मैनिपुलेटिव्स जादू नहीं हैं : गणित कक्षा की ज़मीनी हक़ीक़त

अनुवाद : भरत त्रिपाठी । पुनरीक्षण : प्रतिका गुप्ता । कॉपी-एडिटर : अनुज उपाध्याय

दशकों से, ‘गणित प्रयोगशाला’ जैसी अनेक पहलों के माध्यम से गणित शिक्षा में बदलाव का प्रयास किया जा रहा है। क्या यह प्रयास सार्थक है? इस बदलाव को कैसे मापा जाता है? और ऐसा क्यों है कि इसके बहुत कम सकारात्‍मक परिणाम सामने आए हैं?

भूवैज्ञानिक ज्यां डी हेंज़ेलिन 1950 के दशक में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के इशांगो क्षेत्र में एडवर्ड झील के तट से चट्टानों को खुरच रहे थे। इस दौरान उन्हें बीच-बीच में मानव हड्डी या मानव निर्मित वस्तुएँ मिल रही थीं। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। क्‍योंकि इस क्षेत्र के बारे में मशहूर था कि यहाँ प्रागैतिहासिक मानव बस्तियाँ थीं। लेकिन उन्हें जिस चीज़ के मिलने की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी, वह थी (सम्भवतः) अब तक ज्ञात सबसे प्राचीन गणितीय उपकरण।

हम अभी भी पक्के तौर पर नहीं जानते हैं कि हेंज़ेलिन को मिली ‘इशांगो हड्डी’ पर बने रहस्यमयी पैटर्न क्या दर्शाते हैं। लेकिन कुछ विशेषज्ञों को विश्वास है कि वे पैटर्न इस बात का प्रमाण हैं कि 20 हज़ार साल पहले से ही हमारे पूर्वज संख्याओं, गणितीय संक्रियाओं, क्रमों और अभाज्य संख्याओं का उपयोग कर रहे थे। इशांगो हड्डी की वास्तविकता चाहे जो भी हो, यह इस बात का एक शानदार उदाहरण है कि कैसे भौतिक वस्तुएँ गणित की हमारी शुरुआती समझ को गहराई से आकार दे सकती हैं।

भारत के 605 ग्रामीण ज़िलों के लगभग 6.5 लाख बच्चों तक पहुँचकर किए गए एक देशव्यापी ग्रामीण घरेलू सर्वेक्षण की नवीनतम असर (ASER) रिपोर्ट (2024), ने एक बार फिर इस बात पर प्रकाश डाला है कि हमारे स्कूलों में जिस तरह से गणित पढ़ाया जा रहा है और जिस तरह से उसका आकलन किया जा रहा है, उसमें गम्भीर समस्याएँ बनी हुई हैं। कक्षा-8 के 50% से भी कम विद्यार्थी बुनियादी अंकगणित करने में सक्षम पाए गए हैं। यह चिन्ताजनक है क्योंकि यह स्थापित हो चुका है कि गणित में दक्षता बच्चों को भविष्‍य में रोज़गार और स्वतंत्र रूप से जीने में सफलता का संकेत देती है।

शिक्षाविद और ‘जोड़ो ज्ञान’ की संस्थापिका ऊषा मेनन ने एक लेख में लिखा, “आज के बच्चों को… उस तरह कैलकुलेटर बनने की ज़रूरत नहीं है जैसा कि 19वीं सदी में कुछ लोगों को बनना पड़ा था। उन्हें ऐसे व्‍यक्ति बनने की आवश्यकता है जो आज की चुनौतियों (चाहे वह जलवायु परिवर्तन की हो या बढ़ती असमानताओं की) का सामना करने के क्रम में हल करने हेतु नई समस्याएँ सामने रख सकें। उन्हें केवल संख्यात्मक रूप से नहीं बल्कि परिमाणात्मक रूप से सोचना सीखना होगा और केवल प्रक्रियात्मक रूप से नहीं बल्कि सम्बन्धपरक रूप से सोचना होगा।”

गणित की तह तक पहुँचना

इसे स्वीकार करते हुए, सरकारों, ग़ैर-सरकारी संगठनों, स्कूलों और शिक्षकों ने स्थिति में सुधार के लिए पिछले कुछ दशकों में कई पहलों का नेतृत्व किया है। बुनियादी संख्यात्मक योग्यता (foundational numeracy goals) के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अपनाई गई हमारी रणनीतियों में से एक कक्षा में गणितीय साधनों जैसे शिक्षण-अधिगम सामग्री (TLM) को शामिल करना रहा है। गणितीय संसाधनों या mat(h)erial (जैसा कि अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के ‘मैथ स्पेस’ में इन्हें जाना जाता है) के कई उदाहरण हैं। इसमें ‘गणितमाला’, जो पूर्ण संख्याओं को सीखने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मोतियों की एक शृंखला है; बुनियादी अंकगणित संक्रियाओं के लिए उपयोग किए जाने वाले ‘डीन्स ब्लॉक’ या ‘फ्लैट्स-लॉन्ग्स-यूनिट्स’; और स्थानीय मान को समझने के लिए उपयोग किए जाने वाले ‘एरो कार्ड’ शामिल हैं।

जब कक्षा में भौतिक सामग्री होती हैं, तो बच्चे उन चीज़ों को उठाने और उनके साथ खेलने के लिए आकर्षित होते हैं। इस तरह की गतिविधियाँ बच्चों में संख्या और गणितीय सम्बन्धों के बारे में सहज ज्ञान विकसित करने में मदद कर सकती हैं। उत्तराखण्ड के अज़ीम प्रेमजी स्कूल में गणित की शिक्षिका गरिमा भट्ट कभी-कभी कक्षा में अपनी सामग्री विद्यार्थियों के पास ही छोड़ देती हैं। उनका कहना है, “कम-से-कम प्राथमिक कक्षाओं में, गणितीय सामग्री का आनन्द नहीं छीना जाना चाहिए और विद्यार्थियों को सब कुछ सीखने के लिए शिक्षक पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।” अकसर, वे कक्षा में प्रवेश करती हैं तो ऐसे उत्सुक बच्चे उन्हें घेर लेते हैं जो उन वस्तुओं के साथ खेल रहे होते हैं। “मुझे एहसास हुआ कि बच्चों ने वस्‍तुओं के डिब्बे के पीछे दिए गए निर्देशों को देख लिया था या चित्रों के माध्यम से नियमों की व्याख्या कर ली थी।”

यूनिवर्सिटी के ‘मैथ स्पेस’ की सह-निर्माता और उसे संचालित करने वाली स्वाती सरकार ने कहा, “आपको वास्तव में उनके बारे में सिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।” उन्होंने याद करते हुए कहा, “एक बार हमने उत्तरकाशी की एक कक्षा के फ़र्श पर 2 मीटर का स्केल स्थाई रूप से लगाकर छोड़ दिया था।” जब वे कक्षा में दुबारा लौटीं, तो उन्होंने बच्चों को ज़मीन पर लेटकर उत्साहपूर्वक अपनी लम्बाई मापते हुए पाया। “गणित की कक्षा न होने पर भी बच्चों की पहुँच उन वस्तुओं तक होती है। और जब कमरे में उनके साथ बड़े बच्चे होते हैं तो वे और भी तेज़ी से सीखते हैं।” उन्होंने एक मोंटेसरी स्कूल की शिक्षिका को याद किया। शिक्षिका ने 10 अंकों की संख्याओं के साथ बच्चों की सहजता पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए उनसे कहा था, “हमारे बच्चे अपने माता-पिता के फ़ोन नम्बरों को जोड़ने और घटाने लगे हैं!”

इस बात की बहुत सम्भावना है कि औपनिवेशिक काल से पहले गणितीय शिक्षण में गणितीय सामग्री (कंकड़, बीज, सीपियाँ, छड़ियाँ आदि) का उपयोग किया जाता था। लेकिन पिछली शताब्दी में गणित का शिक्षण काफ़ी हद तक ब्लैकबोर्ड और पाठ्यपुस्तकों तक ही सीमित हो गया था। शिक्षाविद मारिया मोंटेसरी के प्रभाव के परिणामस्वरूप 1900 के दशक में देश भर में मोंटेसरी स्कूल खुलने लगे। इन स्कूलों ने प्रारम्भिक शिक्षा में गणित और अन्य बुनियादी कौशल सिखाने के लिए मैनिपुलेटिव्स का उपयोग किया, लेकिन वे अपवाद थे। (मैनिपुलेटिव्स यानी ऐसी भौतिक वस्तुएँ जिनका उपयोग गणितीय अवधारणाओं और प्रक्रियाओं की बेहतर समझ और अमूर्त अवधारणाओं को ठोस बनाने के लिए किया जाता है। इन वस्‍तुओं से बने मॉडल विज़ुअलाइज़ेशन में मदद करते हैं। अधिकांश मैनिपुलेटिव्स संख्याओं से जुड़े होते हैं। इनका उपयोग परिचय, तुलना, जोड़-घटाना-गुणा-भाग करने के लिए किया जा सकता है। बीजगणित टाइलें इनमें से एक हैं। जियोबोर्ड और रबर बैंड ज्यामिति के लिए हैं। रंगोमेट्री, जोड़ो स्ट्रॉ, इंटरलॉकिंग क्यूब्स, फ्लेक्सीवायर, आकार परिवार, टैनग्राम, पॉलीओमिनो कट संख्याओं, पैटर्न और ज्यामिति के लिए काम आते हैं।) 20वीं सदी के उत्तरार्ध में सरकार द्वारा चलाए गए कार्यक्रमों की एक शृंखला [जैसे कि ज़िला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP)], ने गणित को अधिक स्पर्शनीय तरीक़ों (tactile ways) से पढ़ाने के विचार को फिर से प्रस्तुत किया। प्राथमिक शिक्षा के बारे में हर नई रिपोर्ट, विशेष रूप से राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2022 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसे दोहराया गया है। नतीजतन, भारत में अधिक-से-अधिक स्कूलों ने इस उम्मीद में गणित प्रयोगशालाएँ स्थापित की हैं कि इससे विद्यार्थियों के बीच ‘गणित के डर’ (math phobia) के प्रचलित रवैए से निपटा जा सकेगा।

यह हमेशा काम नहीं करते

असर (ASER) सर्वेक्षण में भाग लेने वाले 75% से अधिक स्कूलों को बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक योग्यता के लिए टीएलएम और/या टीएलएम बनाने या ख़रीदने के लिए धन प्राप्त हुआ था। हालाँकि ये उत्साहजनक संकेत हैं, पर ज़मीन पर काम करने वालों का मानना है कि केवल स्कूल में गणित प्रयोगशाला होने से काम नहीं चलेगा। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि अन्ततः उनका उपयोग कैसे किया जाता है। क्या विद्यार्थी किसी विशिष्ट सामग्री का उपयोग इस तरह से कर सकते हैं कि वह उनके मौजूदा ज्ञान से जुड़े और उनके लिए सार्थक हो? क्या सामग्री का उपयोग इस तरह किया जाता है कि उसमें विद्यार्थियों की ओर से चिन्तन या विचार की आवश्यकता हो?

स्वाती ज़ोर देकर कहती हैं, “मुख्य बात यह है कि कक्षा के सभी विद्यार्थियों की पहुँच किसी-न- किसी ठोस सामग्री तक होनी चाहिए, ताकि केवल शिक्षक ही इसका प्रदर्शन न कर रहा हो।” एक ठेठ भारतीय कक्षा में विद्यार्थियों की बड़ी संख्या को देखते हुए, प्रत्येक विद्यार्थी के लिए एक सेट का लक्ष्य रखना तो वास्तविक नहीं है, लेकिन उनके अनुसार, 30 विद्यार्थियों की कक्षा के लिए 7 से 8 सेट पर्याप्त हैं। यह लक्ष्य अधिक सम्भ्रान्त निजी स्कूलों द्वारा तो प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन भारत में अधिकांश प्राथमिक स्कूलों के लिए, यह भी एक ख़र्चीला मामला बन जाता है।

यह समस्या इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि 6 से 10 साल के बच्चे इन उपकरणों को बहुत सँभालकर इस्तेमाल करने वाले नहीं होते हैं। गरिमा ने कहा, “कुछ विद्यार्थी इन चीज़ों के साथ खेलते समय उन्हें तोड़ देते हैं। कभी-कभी, वे बिना पूछे छोटे कार्ड या टोकन घर ले जाते हैं।” इस तरह की घटनाओं से बचने के लिए, कई स्कूल गणित प्रयोगशालाओं तक विद्यार्थियों की पहुँच को सीमित कर देते हैं, कभी-कभी इस हद तक कि स्वाती उन्हें ‘गणित के मन्दिर’ कहती हैं। उन्होंने दुख जताते हुए कहा, “विद्यार्थियों को वहाँ एक पंक्ति में ले जाया जाता है, किसी भी चीज़ को छूने की अनुमति नहीं होती है, वे बस जैसे दर्शन के लिए एक चक्कर लगाते हैं और फिर वापस कक्षा में चले जाते हैं।”

इस समस्‍या से बाहर निकलने का एक तरीक़ा ऐसी सामग्री का उपयोग करना है जो आसानी से उपलब्ध हो, किफ़ायती हो और टूटने पर उसकी मरम्मत आसानी से की जा सके। कम लागत या शून्य लागत वाले गणित किट बनाना और वितरित करना स्वाती के ‘मैथ स्पेस’ के 12 साल के इतिहास के दौरान मुख्य गतिविधियों में से एक रहा है। यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों, मुख्य रूप से बीएससी-बीएड करने वालों, को कैम्पस के वातावरण से प्राप्त रीसाइकिल्ड वस्‍तुएँ जैसे कार्डबोर्ड, झाड़ू की तीलियाँ, फेंके गए पैकेजिंग मटीरियल आदि का उपयोग करके गणितीय सामग्री की परिकल्पना और निर्माण करने की ज़िम्मेदारी दी जाती है। स्वाती कहती हैं, “जिस क्षण सामग्री बच्चों के पास जाती है, आपको मानकर चलना चाहिए कि उनमें टूट-फूट होगी, कुछ खो जाएँगी । उस पर चिन्ता करने की बजाय, आप उन्हें आसानी से बदल सकते हैं!”

स्थानीय रूप से प्राप्त सामग्री का उपयोग करने का एक और लाभ है। अध्ययन बताते हैं कि किसी संसाधन से परिचित होना सीखने में मदद करता है। यह परिचय उस सामग्री का उपयोग करके प्राप्त किया जा सकता है जिसे विद्यार्थी अपने सन्दर्भ में देखते हैं। उदाहरण के लिए, हंगरी की कोई कक्षा गिनती सीखने के लिए चेस्टनट (शाहबलूत) का उपयोग कर सकती है, लेकिन तेलंगाना के किसी शहर के विद्यार्थी के लिए चेस्टनट पूरी तरह से अपरिचित हो सकता है। ऐसी अपरिचित वस्‍तु छोटे विद्यार्थी का ध्यान भटका सकती है और वह शिक्षक द्वारा सुनाई जा रही कहानी से जुड़ने में कठिनाई महसूस करेगा। ऐसे में चेस्‍टनट की जगह मूँगफली अधिक उपयुक्त उदाहरण हो सकती है।

केम्ब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित एक लेख में शोधकर्ता जैनी बैक ने लिखा, “यदि कोई शिक्षार्थी किसी संसाधन के विभिन्न गुणों के प्रति बहुत अधिक सजग रहता है, तो उसके लिए उस संसाधन का किसी विशिष्ट गणितीय संरचना के प्रतिनिधित्व के रूप में उपयोग करना कठिन हो जाता है। मैं ज्यामिति के शिक्षण में अकसर डोरी के फन्दों का उपयोग करती हूँ। मेरा अनुभव है कि यदि मैं किसी भी आयु के शिक्षार्थियों को गणितीय गतिविधि शुरू करने से पहले कुछ समय तक उस डोरी के साथ स्वतंत्र रूप से खेलने का अवसर नहीं देती हूँ, तो वे उसके साथ खेलने और उसके विभिन्न गुणों को जानने की अपनी इच्छा के कारण गणितीय कार्य पर ध्यान नहीं दे पाते हैं।”

हर कोने में गणित

गणित प्रयोगशाला का एक विकल्प है ‘गणितीय कोना’ यानी कक्षा के भीतर ही स्थित सहभागितापूर्ण सीखने का स्थान। स्वाती का कहना है, “देखिए, प्राथमिक स्तर पर गणित सिखाने के लिए न बिजली के कनेक्शन की ज़रूरत होती है, न पानी के इनलेट-आउटलेट की और न ही किसी तड़क-भड़क वाली व्यवस्था की। वास्तव में हर गणित की कक्षा के लिए बच्चों को प्रयोगशाला तक ले जाने की आवश्यकता नहीं है। इसकी बजाय सामग्री को ही बच्चों तक पहुँचाया जा सकता है।” गणितीय कोने की इस व्यवस्था में सामग्री विद्यार्थियों के अधिक निकट रहती है और लगातार उनकी पहुँच में बनी रहती है। यह विकल्प सीमित संसाधनों और कम स्थान वाले विद्यालयों के लिए भी उपयुक्त है।

कर्नाटक के कलबुर्गी स्थित अज़ीम प्रेमजी विद्यालय में गणित पढ़ाने वाले शिवशरणप्पा ने बताया कि उनके विद्यार्थियों का 8 से 10 मिनट का समय उस गणित प्रयोगशाला तक आने-जाने में ही निकल जाता है, जो विद्यालय की दूसरी मंजिल पर स्थित है। दूसरी ओर, गरिमा की कक्षा में गणितीय कोने की व्यवस्था है, इसलिए उनके विद्यार्थी यह बहुमूल्य समय बचा लेते हैं।

फिर भी कभी-कभी गरिमा को लगता है कि यदि गणित प्रयोगशाला के लिए एक अलग कक्ष हो, तो विद्यार्थी गतिविधियों को अधिक गम्भीरता से लेंगे और गणितीय सामग्री भी सुरक्षित रहेगी। इसके अतिरिक्त, “उस स्थान का अपना एक अलग वातावरण होगा, ठीक विद्यालय के पुस्तकालय या विज्ञान प्रयोगशाला की तरह।” लेकिन साथ ही गरिमा यह भी स्वीकार करती हैं कि इसके साथ एक जोख़िम जुड़ा हुआ है। “ऐसा नहीं होना चाहिए कि सामग्री तो सुरक्षित रखी जाए, लेकिन बच्चों की पहुँच से बाहर हो जाए।”

आजकल गणित प्रयोगशाला की अवधारणा काफ़ी लोकप्रिय, बल्कि एक तरह से प्रचलन का हिस्सा बन गई है। लेकिन 1990 के दशक में, जब एस. एन. गणनाथ ने बेंगलूरु में सुविद्या एजुकेशन रिसोर्स सेंटर की स्थापना की थी, तब स्थिति ऐसी नहीं थी। ऊपर से देखने पर यह परिवर्तन सुखद लगता है, लेकिन गणनाथ का मानना है कि वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब शिक्षकों के साथ निरन्तर और सतत संवाद बना रहे − आमने-सामने सम्‍भव न हो, तो कम-से-कम ऑनलाइन। उन्होंने देखा कि जब उनके संगठन को विद्यालयों में एक-दिवसीय कार्यशालाएँ आयोजित करने के लिए आमंत्रित किया जाता था, तो प्रतिक्रिया मिली-जुली रहती थी। उन्होंने कहा, “सब लोग ताली बजाते हैं और सभी ख़ुश होते हैं, लेकिन केवल इतना पर्याप्त नहीं है। शिक्षकों को अपने दृष्टिकोण, तरीक़े बदलने और इस पद्धति पर विश्वास विकसित करने में 3 से 4 वर्ष तक लग सकते हैं।”

गणनाथ के अनुसार, यदि गणित प्रयोगशाला की पद्धति को प्रभावी बनाना है, तो उपयोगकर्ताओं की सोच में एक बुनियादी परिवर्तन आवश्यक है। उनका आशय यह है कि अधिकांश विद्यार्थी, शिक्षक और शिक्षक-प्रशिक्षक इस धारणा को आत्मसात कर चुके हैं कि गणित का अर्थ केवल प्रक्रियाएँ और गणनाएँ करना है। उनका कहना है, “ऐसा नहीं है कि वे आलसी हैं। वास्तव में वे इस दर्शन (philosophy) से अवगत ही नहीं हैं कि विद्यालयों में गणित क्यों पढ़ाया जाता है। इसलिए उनके लिए नए विचारों को समझना, उन्हें स्वीकार करना और उन्हें व्यवहार में लाना कठिन हो जाता है।”

जब शिक्षकों के साथ निरन्तर जुड़ाव बना रहता है, तो उसके परिणाम अत्यन्त प्रभावशाली होते हैं। गणनाथ ने बड़े स्नेह के साथ कर्नाटक के ग्रामीण क्षेत्रों के उन शिक्षकों को याद किया, जो 30 वर्ष पहले सुविद्या की कार्यशालाओं में आए थे, वहाँ से प्राप्त सीख को दूसरे ज़िलों तक ले गए और आज भी उसी पद्धति का अभ्यास कर रहे हैं। उन्होंने बताया, “एक शिक्षिका लगातार तीन वर्ष तक कोलार से बेंगलूरु हर महीने कार्यशाला में भाग लेने आती थीं। दरअसल उनकी नियुक्ति अँग्रेज़ी शिक्षिका के रूप में हुई थी, लेकिन कार्यशाला में भाग लेने के बाद उन्होंने अपने प्रधानाचार्य से अनुरोध किया कि उनका विषय बदलकर गणित कर दिया जाए। कार्यशाला से गणित के प्रति उनका भय समाप्त हो गया था और उन्होंने गणित पढ़ाना शुरू कर दिया!”

शिक्षाविदों और प्राथमिक स्तर के गणित शिक्षकों में एक बात को लेकर व्यापक सहमति दिखाई देती है कि मैनिपुलेटिव्स वास्तव में छोटे विद्यार्थियों में जिज्ञासा, खोजबीन की प्रवृत्ति और अवलोकन क्षमता विकसित करने में प्रभावी होते हैं। लेकिन ऐसा तभी सम्भव है, जब शिक्षक स्वयं पहले इन सामग्रियों के साथ खेलें, यह कहना है एट राइट एंगल्स की सम्पादक व मैथ स्पेस की सह-निर्माता स्नेहा टाइटस का। “जब शिक्षक आत्मविश्वास से भरे, लेकिन खेल-भावना वाले इस दृष्टिकोण के साथ अधिगम के अवसरों और शिक्षण के उपयुक्त क्षणों को पहचानते और उनका उपयोग करते हैं, तब विद्यार्थियों में प्रलेखन, तर्क-वितर्क, अनुमान और दलील जैसी गणितीय योग्यताएँ विकसित होती हैं और यही सब अन्ततः प्रमाण तक पहुँचाता है।”

यही वह क्षण है, जब ‘जादू’ घटित होता है।

  1. Royal Belgian Institute of Natural Sciences. (2024, March). The Ishango bone [Brochure]. Royal Belgian Institute of Natural Sciences.
  2. Baur, J. (2026). The Ishango bone: Evidence for intentional arithmetic design in the Upper Palaeolithic? (Version 4). arXiv.
  3. ASER Centre. (2025). ASER 2024 national findings. ASER Centre.
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