हम Math(h)erial की दुनिया में रहते हैं !

july-2026

Mat(h)erials स्वाती सरकार द्वारा गढ़ा गया एक शब्द है, जिसका उपयोग गणित सिखाने के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्रियों का वर्णन करने के लिए किया जाता है। आमतौर पर बेकार पड़े सूखे कबाड़ का उपयोग करके बनाए गए ये Mat(h)erials क़ीमती रत्नों की तरह अपनी प्राकृतिक सुन्‍दरता दिखाने के लिए सही माहौल या व्यवस्था की माँग करते हैं। ये न तो किसी अनछुई ‘गणित प्रयोगशाला’ में धूल चाटते हुए और न ही किसी सुनसान ‘गणित के कोने’ में उपेक्षित पड़े रह सकते हैं। इनके बारे में जाँच-पड़ताल करने, विचार करने और सबसे महत्त्वपूर्ण बात − इनके बारे में चर्चा करने की आवश्यकता है। ये अपने आप में गणित नहीं हैं, बल्कि गणित सीखने का एक साधन हैं। इसलिए, बच्चों की समझ का ध्‍यानपूर्वक आकलन करके सही योजना बनाकर इनका इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

सम्पादक की ओर से...

प्रिय पाठको,

आधा रास्ता हमेशा रुकने और विचार करने का एक अच्छा अवसर होता है। 2026 के इस दूसरे अंक में, हमारे पास मुड़कर पीछे निहारने और आगे की ओर देखने के लिए बहुत कुछ है। At Right Angles का डिजिटल संस्करण (https://atrightangles.azimpremjiuniversity.edu.in/) अब हर हफ़्ते नए लेखों के साथ आपके सामने आ रहा है। प्राथमिक विद्यालय के गणित से लगाव रखने वाले सभी लोगों के लिए यह एक पसन्‍दीदा स्थान है।

इस अंक के कवर पर 90 के दशक के अँग्रेज़ी के एक हिट गाने Material Girl की एक पंक्ति का उपयोग किया गया है − जिससे शायद हमारे अधिकांश पाठक परिचित न हों। लेकिन गणित के शिक्षणशास्त्र से गहराई से जुड़े लोग mat(h)erials ( यानी गणित शिक्षण में इस्‍तेमाल की जाने वाली सामग्रियों) से अच्छी तरह वाकिफ़ होंगे। निश्चित रूप से, ये हमारे चारों ओर प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं, और कक्षा में इनके उपयोग की सिफ़ारिश नीतियों में तथा शिक्षक-प्रशिक्षकों और स्कूल प्रशासकों द्वारा जोर-शोर से की जाती है। क्या इससे गणित के सीखने में सुधार की गारंटी मिलेगी? मिंट * में प्रकाशित अनुराग बेहार के कॉलम से यहाँ कुछ बिन्‍दु दिए गए हैं :

पिछले हफ़्ते एक स्कूल में मैंने एक शिक्षक को भिन्नों पर एक ‘गतिविधि’ करवाते हुए देखा। लगभग बीस बच्चों ने पूरे उत्साह और आनन्‍द के साथ काग़ज़ को मोड़कर आधे और चौथाई हिस्से बनाए। वहाँ हलचल, रंग और उत्साह था − एक प्रगतिशील कक्षा के सभी लक्षण। कक्षा के अन्‍त में, मैंने कुछ बच्चों से पूछा कि भिन्न क्या होती है। उन्होंने अपने हाथों में मुड़े हुए काग़ज़ को देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा और उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं था। दरअसल गतिविधि हुई थी; सीखना नहीं हुआ था।

शिक्षक की कोई ग़लती नहीं थी। वह पूरी ईमानदारी और लगन से वही कर रहे थे जो उन्हें बताया गया था कि यह अच्छा शिक्षण है। ग़लती बहुत गहरी और पहले हुई थी, उस बौद्धिक भूल में जिसने दो दशकों से धीरे-धीरे भारतीय स्कूली शिक्षा को प्रभावित किया है।

वे आगे कहते हैं :

‘सीखना निमार्ण की एक सक्रिय प्रक्रिया है’, काफ़ी हद तक यह बात सच है,लेकिन इस बात से फिसलकर हम दावों के एक बिलकुल अलग सेट पर चले गए कि ‘इसलिए शिक्षण में निर्देश कम-से-कम होने चाहिए’ – यानी कि शिक्षक को बच्‍चों को समझाना नहीं चाहिए, कि सीधे निर्देश देना एक तरह की तानाशाही है, कि बच्चों को गतिविधियों के माध्यम से ख़ुद विचारों की खोज करनी चाहिए, कि अभ्यास और याद रखना समझ के दुश्मन हैं।

इन्‍हीं बातों को ध्‍यान में रखते हुए हम नन्दिता जयराज और स्वाती सरकार द्वारा लिखित दो विशेष लेख प्रस्तुत कर रहे हैं। मैनिपुलेटिव्‍स के उपयोग में शिक्षक का सुगमीकरण कौशल सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। सम्‍प्रेषण सबसे ज़रूरी है! इस पूरे अंक में यह थीम सोनिया कुण्‍डू द्वारा लिखित मूर्त से अमूर्त की ओर, सुयश तिवारी द्वारा लिखित काप्रेकर के स्थिरांक की खोज और जीवेश पंचभाई द्वारा लिखित अन्‍तर को मापना में छाई हुई है।

गणित का मज़ा में, हम समस्या-समाधान पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं : सुमित पाण्‍डे द्वारा लिखित स्टार प्रॉब्लम, और जयश्री व मोहन द्वारा लिखित पेंटोमिनोज़ । यह केवल उत्तर पाने या बिना किसी उद्देश्य के खेलने के लिए नहीं हैं, बल्कि प्रक्रिया की जाँच करने और समस्या-समाधान की कला का आनन्‍द लेने व विकसित करने के लिए हैं। समीक्षा में इस बार कुछ बहुत ही अलग है! इसे ज़रूर देखें। और अंक को हम पद्माप्रिया शिराली द्वारा लिखित गणितीय संवाद के साथ समाप्त कर रहे हैं – जिसमें गणितीय बातचीत को दर्शाया गया है जो अच्छे शिक्षण को प्रदर्शित करती है।

हम बेहार के एक उद्धरण के साथ अपनी बात पूरी कर रहे हैं :

अच्छा शिक्षण किसी भी सिद्धान्‍त का अनुप्रयोग नहीं है, चाहे वह नया हो या पुराना। यह स्‍व-विवेक की बात है : यह जानना कि कब समझाना है और कब बच्चों को जूझने देना है, कब कोई गतिविधि समझ को गहरा करती है और कब वह केवल ख़ाना-पूर्ति करती है, कौन-सी चीज़ों को अभ्यास के माध्यम से स्वचालित बना लेना आवश्यक है ताकि दिमाग़ सोचने के लिए स्वतंत्र रहे।

तो आएँ और एक ऐसी कक्षा बनाने की यात्रा में हमारे साथ जुड़ें ‘जहाँ मन निडर हो और मस्तक ऊँचा हो!’

स्नेहा टाइटस
मुख्य सम्‍पादक, एट राइट एंगल्‍स
* https://shorturl.at/Zxaer