है।
बच्चे ज्यामिति कैसे सीखते हैं?
ज्यामिति के माध्यम से बच्चों में कल्पना करने तथा उन तत्वों को पहचानने की शक्ति विकसित होती है जो दिखाई नहीं पड़ते हैं, वस्तुओं को गतिशील/परिवर्ती रूप में देखने तथा तथ्यों को पहचानने और विभिन्न ज्यामितीय आकारों के बीच सम्बन्धों को समझने की क्षमता विकसित होती है (Johnston-Wilder, 2005)। पियरे और डीना वैन हीले के सिद्धान्त के अनुसार, बच्चों में ज्यामितीय चिन्तन चरण-दर-चरण विकसित होता है (van Hiele, 1986)। शुरुआत में बच्चे किसी आकृति को उसके बाहरी रूप से पहचानते हैं, फिर वे उन आकृतियों के विशिष्ट गुणों की पहचान करना सीखते हैं। इसके बाद वे इन विशिष्ट गुणों के बीच सम्बन्ध स्थापित करते हैं और अतिरिक्त गुणों का अन्दाज़ा लगाते हैं। आख़िर में, बच्चे औपचारिक गणितीय तरीक़े से तर्क करना सीखते हैं। तालिका-1 वैन हीले के ज्यामिति सीखने के चरणों के बारे में बताती है।
तालिका-1
| चरण | नाम | वर्णन | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| 1 | दृश्य स्तर पर | बच्चे बुनियादी आकृतियों को उनके बाहरी स्वरूप से पहचानते हैं और उन्हें नाम देते हैं। | इस चरण पर कोई बच्चा किसी आयत को उसके बाहरी रूप से पहचानेगा। |
| 2 | विवरणात्मक स्तर | बच्चे बुनियादी आकृतियों की ख़ासियतों को पहचानते हैं और उनका वर्णन कर सकते हैं। | कोई बच्चा किसी आयत को एक ऐसी आकृति के रूप में पहचान पाएगा, जिसकी आमने-सामने वाली भुजाएँ (opposite sides) बराबर होती हैं और सभी कोण समकोण (right angles) होते हैं। |
| 3 | अमूर्त स्तर | बच्चे आकृतियों के विशिष्ट गुणों के बीच में सम्बन्ध स्थापित करना शुरू कर देते हैं। | एक वर्ग को एक आयत के रूप में देखा जा सकता है क्योंकि इसे अतिरिक्त विशेषताओं वाला एक आयत माना जा सकता है। |
| 4 | औपचारिक निगमन | बच्चे अपने ख़ुद के प्रमाण बनाते हैं जिसमें उनके निष्कर्ष को तार्किक रूप से सही साबित करने वाले कथनों की शृंखला होती है। | कोई बच्चा यह साबित कर पाएगा कि किसी समानान्तर चतुर्भुज (parallelogram) के विकर्ण (diagonal) इसे दो सर्वांगसम त्रिभुजों (congruent triangles) में बाँटते हैं और चरणों को तर्क के साथ प्रमाणित कर सकेगा। |
| 5 | सावधानी और बारीकी से कुछ करना | विद्यार्थी विभिन्न स्वयंसिद्ध प्रणालियों (postulate systems) में प्रमेय (theorems) स्थापित करते हैं और इन प्रणालियों का विश्लेषण/तुलना करते हैं। | विद्यार्थी साबित कर सकेगा कि किसी चतुर्भुज (quadrilateral) को बनाने के लिए आवश्यक और पर्याप्त शर्तें क्या होती हैं। |
कोणों को पढ़ाने का मेरा अनुभव
मैंने सातवीं के 35 बच्चों की एक कक्षा में 40 मिनट के 25 से ज़्यादा सत्र लिए। यह स्कूल राजस्थान के सिरोही ज़िले के पालड़ी-एम का महात्मा गाँधी सरकारी स्कूल था। कोणों की परिभाषा, उनके प्रकार जैसे कि अधिक कोण, चाँदे का इस्तेमाल करके कोणों को मापना और उन्हें बनाना बच्चों को पहले ही सिखाया जा चुका था। शुरुआती दिनों में मेरे ये अवलोकन रहे-:
- 25 प्रतिशत बच्चों को विभिन्न दिशाओं में खुले हुए (या विभिन्न स्थितियों में रखे हुए) कोणों को समझने में कठिनाई हो रही थी।
- 70 प्रतिशत बच्चों को चाँदे (protractor) का इस्तेमाल करके कोणों को मापने में मुश्किल हो रही थी।
- 5 बच्चे ऐसे पाए गए, जिन्हें कक्षा में काग़ज़-क़लम का काम करने में रुचि नहीं थी।
- बच्चों को कोण पढ़ाने के लिए सीखने-सिखाने की किसी सामग्री (टीएलएम) का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा था।
जिन शिक्षाशास्त्रीय पद्धतियों को आज़माया गया
बच्चे जिन कठिनाइयों का सामना कर रहे थे, उन्हें दूर करने के लिए कुछ शिक्षाशास्त्रीय पद्धतियों का इस्तेमाल किया गया। इनमें ठोस सामग्रियों का इस्तेमाल और पाठ्यपुस्तक में दी गई गतिविधियों और अभ्यास का विस्तार शामिल था। इन तरीक़ों से कोण को दर्शाने, कोण को मापने, कोण के युग्मों जैसे पूरक और सम्पूरक कोणों (complementary and supplementary angles) और समानान्तर रेखाओं के एक युग्म को किसी तिर्यक रेखा (transversal) के द्वारा काटे जाने पर बनने वाले कोणों के युग्मों के बारे में प्रभावी तरीक़े से सिखाने में मदद मिली।
a. सीखने-सिखाने की सामग्रियों (टीएलएम) का इस्तेमाल करना
टीएलएम गणित की अमूर्त अवधारणाओं को समझने में बच्चों की मदद के लिए कारगर साबित हो सकते हैं। छोटे बच्चों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हर जगह कोण (कोने) दिखाई देने के बावजूद भी कोणों को गणितीय रूप में दर्शाना सीखना उनके लिए आसान नहीं होता (Watson, 2013)। कक्षा में आज़माई गई कुछ सामग्रियाँ के बारे में आगे दिया गया है, इनमें से अधिकतर अख़बार जैसी जुगाड़ू या दोबारा इस्तेमाल की जा सकने वाली सामग्रियों से बनी थीं।
काग़ज़ के पंखे
हमारा शिक्षण अधिकतर समय दो रेखाओं/रेखा खण्डों के एक-दूसरे को काटने से बनने वाले कोणों पर केन्द्रित होता है। इस बात के प्रमाण हैं कि बच्चे अन्य सन्दर्भों की तुलना में गति करने (या घुमाने) वाले सन्दर्भ में कोण को ज़्यादा जानते हैं और इस सन्दर्भ में गणित के बारे में अपेक्षाकृत ज़्यादा आसानी से सीखते हैं (Nunes, 2009)।

आइसक्रीम की डण्डियों और अख़बारों का इस्तेमाल करके काग़ज़ के पंखे (चित्र-1) बनाए गए और इनका इस्तेमाल गति करने या घुमाने के सन्दर्भ में कोण दर्शाने के लिए किया गया। बच्चों ने 5 सदस्यों वाले समूहों में गतिविधि की। उनसे यह पूछा गया कि पंखे का इस्तेमाल करते समय उन्होंने क्या देखा। उन्होंने अलग-अलग प्रकार के कोण बनाए और उनका वर्णन किया। “यह 90° से ज़्यादा है और यह एक अधिक कोण है।”
पंखों का इस्तेमाल करते समय अनजाने में उन्होंने अलग-अलग स्थितियों में (पंखे का खुला हिस्सा अलग-अलग दिशाओं में) रखकर कोणों का इस्तेमाल किया। उन्होंने क्या सीखा इसका आकलन करने के लिए उनसे कुछ सवाल पूछे गए। उदाहरण के लिए, कक्षा के बच्चों को एक अधिक कोण दिखाया गया। बच्चों ने उसे अधिक कोण के रूप में पहचाना। उसके बाद कोण की माप को बदले बिना उसकी स्थिति बदल दी और फिर उनसे कोण का प्रकार पूछा। कक्षा में काफ़ी शान्त रहने वाली एक बच्ची सुमन ने कहा कि वह एक अधिक कोण था। जब उससे उसके उत्तर की वजह पूछी गई, तो उसका जवाब था, “आपने डण्डियों की स्थितियों को नहीं बदला, आपने केवल इसे उल्टा कर दिया। इसलिए यह पहले वाला कोण ही है।” सामूहिक गतिविधि से बच्चे गतिविधि में सक्रिय रूप से भागीदारी और उस पर आपस में चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित हुए। कक्षा में दिए जाने वाले कार्यों का इस्तेमाल बच्चों को व्याख्या करने, अपनी बात को सही साबित करने और ख़ुद की व अपने हम-उम्र साथियों की व्याख्याओं को लेकर आलोचनात्मक होने के अवसर देने के लिए किया जा सकता है (Watson, 2013)।
360° का चाँदा
कई बच्चों को दी गई आकृति या चित्र में बने कोण को मापने में समस्या होती है, ख़ासकर तब जब वह आकृति कुछ अलग-सी स्थिति में रखी हो। कोणों को बनाने और उनको मापने के लिए स्वयं अपने हाथ से बनाए 360° के चाँदे का इस्तेमाल एक दृश्य साधन के तौर पर किया गया। इसने 180° से अधिक अंश वाले कोणों को मापने का मौक़ा भी दिया, जिनको पारम्परिक चाँदे का इस्तेमाल करके मापना सम्भव नहीं था। दो सुइयों वाली इस सामग्री को चार्ट पेपर्स से बनाया गया था और सुइयों को पिन और स्पंज के टुकड़े की मदद से एक जगह टिकाया गया था। बच्चों ने चार-चार के समूहों में इस सामग्री का इस्तेमाल किया, और उनसे अलग-अलग प्रकार के और अलग-अलग माप वाले कोण बनाने को कहा गया।


उन्होंने अपनी बनाई हुई आकृतियों के बारे में बताया। “यह 120° का है और एक अधिक कोण है”, “जब हम कोई अधिक कोण या न्यून कोण (acute angle) बनाते हैं, तो हमें दूसरे हिस्से पर प्रतिवर्ती कोण (reflex angle) भी मिलता है।” जब उनसे 30° के कोणों को तीन अलग-अलग तरीक़ों से दर्शाने को कहा गया तो उन्होंने जो जवाब दिए, उन्हें चित्र-3, 4 और 5 में दर्शाया गया है। इन गतिविधियों के बाद, चाँदे का इस्तेमाल करके कोणों को बनाने और उन्हें मापने में स्पष्ट सुधार नज़र आया।


रंगीन स्ट्रा
समूहों में बच्चों से दो रेखाओं को काटने वाली तिर्यक रेखा (transversal) से बनने वाले कोणों को ढूँढ़ने और पहचानने को कहा गया। बच्चों ने नतीजा निकाला कि इस तरह आठ कोण बन रहे थे।

दो समानान्तर रेखाओं (parallel lines) को काटती हुई तिर्यक रेखा का मॉडल

चित्र-7 में दिए गए मॉडल का इस्तेमाल समानान्तर रेखाओं के एक युग्म को किसी तिर्यक रेखा द्वारा काटे जाने पर बनने वाले कोणों के बीच के सम्बन्धों का पता लगाने के लिए किया गया। उदाहरण के लिए, हम \(∠AXP\) और \(∠CYX\) की माप के बारे में क्या कह सकते हैं? \(∠AXY\) और \(∠DYX\) की माप क्या होगी? बच्चों द्वारा एक बार सम्बन्ध स्पष्ट कर दिए जाने के बाद, हम उनके सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत नामों को सीखने की दिशा में आगे बढ़े, जैसे- क्रमशः संगत कोण (corresponding angles) और एकान्तर अन्त:कोण (alternate interior angles)।

बच्चों ने जिन कोणों के युग्मों के साथ पहले काम किया था, उन्होंने उन कोणों और उनके बीच के सम्बन्ध को बख़ूबी समझा था या नहीं इसे जाँचने के लिए मॉडल को रखने का तरीक़ा बदल दिया गया (चित्र-8)। बच्चे यह समझ गए थे कि मॉडल को रखने का तरीक़ा बदलने से कोणों के माप या कोणों के विशिष्ट युग्मों के बीच का सम्बन्ध नहीं बदला था।
b. पाठ्यपुस्तकों की सामग्री का विस्तार
एनसीईआरटी की किताबों का इस्तेमाल करके कुछ गतिविधियों और मार्गदर्शक सवालों को तैयार किया गया।
Gamification of textbook contents
ऐसी एक गतिविधि पूरक और सम्पूरक कोणों पर आधारित थी। बच्चों को दो समूहों में बाँटा गया। एक समूह के बच्चों को अलग-अलग माप के चित्र दिए गए (चित्र-9, 10, 11, 12)। उन्हें हरेक कोण के पूरक और सम्पूरक कोण का पता लगाना था, जो कि दूसरे समूह के बच्चों के पास था।




बच्चे गणना करते हुए, अन्दाज़ लगाते हुए और चित्रों के साथ अपने नतीजों का मिलान करते हुए गतिविधि में लीन थे। यह गतिविधि उन बच्चों के लिए मददगार साबित हुई, जिन्हें काग़ज़-क़लम के काम में दिलचस्पी नहीं थी। गतिविधि के बाद, बच्चों से विस्तार से बताने के लिए कहा गया कि उन्होंने कोणों के युग्मों में क्या-क्या देखा। ऐसा यह समझने के लिए पूछा गया कि उन्होंने कोणों के युग्मों के योग को 180° और 90° के रूप में देखा या नहीं, और क्या वे क्रमशः पूरक और सम्पूरक कोणों के बीच फ़र्क़ को समझ पा रहे थे या नहीं।
मार्गदर्शक प्रश्न
उच्चतर स्तर के संज्ञानात्मक कौशलों को लागू करने में बच्चों को सक्षम बनाने के लिए और उन्हें माध्यमिक स्कूल में औपचारिक गणितीय चिन्तन के लिए तैयार करने के लिए मार्गदर्शक सवालों का इस्तेमाल किया गया। जब बच्चों ने विभिन्न सन्दर्भों में कोणों का इस्तेमाल देखा, तो इस प्रकार जीवन्त हुए कोण अधिक सार्थक हो गए। तालिका-2 में कक्षा \(9^{th}\) की एनसीईआरटी की किताब की सामग्री को आधार बनाकर \(7^{th}\) कक्षा में आज़माए गए कुछ परिदृश्य दिए गए हैं। इन्हें करने के लिए, विद्यार्थियों को कोणों के निरूपण और प्रकार, कोण के युग्मों जैसे कि पूरक और सम्पूरक कोणों, साथ ही समानान्तर रेखाओं के किसी युग्म को किसी तिर्यक रेखा द्वारा काटे जाने पर बनने वाले कोणों के युग्मों को जानने की ज़रूरत होगी।
तालिका-2
| उच्च कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकों के अंश | मार्गदर्शक प्रश्न |
|---|---|
![]() | 1. तिर्यक रेखाओं को पहचानें। 2. संगत कोणों को पहचानें। |
![]() | 1. तिर्यक रेखाओं को पहचानें। 2. एकान्तर अन्त: कोणों को पहचानें। 3. एक ओर बने अन्त:कोणों को पहचानें। टिप्पणी अधिकतर बच्चों ने AC को तिर्यक रेखा के रूप में पहचाना। कमल ने यहाँ तक कहा कि आयत की भुजाएँ भी तिर्यक रेखाएँ हैं। इससे बच्चों में चर्चा शुरू हुई, जिसमें बच्चों ने अपनी बात रखी, बहस की और नतीजा निकाला, जिसने मुझे तीसरा सवाल पूछने के लिए प्रेरित किया। इस चित्र में सम्पूरक कोणों की पहचान करने की भी सम्भावना है, जिसे आगे की चर्चा के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। |
बच्चों को उच्च स्तर के कौशलों का इस्तेमाल करने का अवसर मिलेगा, जैसे – इस तरह की गतिविधियों को करना और उनका मूल्यांकन करना। जब बच्चों से समूहों में समाधान निकालने को कहा जाता है तो यह एक खोजपूर्ण गतिविधि बन जाती है, जो उन्हें सोचने, विचार प्रस्तावित करने, ग़लतियाँ करने और सीखने का अवसर देती है। इस प्रकार वैन हीले मॉडल में ज्यामिति का एक शिक्षक बच्चों की सीखने की प्रगति को गति दे सकता है। कक्षा के कार्यों को विद्यार्थियों को समस्या समाधान के कौशलों के विकास के और समस्या सामने रखने के अवसर देने चाहिए (Watson, 2013)।
मुख्य निष्कर्ष
- काग़ज़ के पंखों और 360° के चाँदे सरीखी जुगाड़ करके बनाई गई सामग्रियाँ बच्चों को गति के सन्दर्भ में, अलग-अलग स्थितियों में रखे होने पर और सम्बन्धपरक मापों के रूप में कोणों से बच्चों को परिचित कराने में उपयोगी पाई गईं। इस गतिविधि के बाद चाँदे का इस्तेमाल करके कोणों को बनाने और उन्हें मापने में काफ़ी सुधार देखा गया।
- पारम्परिक चाँदे की ख़ामियों को दूर करने के लिए, जिनसे 180° से अधिक के कोणों को नहीं दर्शाया जा सकता था, 360° के चाँदे का इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर इसे पारदर्शी शीट्स से बनाया जाए, तो इसे कोणों को मापने और बनाने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
- खेलों और मार्गदर्शक प्रश्नों को शामिल करने से बच्चों में जिज्ञासा को बढ़ावा मिला, जिससे सीखना मज़ेदार बना और बच्चों ने इसमें भागीदारी की।
- ठोस सामग्रियों और पाठ्यपुस्तक के प्रभावी तरीक़े से इस्तेमाल द्वारा बच्चों को सीखने के अवसर देने से वैन हीले के ज्यामिति सीखने के मॉडल में उन्होंने प्रगति की।
- Clements, D. H. (2003). Chapter 11. Teaching and Learning Geometry. In A Research Companion to Principles and Standards for School Mathematics. NCTM
- Johnston-Wilder, S., & Mason, J. (2005). Developing thinking in geometry (pp. 209-211). Open University in Association with Paul Chapman Pub.
- Nunes, T., Bryant, P., & Watson, A. (2009). Paper 5. Understanding space and its representation in mathematics. In Key understandings in mathematics learning. Nuffield Foundation. London.
- Van Hiele, P.M. (1986). Structure and insight: a theory of mathematics education. Academic Press. Orlando.
- Watson, A., Jones, K and Pratt, D. (2013). Chapter 5. Spatial and geometrical reasoning. In Key ideas in teaching mathematics: research-based guidance for ages 9-19 (pp. 92-116). OUP.
- NCERT Mathematics textbooks for grades 7 and 9.

