मॉण्टेसरी का तरीक़ा : चुनिन्दा सामग्रियों का परिचय और उन्हें फिर से कैसे बनाया जाए (भाग 1)
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (एनईपी 2020) 3 वर्ष की उम्र के बच्चों की तालीम से लेकर उच्च शिक्षा तक सभी स्तरों पर शिक्षा के लिए स्पष्ट सिफ़ारिशें करती है। इन आयु समूहों के साथ सबसे ज़्यादा मेल खाने वाली सीखने की शैलियों के आधार पर स्कूली शिक्षा को चार चरणों में बाँटा गया है — 3–8 वर्ष की आयु के लिए फ़ाउण्डेशनल स्टेज (Foundational Stage), 8–11 वर्ष की आयु के लिए प्रारम्भिक चरण (Preparatory Stage), 11–14 वर्ष की आयु के लिए मध्य चरण (Middle Stage), और 14–18 वर्ष की आयु के लिए माध्यमिक चरण (Secondary Stage)| (1)
‘स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा’ (एनसीएफ़एसई, 2023) में उल्लेख किया गया है कि वर्तमान में, आरम्भिक कक्षाओं में विद्यार्थियों का बड़ा हिस्सा बुनियादी साक्षरता और संख्या-ज्ञान हासिल नहीं कर पा रहा है। गणित सीखना-सिखाना रचनात्मक और सौन्दर्यपूर्ण होने के बजाय पारम्परिक रूप से ‘रोबोटिक’ और ‘प्रक्रियात्मक’ अधिक रहा है। विद्यार्थियों में गणित विषय के प्रति डर की भावना भी घर कर जाती है।
एनसीएफ़़एसई 2023 इस डर का मुक़ाबला करने में मदद करने के लिए सिखाने के अन्तर्क्रियात्मक तरीक़ों का सुझाव देता है, जिनमें बाल सुलभ खेल, कुछ नया पता करना, खोजना, चर्चा, खेलकूद और पहेलियाँ शामिल हैं। पहले तीन सालों के दौरान, ‘सीखने के मानकों’ [Learning Standards] को हासिल करने के लिए जो सामग्री सुझाई गई है, वह मुख्य रूप से ठोस खेल सामग्री है, जैसे कि खिलौने, पहेलियों वाले चित्र या खिलौने, तस्वीरों वाली किताबें और जोड़-जाड़कर रची जाने वाली चीज़ें। पाठ्यपुस्तकें/प्लेबुक/वर्कबुक केवल ग्रेड 1 से काम में ली जाएँगी। शिक्षणशास्त्र बहुत हद तक खेल–आधारित है, और यह शिक्षक व बच्चों के बीच परवरिश और परवाह करने वाले रिश्तों पर ज़ोर देता है। हर बच्चा अपनी रफ़्तार से सीखे व सामूहिक गतिविधियाँ हों, इन दोनों के बीच सन्तुलन होना चाहिए। (2)
भारत और दुनिया भर में, प्रारम्भिक शिक्षा के लिए विभिन्न विधियाँ अपनाई जाती हैं। प्रमुख विधियों में से एक ‘मॉण्टेसरी शिक्षा’ है। क़रीब सौ साल पहले इस शैक्षिक दर्शन और अभ्यास को डॉ. मारिया मॉण्टेसरी ने शुरू किया था। ‘मॉण्टेसरी शिक्षा’ ख़ुद करके सीखने, अपनी रफ़्तार से और ख़ुद से तय गतिविधियों और सहयोगी खेलों पर आधारित है। मॉण्टेसरी कक्षाओं में, बच्चे अपने सीखने की गतिविधियों का ख़ुद चुनाव कर सकते हैं। बच्चों को दिया जाने वाला माहौल और विशेष रूप से मॉण्टेसरी तरीक़ों में प्रशिक्षित शिक्षक यह सुनिश्चित करते हैं कि बच्चे को चुनने के लिए उनकी उम्र के अनुसार उपयुक्त गतिविधियाँ पेश की जाएँ। बच्चे अकेले भी काम करते हैं और समूह में भी गतिविधियाँ करते हैं। इस दौरान वे अपने आस-पास की दुनिया की खोजबीन और अन्वेषण करते हैं, ज्ञान हासिल करते हैं और इस तरह अपनी अधिकतम क्षमता तक विकास कर पाते हैं।
ये कक्षाएँ बख़ूबी डिज़ाइन की गई होती हैं, और बच्चे की उम्र के आधार पर उसकी विशिष्ट ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अच्छी तरह से सोच-समझकर बनाई जाती हैं। डॉ. मारिया मॉण्टेसरी को बच्चों के साथ सीधे काम करने का अनुभव था, जिसके आधार पर उन्होंने पाया कि इस तरह के वातावरण में ख़ुद अनुभव करके सीखने से गणित, भाषा, भूगोल, विज्ञान और इसके अलावा भी बहुत कुछ की गहरी समझ पैदा होती है। इससे बच्चे के भीतर जिज्ञासा को विकसित करने और बढ़ावा देने में मदद मिलती है और उसके लिए आजीवन सीखने का मज़बूत आधार बनता है। यह ज़ाहिर होता है कि एनईपी 2020 में प्रारम्भिक शिक्षा के लिए कुल मिलाकर जो दृष्टिकोण पेश हुआ है, वह मॉण्टेसरी शिक्षा पद्धति में बहुत हद तक हासिल किया गया है।
मॉण्टेसरी की पाठ्यचर्या में अध्ययन के पाँच प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं : व्यावहारिक जीवन (Practical Life), संवेदी (Sensorial), गणित (Mathematics), भाषा (Language) और संस्कृति (Culture)। प्रत्येक क्षेत्र के लिए मॉण्टेसरी सामग्री का ख़ास सैट है, जो एक प्रमुख ज्ञान या कौशल पर केन्द्रित है। इस लेख में हम कुछ संवेदी सामग्रियों को देखेंगे, विशेष रूप से ऐसी सामग्रियाँ जो हमें दृश्य चीज़ों (वस्तुओं के आकार, लम्बाई, फैलाव और चौड़ाई) में फ़र्क़ करने में मदद करती हैं। जैसे-जैसे आप पढ़ेंगे, आपको अहसास होगा कि उनमें कितना कुछ है — गणित, भाषा, ध्यान केन्द्रित करना और बहुत कुछ जो आपस में गुँथे हुए हैं! उम्मीद है कि इससे यह झलक मिलेगी कि कक्षा में क्या किया जा सकता है और इसके नतीजे के रूप में क्या उम्मीद की जा सकती है।
सामग्री 1 : गुलाबी मीनार
गुलाबी मीनार ऐसी शुरुआती सामग्रियों में से एक है, जो मॉण्टेसरी परिवेश में बच्चों को दी जाती है। इसमें गुलाबी रंग के 10 क्यूब होते हैं, जिनका आयतन नीचे से ऊपर तक 1000 क्यूबिक सेंटीमीटर से लेकर 1 क्यूबिक सेंटीमीटर तक होता है। गुलाबी मीनार को आमतौर पर ढाई से तीन साल की उम्र के बच्चों को दिया जाता है, जिससे उन्हें आयाम की समझ बनाने में मदद मिले, और इसके साथ ही “बड़ा” व “छोटा” जैसे शब्दों से बच्चों का परिचय कराया जा सके (फिर, कुछ वक़्त बाद, उन्हें “उससे बड़ा”, “सबसे बड़ा” व “उससे छोटा”, “सबसे छोटा” के तुलनात्मक और श्रेष्ठता–सूचक दर्जों को समझाया जा सके)।
बच्चे को एक बार में एक क्यूब लाने के लिए कहा जाता है, जिसकी शुरुआत सबसे छोटे क्यूब (सबसे ऊपर वाला क्यूब) से की जाती है। एक बार में एक क्यूब लाने से उन्हें सचेत रूप से या अवचेतन रूप से यह एहसास होता है कि क्यूब का आकार बढ़ रहा है। जब सभी क्यूब दरी पर रख दिए जाते हैं, तो बच्चे को सबसे बड़ा क्यूब अपने सामने रखना होता है। शिक्षक बाक़ी सभी क्यूब को मिला देते हैं। फिर बच्चे से अगला सबसे बड़ा क्यूब रखने के लिए कहा जाता है। यह सिलसिला तब तक चलता रहता है, जब तक बच्चे सभी क्यूब को उनके आकार के घटते क्रम में एक के ऊपर एक नहीं रख देते हैं। ऐसा करते समय बच्चे एक जैसी वस्तुओं की आकार के अनुसार तुलना करने के साथ-साथ उन्हें क्रमबद्ध भी करते हैं।


अन्य गतिविधियाँ जिन्हें आज़माया जा सकता है : जब बच्चे सामग्री से परिचित हो जाते हैं और सभी क्यूब को सही ढंग से/सही क्रम में रखने में सक्षम हो जाते हैं, तो कुछ और गतिविधियाँ की जा सकती हैं। उनमें से एक में शिक्षक बच्चे की जानकारी के बिना किसी भी एक क्यूब को चुनकर उसे मीनार में सही जगह पर वापस रखने के लिए कहें (चित्र-2)। इस गतिविधि के लिए बच्चे को यह ध्यान देना होता है कि मीनार में किस जगह पर क्यूब के आकार में अचानक फ़र्क़ आया है और वहाँ पर उस क्यूब को रखना होता है जिसे हटाया गया है। या फिर, जिस क्यूब को हटाया गया है उसके आकार की तुलना मीनार पर मौजूद सभी क्यूब से करनी होती है और उस क्यूब की सही स्थिति का पता लगाना होता है — यह स्थिति उस क्यूब से बड़े क्यूब के ऊपर और उस क्यूब से छोटे क्यूब के नीचे होती है।
एक अन्य गतिविधि में, एक ट्रे में सभी क्यूब को मिला लिया जाता है और दरी पर मीनार बनाने के लिए बच्चे को एक बार में एक क्यूब लाने के लिए कहा जाता है। बच्चे को कहा जाता है कि वह पहले सबसे बड़े क्यूब को लाए और फिर एक-एक करके उससे छोटे क्यूब लाए। इसके लिए हर बार बच्चे को ट्रे में बचे हुए सभी क्यूब में से सबसे बड़ा क्यूब ढूँढ़ना होगा। यह शिक्षक के लिए तुलनात्मक और श्रेष्ठता–सूचक दर्जों का परिचय देने का भी अच्छा समय हो सकता है। दरी पर दो क्यूब रखें और पूछें, “कौन–सा क्यूब बड़ा है?”, “कौन–सा क्यूब छोटा है?” इसे कुछ बार दोहराएँ। उसके बाद, दरी पर कोई भी तीन क्यूब रखें और पूछें, “कौन–सा क्यूब सबसे बड़ा है?”, “कौन–सा क्यूब सबसे छोटा है?” शिक्षक इस गतिविधि को तब तक जारी रखते हैं, जब तक कि बच्चा इन शब्दों से जुड़े विचार और उनके अर्थ से परिचित नहीं हो जाता है।
एक अन्य गतिविधि में, शिक्षक 10 वर्गाकार कार्ड बनाते हैं। प्रत्येक कार्ड किसी एक क्यूब के फ़लक से मेल खाता है। फिर, बच्चे से कार्ड को उससे जुड़े क्यूब से मिलाने के लिए कहा जाता है।
सामग्री 2 : भूरी सीढ़ियाँ
‘भूरी सीढ़ियाँ’ ऐसी सामग्री है, जिससे बच्चों का परिचय गुलाबी मीनार के साथ ही (ढाई से तीन साल की उम्र के बीच) करवाया जाता है।

इसमें भूरे रंग के क्यूबॉइड होते हैं। प्रत्येक क्यूबॉइड की लम्बाई (l) समान होती है, लेकिन चौड़ाई (w) और ऊँचाई (h) (और इसलिए इसकी मोटाई) में फ़र्क़ होता है। इस वजह से, इन्हें साथ रखने पर ये सीढ़ियों जैसे लगते हैं (चित्र-3)।
गुलाबी मीनार के साथ की जाने वाली सभी गतिविधियों को भूरी सीढ़ियों के साथ भी किया जा सकता है। इनके ज़रिए बच्चों को ‘मोटा’, ‘उससे मोटा’, ‘सबसे मोटा’, ‘पतला’, ‘उससे पतला’ व ‘सबसे पतला’ शब्दावली से परिचित कराया जाता है। यहाँ ध्यान देने लायक़ एक दिलचस्प बात यह है कि गुलाबी मीनार के क्यूब के फ़लक भूरे रंग की सीढ़ियों के क्यूबॉइड के फ़लकों से मेल खाते हैं! इन दो सामग्रियों की खोजबीन करते–करते बच्चों को अपने आप यह अहसास हो जाता है! बच्चे इन दोनों सामग्रियों को कई तरह के क्रम से काम में ले सकते हैं। ऐसा करते हुए वे अलग-अलग पैटर्न, सन्तुलन और ध्यान केन्द्रित करने के बारे में बहुत कुछ सीखते हैं।



सामग्री 3 : लम्बी छड़ें
लम्बी छड़ों की सामग्री में 10 छड़ें होती हैं। सभी छड़ें एक ही मोटाई की होती हैं, लेकिन इनकी लम्बाई अलग-अलग हैं। इससे बच्चों में लम्बाई की समझ बनेगी, और ‘लम्बी’ व ‘छोटी’ (चित्र-7) के बारे में शब्दावली बनाने में मदद मिलेगी। इस सामग्री से परिचित होने पर उन्हें आगे के लिए ‘संख्या वाली छड़ों’ को समझने में मदद मिलती है। बच्चे को, सबसे लम्बी से शुरू करके सबसे छोटी तक, एक बार में एक छड़ को दरी पर रखने के लिए कहा जाता है। शिक्षक उन्हें यह देखने का मौक़ा देते हैं कि बाएँ से दाएँ जाने पर छड़ की लम्बाई कैसे घटती जाती है। शिक्षक, छड़ों की एक जोड़ी को अलग रखकर या फिर तीन छड़ें रखकर उनमें से सबसे छोटी छड़ को बताने के लिए पूछकर ‘लम्बी’, ‘सबसे लम्बी’ व ‘छोटी’, ‘सबसे छोटी’ की शब्दावली से बच्चों का परिचय करवा सकते हैं। इसी तरह से छड़ों का इस्तेमाल करते हुए और समझ विकसित की जा सकती है।
अन्य गतिविधियाँ जिन्हें आज़माया जा सकता है : ऊपर बताई गतिविधियों के अलावा छड़ों का क्रम बिगाड़ते हुए उन्हें गड्ड-मड्ड करके बच्चे से उन्हें फिर से क्रम में जमाने के लिए कहा जा सकता है; क्रम में से एक छड़ को हटाकर बच्चे से उसे सही जगह रखने के लिए कहा जा सकता है, या बच्चे से छड़ों के जोड़े बनाते हुए उनको इस तरह व्यवस्थित करने के लिए कहा जा सकता है जिससे वे सबसे लम्बी छड़ (या किसी भी लम्बाई की कोई भी छड़) की लम्बाई के बराबर हों (चित्र-8)।


सामग्री 4 : संख्या वाली छड़ें
आमतौर पर साढ़े तीन से साढ़े चार साल की उम्र के बच्चों को ‘संख्या वाली छड़ें’ बताई जाती हैं। ऐसा गुलाबी मीनार, भूरी सीढ़ियों और लम्बी छड़ों के साथ लगातार काम को दोहराने के बाद किया जाता है। अब तक बच्चे संवेदी रूप से बड़े/छोटे, लम्बे/कम लम्बे (छोटे) जैसे लक्षणों का अनुभव कर चुके होते हैं। वे अब यह सोचने लगेंगे कि कोई चीज़ ‘कितनी लम्बी या छोटी’ है। यही वक़्त है जब वे मात्रा को समझने के लिए तैयार होते हैं। उनका मनोमस्तिष्क गणितीय रूप से जागना शुरू हो रहा होता है।
संख्या वाली छड़ें, आयाम में लम्बी छड़ों जैसी होती हैं, लेकिन इन छड़ों पर दो रंग (आमतौर पर लाल व नीला) होते हैं (‘लम्बाई-1’ वाली छड़ को छोड़कर) (चित्र-9)।
बच्चा बाईं ओर से शुरू करते हुए सबसे लम्बी से सबसे छोटी छड़ों को क्रम से जमाता है। वह सुनिश्चित करता है कि हर बार छड़ का लाल हिस्सा ही नीचे हो। इस गतिविधि में, जैसे–जैसे छड़ों को रखा जाता है वैसे-वैसे शिक्षक प्रत्येक छड़ को उसके नाम से पुकारता है — ‘10 की छड़’, ‘9 की छड़’, और इसी तरह। आख़िरकार, बच्चा यह देख पाता है कि ‘2 की छड़’ की लम्बाई ‘1 की छड़’ की लम्बाई से दोगुनी है, ‘3 की छड़’ की लम्बाई ‘1 की छड़’ से तीन गुना है (या ‘1 की छड़’ को तीन बार लिया गया है), और इसी तरह से यह सिलसिला आगे बढ़ाया जाता है।


आज़माने के लिए अन्य गतिविधियाँ : शिक्षक 1 से 10 तक की संख्या के कार्ड बनाते हैं। उन्हें आपस में मिला देते हैं। फिर वे बच्चे से कहते हैं कि वह छड़ की लम्बाई को गिन ले। इसके बाद वे बच्चे को प्रत्येक कार्ड को सही छड़ के सामने रखने के लिए कहते हैं। यह गतिविधि बच्चों में मात्रा (छड़ पर लिखी संख्या) का उसके प्रतीक (चित्र-10 में दिखाए गए कार्ड) के साथ सम्बन्ध बना पाने का परीक्षण करती है। जब बच्चे ऐसा करने में सहज हो जाते हैं, तो शिक्षक संख्या के कार्ड के साथ-साथ छड़ों को भी मिला देते हैं। अब वे बच्चे को एक छड़ चुनने, उसे पहचानने और उसके सामने सही संख्या का कार्ड रखने के लिए कहते हैं। चूँकि छड़ें क्रम में नहीं जमी हुई हैं, इसलिए इस गतिविधि में संख्याओं के अनुक्रम को याद रखने से बच्चे को मदद नहीं मिलेगी! एक अन्य गतिविधि छड़ों की ऐसी जोड़ी को ढूँढ़ना है, जिसका योग 10 (‘10 की छड़’ की लम्बाई) हो। बच्चे 9 व 1, या 8 व 2, या 7 व 3, या 6 व 4 चुन सकते हैं।
याद करें कि यही गतिविधि लम्बी छड़ों के साथ की गई थी। तब छड़ों के साथ मात्रा को नहीं जोड़ा गया था। यहाँ बच्चों से छड़ों के जोड़े के संख्यात्मक नामों को कहने की अपेक्षा की गई है। इसे और अधिक चुनौतीपूर्ण बनाने के लिए शिक्षक कोई भी एक छड़ चुनकर बच्चों को उस छड़ के लिए छड़ों के जोड़े खोजने को कह सकते हैं। और बस इसी तरह, उन्हें गणित में जोड़ से जुड़े तथ्यों से परिचित कराया जाता है! दिलचस्प बात यह है कि यह सामग्री एक सातत्य (continuum) का उपयोग करके एक संख्या–रेखा शुरू करती है। ‘गणितमाला’ सहित अधिकांश अन्य सामग्रियाँ असतत (discrete) हैं। यह तथ्य संख्यात्मक प्रतीक (numerical symbol) और मात्रा (quantity) के बीच सम्बन्ध को स्पष्ट और आसान बनाता है कि प्रत्येक संख्यात्मक प्रतीक का किसी एक वस्तु के रूप में एक मात्रा से मिलान किया जा सकता है (मॉण्टेसरी, एम, 2016)। प्रत्येक सामग्री से जुड़ी विभिन्न अतिरिक्त गतिविधियों के विस्तृत विवरण के लिए सन्दर्भ (3) को देखा जा सकता है।
इस प्रकार, शैक्षिक सामग्री की वस्तुओं की तीन शृंखलाएँ हैं : गुलाबी मीनार, भूरी सीढ़ियाँ और लम्बी छड़ें। इन्हें इस तरह से बनाया गया है कि प्रत्येक शृंखला में तीन आयामों में अन्तरों की सम्भावनाओं को परिभाषित और अलग किया जा सके। एक-के-बाद-एक आयामों की शृंखला में तैयार की गई ये वस्तुएँ बच्चे के दिमाग़ को संवेदी रूप से गणित के लिए तैयार करने और ढालने में मदद करती हैं। यह बच्चे में ख़ास तरह की तार्किकता — मात्रा को आँकने की क्षमता — को विकसित करने में मददगार होती हैं, और यह तार्किक क्षमता गणितीय दिमाग़ की रचना करती है (मॉण्टेसरी, एम, 2007)।
क्या आप कक्षा में इन सामग्रियों को आज़माने के लिए उत्साहित हैं? बात ऐसी है, कि अपनी शिक्षण प्रक्रिया में मॉण्टेसरी सामग्री को शामिल करना आपको लुभा सकता है, लेकिन आपने भी अनुमान लगा लिया होगा कि कक्षा में उन्हें पूरी तरह से इस्तेमाल करने की कई सीमाएँ हैं। सबसे पहले तो मॉण्टेसरी शिक्षा का पूरा दर्शन शिक्षकों के लिए डिज़ाइन किए गए औपचारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम के ज़रिए प्रदान किया जाता है। इस प्रशिक्षण के बिना, डॉ. मारिया मॉण्टेसरी द्वारा परिकल्पित व्यापक दृष्टिकोण को लागू करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। फिर भी, हम अपनी क्षमता के मुताबिक़ इन सामग्रियों का बेहतरीन इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकते हैं, और जितना मुमकिन हो पाए उतना इस अनुभव को ज़्यादा–से–ज़्यादा बच्चों के साथ साझा कर सकते हैं। हालाँकि, यह भी मानना ज़रूरी है कि इस नेक इरादे के बावजूद कई सीमाएँ मौजूद हैं।
बेशक, खोज और सीखने के लिहाज़ से मॉण्टेसरी की सामग्रियाँ शानदार साधन हैं, लेकिन ये काफ़ी महँगी होती हैं। इसके अलावा, बच्चों को समझाते वक़्त इन सामानों का सटीक होना ज़रूरी है; इस लिहाज़ से इन सामग्रियों की प्रतिकृतियाँ बनाना चुनौतीपूर्ण है। आयामों में मामूली बदलाव भी उनके इस्तेमाल के मक़सद को काफ़ी हद तक प्रभावित कर सकते हैं। आमतौर पर, मॉण्टेसरी सामग्री लकड़ी, धातु या कपड़े जैसी क़ुदरती सामग्रियों से तैयार की जाती है। इस लेख में मुख्यतः लकड़ी की सामग्रियों को परखा गया है।
कुछ सामग्रियों को क़िफ़ायती और आसानी से हासिल कर पाने के मक़सद से, अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की ‘मैथ स्पेस’ [Math Space] ने कम लागत वाली मॉण्टेसरी सामग्री बनाने के लिए अभिनव और कुशल तरीक़ा विकसित किया है। इस तरीक़े में सटीकता बनी रहती है, जिससे इन्हें काम में लेने के इच्छुक शिक्षक अपनी कक्षाओं में इन संसाधनों को असरदार ढंग से बनाने और इस्तेमाल करने में सक्षम होते हैं। यहाँ ऐसे आसान चरण बताए गए हैं, जिनसे आप भी इन्हें बना सकते हैं!
- सटीकता सुनिश्चित करने के लिए आप जो आयाम चाहते हैं उनके क्यूब या क्यूबॉइड के जाल (मोटे चार्ट पेपर या आइवरी शीट का इस्तेमाल करके) बनाएँ।
- जाल के भीतर की जगह को चौकोर (क्यूब के लिए) या आयताकार (क्यूबॉइड के लिए) नालीदार कार्डबोर्ड शीट से भर दें, जिससे यह ठोस हो जाए।
- इसे गलने से बचाने के लिए (जलरोधी बनाने के लिए) पूरे ठोस भाग पर टेप चिपका दें।
- और लीजिए! आपकी मॉण्टेसरी सामग्री तैयार है।
खुला बॉक्स : हरे फ़लकों पर गोंद/टेप चिपकाएँ

कार्डबोर्ड की भराई



आप इन सामग्रियों को बनाने की चरण-दर-चरण प्रक्रिया और ज़रूरी आयामों को सन्दर्भ-6 में दी गई लिंक पर देख सकते हैं। ध्यान दें कि मॉण्टेसरी की मूल भूरी सीढ़ियाँ 20 सेंटीमीटर लम्बाई की बनती हैं, जबकि यहाँ 15 सेंटीमीटर लम्बाई के जाल इस्तेमाल किए गए हैं। फिर भी, लम्बाई में यह फ़र्क़ सामग्री की उपयोगिता या प्रभावशीलता पर असर नहीं डालता है।
मॉण्टेसरी पद्धति के सिद्धान्तों को अपनाना, और इनके लिए ज़रूरी सामग्रियों को कम लागत में सुलभ बनाना सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को लोकतांत्रिक बनाने में मददगार होगा। हर बच्चे के स्वाभाविक विकास पर ध्यान देकर हम हर लिहाज़ से मुकम्मल ऐसे व्यक्ति तैयार कर सकते हैं जो न सिर्फ़ ज़रूरी ज्ञान से लैस हों, बल्कि दुनिया की जटिलताओं से होकर गुज़रने के लिए ज़रूरी आत्मविश्वास और कौशल भी रखते हों। कुल मिलाकर, मॉण्टेसरी पद्धति महज़ एक शिक्षणशास्त्रीय तकनीक से कहीं अधिक है; यह ऐसा दर्शन है जो प्रत्येक बच्चे की अपनी अद्वितीय क्षमता को बढ़ावा देता है, और इस तरह शिक्षा में ज़्यादा रोशन और ज़्यादा समावेशी भविष्य की राह बनाता है।
आभार :
इस लेख को सुश्री सुधा राव, पारिजात मॉण्टेसरी और स्वाती सरकार, अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के इनपुट लेते हुए संकलित किया गया है।
- National Curriculum Framework for School Education (2023), Page 20.
- NCFSE (2023), https://www.ncert.nic.in/pdf/NCFSE-2023-August_2023.pdf
- Activities with Pink Tower, Brown Stairs, Long Rods and Number Rods https://bit.ly/3YcXg6S
- Montessori, M. (2016). Psychoarithmetic (Vol. 20, p. 6). Montessori Pierson Publishing Company.
- Montessor, M. (2007) Creative Development in the Child (Vol. 1). Kalakshetra Press.
- How to make low cost Pink Tower, Brown Stairs, Long Rods and Number Rods https://bit.ly/4eJhR8