बच्चों में धन की समझ
नेशनल फ़ाइनेंस ओलम्पियाड द्वारा कक्षा-1 और 2 के लिए तैयार की गई पर्सनल फ़ाइनेंस हैंडबुक की एक समीक्षा
बच्चों ने कभी-न-कभी अपने आस-पास की दुकान पर सिक्कों का लेन-देन किया ही होगा, दो स्नैक्स की क़ीमतों की तुलना की होगी, या फिर अभिभावकों को पेमेंट के लिए क्यूआर (QR) कोड स्कैन करते हुए देखा होगा। बच्चों की आपसी बातचीत और मेल-जोल के दौरान भी वित्तीय समझ उभरकर सामने आती है। वे दोस्तों के साथ खिलौने या स्टेशनरी की अदला-बदली करते समय भी अपने फ़ायदे के लिए मोल-भाव करते हैं। वे यह भी देखते हैं कि अदला-बदली घाटे का सौदा तो नहीं, और यह भी कि यह लेन-देन उनके लिए सही है या नहीं। दैनिक जीवन के ऐसे अनुभवों में मूल्य, औचित्य, पसन्द और मोल-भाव जैसी बातें शामिल होती हैं, जो कम उम्र से ही वित्तीय सोच विकसित करने के बेहतरीन मौक़े देती हैं। इनमें गिनती, तुलना, अंकगणितीय संक्रियाएँ और अनुमान लगाने जैसी गणितीय अवधारणाएँ भी शामिल होती हैं। रोज़मर्रा के जीवन के ये सन्दर्भ रुपए-पैसे (धन) को एक सार्थक विषय बनाते हैं, जिनसे छोटे बच्चों में गणित की समझ विकसित हो सकती है। इसलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि अलग-अलग बोर्ड की प्राथमिक कक्षाओं के गणित के पाठ्यक्रम में रुपए-पैसे को शामिल किया गया है।
हाल के वर्षों में, भारत में कई संगठनों और प्रकाशकों ने स्कूल जाने वाले बच्चों को वित्तीय साक्षरता सिखाने के उद्देश्य से किताबें और कार्यक्रम तैयार किए हैं। तालिका-1 में ऐसे ही कुछ प्रयासों के विवरण दिए गए हैं —
| संस्थाएँ / प्रकाशक | शृंखला / कार्यक्रम | लक्षित समूह |
|---|---|---|
| नेशनल सेंटर फ़ॉर फ़ाइनेंशियल एजुकेशन | मनी स्मार्ट स्कूल प्रोग्राम | कक्षा-6 से 10 |
| प्रथम बुक्स | रुपैया पैसा शृंखला | आयु 9 से 12 |
| नेशनल फ़ाइनेंस ओलम्पियाड | पर्सनल फ़ाइनेंस हैंडबुक्स | कक्षा-1 से 8 |
नेशनल फ़ाइनेंस ओलम्पियाड (एनएफ़ओ) के X (पूर्व में ट्विटर) पेज के अनुसार, यह एक ऐसा संगठन है जो व्यवस्थित/ढाँचागत प्रतियोगिताओं और सीखने के माध्यम से विद्यार्थियों के बीच वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। यहाँ इन पहलों के एक उदाहरण के तौर पर कक्षा-1 और 2 के लिए नेशनल फ़ाइनेंस ओलम्पियाड द्वारा विकसित की गई पर्सनल फ़ाइनेंस हैंडबुकों की समीक्षा की गई है। ये हैंडबुक इसलिए भी रुचिकर हैं क्योंकि इनमें विद्यार्थियों को पर्सनल फ़ाइनेंस की अवधारणाओं से परिचित कराने का प्रयास उनके प्रारम्भिक वर्षों में ही किया गया है। ये हैंडबुक अँग्रेज़ी में हैं। इन किताबों का उद्देश्य बच्चों को आर्थिक रूप से आत्मविश्वासी और ज़िम्मेदार बनाना है। नेशनल फ़ाइनेंस ओलम्पियाड द्वारा प्रकाशित इन किताबों की भूमिका में कहा गया है कि इन हैंडबुक को सोच-समझकर इस तरह तैयार किया गया है जिससे विद्यार्थियों की वास्तविक दुनिया की फ़ाइनेंस से जुड़ी समझ और उससे जुड़ी अवधारणाओं को लागू करने की क्षमता को परखा जा सके। इनका उद्देश्य विद्यार्थियों के लिए फ़ाइनेंस को आसान और मज़ेदार बनाना है ताकि आर्थिक रूप से जागरूक नागरिकों की एक पीढ़ी तैयार की जा सके [1]
इस हैंडबुक में मित्रवत पात्र, आसान भाषा, दैनिक जीवन के उदाहरण और मज़ेदार गतिविधियाँ शामिल हैं जो बच्चों के ध्यान देने की क्षमता और सीखने के तरीक़े के हिसाब से बनाई गई हैं। यह विद्यार्थियों को बचत, आय, बजट और डिजिटल पेमेंट जैसे फ़ाइनेंस से जुड़े कई शब्दों से परिचित कराती है। इसके साथ एक और हैंडबुक है, जिसमें अभिभावक और बच्चों द्वारा मिलकर करने वाली गतिविधियाँ हैं (चित्र-1)।

मित्रवत मार्गदर्शक, मनी पाल और कहानी सुनाने वाला मुख्य पात्र गेबी दी बेयर है। कक्षा-1 और 2 के लिए बनी इस किताब में 8 अध्याय हैं। हर अध्याय में एक नई अवधारणा को समझाया गया है, अवधारणा को बेहतर ढंग से समझाने के लिए एक कहानी भी दी गई है, और फिर एक छोटी-सी गतिविधि (जैसे सही मिलान करना, तस्वीर काटकर सही जगह चिपकाना आदि) भी दी गई है। सभी सवालों और गतिविधियों के जवाब अन्त में दिए गए हैं। नीचे दी गई तालिका में इस किताब का संक्षिप्त विवरण दिया गया है।
| अध्याय संख्या | अध्याय का नाम | मुख्य विचार |
|---|---|---|
| 1 | मनी हियर, मनी देयर! |
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| 2 | वर्क मोड : ऑन! |
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| 3 | व्हेयर डिड माय मनी गो? |
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| 4 | एवरी रुपी काउंट! |
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| 5 | सेट इट, गेट इट! |
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| 6 | थिंक ट्वाइस, स्पेंड वाइज़! |
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| 7 | गुडबाय पिग्गी, हैलो बैंक! |
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| 8 | मनी हियर, मनी देयर, मनी एवरीव्हेयर! |
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यहाँ शामिल किए गए विषयों का दायरा उल्लेखनीय है। इस हैंडबुक की विशेषता को समझने के लिए, इसकी तुलना एनसीईआरटी की कक्षा-1 और 2 की गणित की किताबों में रुपए-पैसे से जुड़े विषयों को समझाने के तरीक़े से करना उपयोगी होगा। एनसीईआरटी का फ़ाउण्डेशनल स्टेज लर्निंग आउटकम्स दस्तावेज़ कहता है कि विद्यार्थियों को कक्षा-2 तक “अलग-अलग नोट और सिक्कों को मिलाकर 100 रुपए तक की राशि बनाना” सीख जाना चाहिए [2]। कक्षा-1 में, पैसे से जुड़ा अध्याय नोटों और सिक्कों की पहचान करने और दी गई राशि (₹20 तक) बनाने के लिए अलग-अलग संयोजन बनाने के बारे में है (चित्र-2)।


इस अध्याय में एक ऐसा खेल शामिल है जिसमें बच्चे काग़ज़ के नक़ली नोट बनाते हैं। फिर ख़ुद दुकानदार व ग्राहक बनकर उन नक़ली नोटों से सामान ख़रीदने और बेचने का खेल खेलते हैं।
कक्षा-2 के अध्याय ‘मेले का आनन्द’ में अभिभावकों द्वारा दिए गए पैसे लेकर मेला घूमने गए बच्चों की कहानी है जो उन पैसों से अलग-अलग तरह के झूले और खेल का मज़ा लेते हैं (चित्र-3)।


इस अध्याय में बताया गया है कि एक ही धनराशि का कई अलग-अलग तरीक़ों से किस प्रकार भुगतान किया जा सकता है, और अन्त में पैसों से सम्बन्धित जोड़ और घटा के सरल सवाल दिए गए हैं।
जहाँ हैंडबुक पाठ्यपुस्तक से अधिक मददगार होती है
जहाँ एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें बच्चों का परिचय नोट और सिक्कों, राशियों के अलग-अलग संयोजनों और आसान लेन-देन से करवाती हैं, वहीं यह हैंडबुक चर्चा को कमाई, बचत, बजट बनाने और आर्थिक फ़ैसले लेने जैसे व्यापक विषयों तक ले जाती है। इस हैंडबुक की निम्नलिखित बातें ध्यान देने लायक़ हैं —
- ‘आय’ के विचार को उस धनराशि के रूप में बताया गया है जो हमें काम करने पर या उपहार में मिलती है। इन दोनों तरह की आय में अन्तर भी बताए गए हैं। इसके बाद एक गतिविधि है जिसमें बच्चों को पहचानना होता है कि किस स्थिति की आय कमाई गई है, और किस स्थिति की आय तोहफ़े में मिली है (चित्र-4)। आमतौर पर गणित की पाठ्यपुस्तकों में इस बात को महत्त्व नहीं दिया जाता और नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है (क्योंकि सारा ध्यान गणनाओं पर होता है!)।


- ज़रूरत और इच्छा के बीच अन्तर। यह हैंडबुक के सबसे महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक हिस्सों में से एक है। आज के इस ‘झटपट वाले’ ज़माने में जब कोई भी चीज़ बस एक बटन दबाते ही मिल जाती है तो इस बात पर बहुत कम ही ध्यान दिया जाता है कि क्या हमें सच में उसकी ज़रूरत है। जब वयस्क ही ‘जो दिखे, उसे ख़रीद लो’ वाली आदत अपना रहे हैं तो बच्चे भी जो कुछ वे माँगते हैं, उसे पाकर बड़े हो रहे हैं। कभी-कभी तो उन्हें उसके लिए इन्तज़ार भी नहीं करना पड़ता! इस बात को समझाने के लिए अनन्या की पसन्द से जुड़ी एक छोटी-सी कहानी दी गई है (चित्र-5)।


इस कहानी के बाद एक बहुत ही उपयोगी सवाल (और उसका जवाब) दिया गया है : क्या इसका मतलब यह है कि कोई मनोरंजन की वस्तु नहीं ख़रीद सकता? (चित्र-6)

- इस हैंडबुक की सबसे महत्त्वपूर्ण साथी वह गतिविधि पुस्तिका है जिसमें अभिभावक और बच्चों द्वारा मिलकर की जाने वाली गतिविधियाँ दी गई हैं। यह गतिविधि पुस्तिका मुख्य हैंडबुक में बताए गए विचार को पढ़ने और कक्षा में होने वाली चर्चाओं से आगे ले जाने की कोशिश करती है। यह पुस्तिका बच्चे में किसी अवधारणा की समझ विकसित करने के लिए अभिभावकों (या घर के बड़ों) को सक्रिय रूप से शामिल करती है, और ऐसा करना भी चाहिए, क्योंकि पैसे और ख़र्च का विषय घर के माहौल का केन्द्र होता है।
विषय-वस्तु के वे क्षेत्र जिन्हें मज़बूत करने की आवश्यकता है
- बचत वाले अध्याय में ‘स्मार्ट सेवर’ (समझदारी से बचत करने वाले) के बारे में बताया गया है। इसमें पहले बचत करने और फिर ख़र्च करने का तरीक़ा बताया गया है (चित्र-7)। ‘स्मार्ट सेवर’ बनने पर ज़ोर देने से अनजाने में यह सन्देश जा सकता है कि बचत करना ही हमेशा बेहतर विकल्प है। यहाँ यह समझना भी ज़रूरी है कि अलग-अलग लोग अपनी अलग-अलग ज़रूरतों और प्राथमिकताओं के आधार पर ख़र्च और बचत के बारे में अलग-अलग फ़ैसले लेते हैं।

- आज के समय को देखते हुए, अन्तिम अध्याय में डिजिटल मनी और डिजिटल पेमेंट के बारे में बताया गया है। यहाँ यह पूरी तरह से स्पष्ट किया जाना चाहिए कि छोटे बच्चों (इस सन्दर्भ में 6 और 7 साल के बच्चों) से न यह अपेक्षा की जाती है न ही यह सलाह दी जाती है कि वे ख़ुद (या किसी की देख-रेख में भी) किसी ऐप्स का इस्तेमाल करें या डिजिटल पेमेंट करें। सुरक्षा से जुड़े पहले और तीसरे बिन्दु (चित्र-8)से सम्भवतः इसके विपरीत सन्देश जा सकता है।

- अभिभावकों और बच्चों की गतिविधि पुस्तिका में प्रत्येक गतिविधि का क्या लक्ष्य है, उसके लिए क्या तैयारी करनी है, और गतिविधि को कैसे करना है, इसकी जानकारी स्पष्ट रूप से दी गई है। इसी के साथ यह भी बताया जा सकता है कि गतिविधि में ‘कितना समय लगेगा’, जिससे अभिभावकों को यह पता चल सके कि इसके लिए उन्हें कितना समय देना होगा। कुछ गतिविधियों के लिए दुकान या बैंक जाना पड़ सकता है, इसलिए पहले से जानकारी मिलने पर घर पर मौजूद अभिभावक या बड़ों को गतिविधि करने की योजना बनाने में और अधिक मदद मिल सकती है।
- अध्याय-5 की गतिविधि में बच्चों को एक ‘लक्ष्य’ (एक खिलौना, किसी मनपसन्द स्थान की यात्रा, बैकपैक, या फिर साइकिल आदि) सोचना होता है। फिर उसकी क़ीमत, जेब ख़र्च से हर महीने कितनी बचत कर सकते हैं, और लक्ष्य को हासिल करने में कितना समय लग सकता है, इन सभी के बारे में सोचकर सूची बनानी होती है (चित्र-9क)। इसके लिए तुरन्त मिलने वाले मज़े को टालने, क़ीमत का अन्दाज़ा लगाने, हिसाब-किताब रखने, फ़ैसला लेने और अनुमान लगाने की ज़रूरत होती है। ये सब उस उम्र के बच्चों की कार्यक्षमता और गणितीय कौशल से बहुत ज़्यादा है! इसके बजाय इसे ‘खेल-खेल में सीखो’ के द्वारा आज़माया जा सकता है। मान लीजिए किसी खिलौने की क़ीमत ₹50 है, और बच्चे के पास ₹5 हैं। खिलौना ख़रीदने के लिए उसे और कितने रुपए चाहिए? अब यह घटाने का एक आसान सवाल बन जाता है, या 50 से 5-5 करके पीछे की ओर गिनने का सवाल। अगर बच्चे को हर महीने ₹5 मिलते हैं तो पूरी राशि (पूरे ₹5) बचाने पर खिलौना ख़रीदने के लिए कितने महीने लगेंगे? 50 तक पहुँचने के लिए बार-बार 5 को जोड़ना (5 + 5 + …)। अगर हर महीने सिर्फ़ ₹3 की बचत होती है तो कितना समय लगेगा? (3 + 3 + 3…) 50 तक पहुँचने के लिए। 50 तक पहुँचने के लिए कितने 3 की ज़रूरत होगी? आसान चरणों में बाँटने से इस अवधारणा को समझने में बच्चे को सहायता मिलेगी, और वह अभ्यास से घबराएगा नहीं।
- अध्याय-6 की गतिविधि बच्चों को बजट के नियम (50/30/20) का उपयोग करके धनराशि की विवेकपूर्ण योजना बनाने में सहायता करती है। इसमें आय का 50% ज़रूरतों के लिए, 30% इच्छाओं के लिए और 20% बचत के लिए होता है (चित्र-9ख)। फिर से वही, बहुत सारी प्रक्रियाएँ। 6–7 वर्ष की आयु के बच्चों की समझ का स्तर इतना नहीं होता कि वे प्रतिशत की अवधारणा को समझ सकें, उन्हें प्रतिशत की अवधारणा समझाने की पूरी ज़िम्मेदारी बड़ों पर है। अगर सोच यही है कि बड़े ही पूरी तरह से योजना बनाएँ, वास्तविक ख़र्चों का अनुमान लगाकर उनकी तुलना करें, ज़रूरतों, इच्छाओं और बचत के लिए प्रतिशत की गणना करें, तो बड़ा सवाल यह है कि क्या अभिभावक या घर के बड़े लोग अपने दैनिक जीवन की दिनचर्या से समय निकालकर ऐसा करेंगे? और क्या फिर बच्चे से सिर्फ़ शीट में जानकारी भरवाएँगे और ट्रैक करवाएँगे? इससे बच्चा गतिविधि में सक्रिय रूप से शामिल नहीं रह जाता। इससे बेहतर होगा कि ₹20 या ₹50 जैसी छोटी धनराशि की सीमा तय करके बच्चे को उस बजट के अन्दर ज़रूरतों और इच्छाओं को ध्यान में रखते हुए कुछ वस्तुओं को चुनने के लिए कहा जाए, और यह सब ‘खेल-खेल में सीखो’ (pretend play) के द्वारा किया जा सकता है।


अभी जिस तरह की ‘गोल प्लानर’ गतिविधि और ‘50/30/20 नियम’ वाली वर्कशीट हैं, वे बच्चे के लिए बहुत ज़्यादा उलझन भरी हो सकती हैं। बड़ों की मदद मिलने पर भी इस उम्र के कई बच्चों के लिए किसी लक्ष्य हेतु लगातार बचत करना मुश्किल हो सकता है। इन गतिविधियों को बड़ी कक्षाओं में ले जाया जा सकता है, जहाँ बच्चे इनमें सीधेतौर पर शामिल हो सकें।
निष्कर्ष
मुख्य हैंडबुक और अभिभावक व बच्चे की गतिविधियों वाली पुस्तिका को एक-दूसरे के साथ जोड़कर देखें तो पता चलता है कि कितनी सार्थकता से बच्चों के दैनिक जीवन के अनुभवों में वित्तीय साक्षरता को शामिल किया जा सकता है। शहरी और ग्रामीण, दोनों परिवेश में रहने वाले बच्चे इन अवधारणाओं और विचारों (केवल डिजिटल पेमेंट को छोड़कर) से ख़ुद को जोड़ने में सक्षम होंगे, क्योंकि जिन बच्चों के आस-पास डिजिटल पेमेंट ज़्यादा सुलभ नहीं है, वे उससे उतने अच्छे तरीक़े से परिचित नहीं होंगे। ये किताबें वित्तीय शब्दावली या बुनियादी हिसाब-किताब के सीमित दायरे तक ही सिमटने के बजाय बच्चों को विकल्पों, संसाधनों और ज़िम्मेदारी के बारे में गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। हालाँकि जैसा कि पहले वाले भाग में विस्तार से बताया गया है, बच्चों की उम्र के हिसाब से इसे सटीक बनाने के लिए इसमें कुछ बदलाव करने की ज़रूरत होगी।
यह हैंडबुक पहली और दूसरी कक्षा के लिए शुरुआती किताब के तौर पर शिक्षकों और अभिभावकों को कम उम्र से ही बच्चों में वित्तीय समझ विकसित करने का एक उपयुक्त साधन उपलब्ध करवाती है। हालाँकि, इसके वर्तमान स्वरूप में यह किताब गणित सीखने का एक स्वतंत्र साधन न होकर बातचीत शुरू करने के लिए एक पूरक संसाधन की तरह काम करती है। इस किताब को अतिरिक्त निर्देश देने, पैसे से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर बात करने, गतिविधियों के लिए अन्य वैकल्पिक सुझाव देने, और शिक्षकों के मार्गदर्शन के लिए नोट्स की निश्चित रूप से आवश्यकता है, ताकि इस किताब के साथ न्याय हो सके। अभी यह काफ़ी हद तक इस पर निर्भर करता है कि शिक्षक बच्चों की उम्र, माहौल और सुविधाओं के हिसाब से इस किताब में दी गई जानकारी को किस तरह अपनाते हैं, जिसका मतलब यह हुआ कि सभी को एक जैसा अनुभव नहीं मिल पाता।
Images from the Personal Finance Handbook for Grades 1 & 2, reproduced with permission from the National Finance Olympiad (NFO).