पूर्णांकों के साथ योग और गुणन के गुणधर्मों की पड़ताल
विभिन्न संख्या समुच्चयों के साथ योग और गुणन के गुणधर्मों की पड़ताल की इस शृंखला का यह तीसरा लेख है। (i) पूर्ण संख्याओं और (ii) ऋणेत्तर परिमेय संख्याओं1 (Non-negative rational numbers) के समुच्चयों पर विचार करने के बाद इस लेख में हम पूर्णांकों पर चर्चा करेंगे। इस शृंखला, इसकी आवश्यकता और इससे हमारी जो आकांक्षाएँ हैं उन पर चिन्तन करने का यह एक अच्छा समय है।
1ऋणेत्तर परिमेय संख्याओं के समुच्चय में भिन्न और पूर्ण संख्याएँ शामिल हैं। आगे से हम इस समुच्चय को भिन्न कहेंगे।
हम यह शृंखला क्यों कर रहे हैं?
इस शृंखला का मूल विचार एट राइट एंगल्स के मार्च 2013 के अंक में ‘गुणन’ पर प्रकाशित पुलआउट से आया था। उस पुलआउट में पद्मप्रिया शिराली ने बताया था कि गुणन के क्रमविनिमेय, साहचर्य और वितरण गुणधर्मों को पूर्ण संख्याओं के समुच्चय के लिए दृश्य रूप से (visually) कैसे सिद्ध किया जा सकता है।
इन्हें सही सिद्ध करने की ज़्यादा लोकप्रिय विधि में किन्हीं भी दो (या तीन) पूर्ण संख्याओं को लेते हैं और जिस संख्या तथ्य (number fact) को हम सिद्ध करना चाहते हैं (जैसे कि 3 × 7 = 7 × 3, (5 × 4) × 9 = 5 × (4 × 9) आदि) उसके बाएँ पक्ष (LHS) और दाएँ पक्ष (RHS) दोनों की गणना करते हैं और जाँचते हैं कि वे बराबर हैं। यह आगमन विधि (inductive process) है।
पद्मप्रिया की विधि को दो या तीन पूर्ण संख्याओं के किसी भी संयोजन के लिए सामान्यीकृत किया जा सकता है, फिर भले ही वे संख्याएँ कितनी भी बड़ी क्यों न हों। यदि हम इस बात से सहमत हैं कि किसी भी पूर्ण संख्या को उतने ही काउंटरों द्वारा दर्शाया जा सकता है, तो उनकी विधियाँ पूर्ण संख्याओं के किसी भी संयोजन के लिए काम करेंगी। बड़ी संख्याओं के लिए काउंटरों की व्यवस्था करना मुश्किल या असम्भव हो सकता है, लेकिन निश्चित रूप से इसकी कल्पना की जा सकती है। उनकी विधियाँ आपको स्थिति-दर-स्थिति के आधार पर गणना करने यानी कि आगमन विधि से मुक्त करती हैं और निगमनिक (deductive) विधि के लिए प्रेरित करती हैं। सामान्यीकरण करने की योग्यता इन दृश्य पद्धतियों के निगमनिक पहलू के केन्द्र में है।
तो, हम पूर्ण संख्याओं के साथ योग के क्रमविनिमेय और साहचर्य गुणधर्मों को सिद्ध करने के लिए इस पद्धति की पड़ताल करना चाहते थे। इसके अलावा, हम अन्य संख्या समुच्चयों अर्थात (i) भिन्न संख्याओं (पूर्ण संख्याओं सहित) यानी ऋणेत्तर परिमेय संख्याओं, (ii) पूर्णांकों, (iii) परिमेय संख्याओं और (iv) वास्तविक संख्याओं — संक्षेप में कहें तो, वे सभी संख्याएँ जिनसे माध्यमिक स्तर तक के बच्चे रूबरू होते हैं — के साथ योग एवं गुणन के लिए इन गुणधर्मों की पड़ताल करना चाहते थे। इनमें से कुछ संख्या समुच्चयों के साथ हमें कुछ मुद्दों का सामना करना पड़ा। शृंखला के अन्त में हम उन पर चर्चा करेंगे। साथ ही कुछ स्थितियों के लिए हम ‘लगभग प्रमाण’ प्रस्तुत करने की स्थिति में थे — ‘लगभग प्रमाण’ इस अर्थ में कि तार्किक निगमनिक चरणों की एक शृंखला के माध्यम से हम कुछ सिद्ध परिणामों से उस परिणाम तक गए जिसे हम सिद्ध करना चाहते थे। ‘लगभग’ शब्द यहाँ कुछ परिणामों को सिद्ध करने में उपयोग की गई दृश्य पद्धति या पैटर्न पद्धति को इंगित करता है। शेष स्थितियों में हम पद्मप्रिया की पद्धतियों के समान ही पूर्णत: दृश्य पद्धतियों के साथ आगे बढ़ सकते हैं।
यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि विशिष्ट स्थितियों का विज़ुअलाइज़ेशन उन दृश्यों से भिन्न होता है जिन्हें विचाराधीन सामान्य स्थितियों तक बढ़ाया जा सकता है। बाद वाला मूलत: शब्दरहित प्रमाण (Proof Without Words – PWW) है। हालाँकि, कई लोग PWW को निगमनिक प्रमाण से अलग मानते हैं।
हमने अब तक क्या किया है?
हमने अब तक जुलाई 2018 और मार्च 2019 में क्रमश: एक लेख और एक पोस्टर में निम्नलिखित विषय प्रकाशित किए हैं :
- पहले विज़ुअलाइज़ेशन और फिर एक गतिविधि के माध्यम से पूर्ण संख्याओं के लिए योग के क्रमविनिमेय और साहचर्य गुणधर्म यह दोनों ही पूर्ण संख्याओं के किसी भी संयोजन के लिए सामान्यीकृत किए जा सकते हैं।
- भिन्नों के साथ योग और गुणन के सभी पाँच गुणधर्म—भिन्नों (और पूर्ण संख्याओं) के किसी भी संयोजन के लिए इन सभी गुणधर्मों का सामान्यीकरण करने के साथ-साथ इन्हें दृश्य रूप से प्रदर्शित किया गया था।
हम यहाँ से कहाँ जाएँगे?
हम इस शृंखला को निम्नलिखित तीन विषयों पर लेख देकर पूरा करना चाहते हैं :
- पूर्णांकों के साथ इन दोनों संक्रियाओं (यानी, योग और गुणन) के सभी पाँच गुणधर्म — इसमें हमने योग के क्रमविनिमेय एवं साहचर्य गुणधर्म और गुणन के वितरण गुणधर्म के लिए रंगीन काउंटरों (एट राइट एंगल्स के नवम्बर 2016 के अंक में पूर्णांकों पर आधारित पुलआउट में इनका उल्लेख किया गया है और बड़े पैमाने पर इनका इस्तेमाल भी किया गया है) का उपयोग किया है। पैटर्नों (विवरण बाद में) के माध्यम से सिद्ध तीन गुणन तथ्यों के आधार पर हम गुणन के शेष दो गुणधर्मों के लिए निगमनिक तर्क दे पाए हैं।
- संख्या रेखाओं का उपयोग करके स्केलिंग पर आधारित गुणन का एक वैकल्पिक दृश्य मॉडल। असतत (non-discrete) और ऋणात्मक संख्याओं यानी कि परिमेय संख्याओं और वास्तविक संख्याओं के लिए समान गुणन तथ्यों को सिद्ध करने के लिए यह आवश्यक है।
- परिमेय संख्याओं और वास्तविक संख्याओं के साथ इन दो संक्रियाओं के सभी पाँच गुणधर्म। इसमें काउंटरों के माध्यम से रंगीन लम्बाई और रंगीन क्षेत्रफल का सामान्यीकरण शामिल होगा। रंगीन आयतन की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि पूर्णांकों की ही तरह इनके लिए भी निगमनिक तर्क से काम चल जाएगा।
अब हम पूर्णांकों के समुच्चय के बारे में विचार करते हैं। इस समुच्चय में ऋणेत्तरता (non-negativity) का लाभ नहीं है। लेकिन यह एक असतत समुच्चय (discrete set) है।
आमतौर पर पूर्णांकों से बच्चों का परिचय उच्च प्राथमिक कक्षाओं में होता है, जब वे पैटर्न और तार्किक तर्कों (logical arguments) को समझने में अधिक सक्षम होते हैं। हालाँकि भले ही क्रमविनिमेयता, साहचर्य और वितरण शब्दों से उनका सामना हो सकता है, लेकिन आमतौर पर स्थिति-दर-स्थिति गणना करने के अलावा इन्हें किसी भी और तरह से नहीं समझाया जाता है। अधिकांश पाठ्यपुस्तकों में पूर्णांकों के लिए गुणन की क्रमविनिमेयता को, आसानी-से मान लिया जाता है, ख़ासतौर पर धनात्मक गुणित ऋणात्मक और ऋणात्मक गुणित धनात्मक रूप को परिभाषित करते समय। हमें लगता है कि गुणे की परिभाषा को अलग किया जाना चाहिए और इसे गुणधर्मों से पहले बताया जाना चाहिए।

पूर्णांक पर आधारित पुलआउट का अनुसरण करते हुए हमने हरे और लाल रंग के काउंटरों का उपयोग क्रमश: धनात्मक और ऋणात्मक इकाइयों के रूप में किया है। इस स्थिति में, गोल काउंटरों की बजाय वर्गाकार काउंटरों का उपयोग करना बेहतर है। वर्गाकार काउंटर के फ़ायदे हम बाद में बताएँगे। तो, छह को छह हरे काउंटरों, ऋणात्मक चार (-4) को चार लाल काउंटरों और शून्य को काउंटरों की अनुपस्थिति या बराबर संख्या में लाल और हरे रंग के काउंटर द्वारा दर्शाया जाता है (चित्र-1)।
यहाँ योग के लिए वैसा ही मॉडल तैयार किया गया है, जैसा कि पूर्ण संख्याओं की स्थिति में किया गया था। प्रत्येक पूर्णांक को उपयुक्त रंग के उतने ही काउंटरों द्वारा दर्शाया जाता है। काउंटरों के इन समूहों को दिए गए योग व्यंजक के अनुसार बाएँ से दाएँ व्यवस्थित किया जाता है। सभी काउंटरों का संयुक्त समूह योगफल को दर्शाता है। इसमें शून्य जोड़ों (zero pairs) को हटाने का एक अतिरिक्त चरण भी है। हालाँकि, यह चरण हमारे उद्देश्य के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं है।
योग का क्रमविनिमेय गुणधर्म
क्रमविनिमेय गुणधर्म के पीछे मूल विचार किसी योगफल को दो अनुकूल प्रेक्षण स्थानों (vantage points) से देखना है, जैसा कि पूर्ण संख्याओं और भिन्नों के मामले में होता है।
जब पूर्णांकों की बात आती है, तो चार सम्भावनाएँ बनती हैं :
- धनात्मक + धनात्मक
- धनात्मक + ऋणात्मक (और ∴ ऋणात्मक + धनात्मक)
- योगफल > 0
- योगफल < 0
- ऋणात्मक + ऋणात्मक
स्थिति 1 पूर्ण संख्याओं के समान है। स्थिति 2b के लिए हमने चित्र-2 और 3 में एक उदाहरण दिखाया है। पाठक समान तरीक़े से 2a और 3 की पड़ताल कर सकते हैं (और करना चाहिए)।


चित्र 2, B के परिप्रेक्ष्य से है और यह (−10) + 6 को दर्शाता है; जबकि चित्र-3, उसी योगफल को A के परिप्रेक्ष्य से दिखाता है और यह 6 + (−10) है। चूँकि केवल परिप्रेक्ष्य में परिवर्तन होता है, इसलिए योगफल अपरिवर्तित रहता है; यानी (−10) + 6 = 6 + (−10) । ध्यान दें कि यह बात किन्हीं भी दो पूर्णांकों पर लागू होती है और इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे शून्य से कितनी दूर हैं, यानी कि उन्हें दर्शाने के लिए कितने काउंटरों की आवश्यकता हो सकती है।
योग का साहचर्य नियम

इसके लिए मूल विचार यह है कि अगर हमें \(x\) + \(y\) + \(z\) जोड़ना है, तो इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि हम \(x\) और \(y\) को पहले जोड़ते हैं या \(y\) और \(z\) को। यह वैसा ही है, जैसा कि पूर्ण संख्याओं की स्थिति में होता है।
इसे एक गतिविधि के रूप में सबसे अच्छी तरह किया जा सकता है। कोई भी तीन पूर्णांक चुनें, उदाहरण के लिए 7, −4 और −10। उन्हें उपयुक्त काउंटरों के समूह के रूप में प्रस्तुत करें, यानी कि 7 हरे काउंटरों का पहला समूह, 4 लाल काउंटरों का दूसरा समूह आदि (चित्र-4)। अब 7 + (- 4) + (- 10) का योगफल तीनों समूहों को एक साथ मिलाने पर प्राप्त होगा। यदि प्रत्येक चरण में केवल दो समूहों को मिलाया जा सकता है, तो चरण 1 में पहले और दूसरे समूह – को मिलाया जा सकता है। इसका मतलब है कि 7+ (-4) को जोड़ा जा सकता है। चरण 2 में तीसरे समूह को इसमें मिलाया जा सकता है, यानी कि -10 को 7+ (-4) के योगफल में जोड़ना यानी [7 + (-4)] +(-10)| वहीं दूसरी ओर, चरण 1 में आप दूसरे और तीसरे समूह को मिला सकते हैं यानी कि (-4) + (-10) करना और चरण 2 में पहले समूह को इसमें मिलाना, यानी कि 7 को जोड़ना। दोनों ही स्थितियों में तीनों समूहों को मिलाकर एक किया जाता है, जिसमें न तो कोई अतिरिक्त काउंटर मिलाया जाता है, न ही किसी काउंटर को हटाया जाता है। अतः दोनों स्थितियों में योगफल बराबर होना चाहिए, यानी कि [7 + (-4)] + (-10) =7 + [(-4) + (-10)]। शून्य जोड़ों यानी हरे-लाल काउंटरों के जोड़ों को तीनों समूहों को मिलाने के बाद हटाया जा सकता है।
ध्यान दें कि इन तीन पूर्णांकों को स्वेच्छा (arbitary) से चुना गया था और इन्हें किन्हीं भी तीन पूर्णांकों तक बढ़ाया जा सकता है (कम-से-कम एक वैचारिक प्रयोग के तौर पर), फिर चाहे वे शून्य से कितनी भी दूरी पर क्यों न हों।
इस प्रकार 14 सम्भावनाएँ बनती हैं :
- सभी 3 धनात्मक
- 2 धनात्मक और 1 ऋणात्मक
- धनात्मक + धनात्मक + ऋणात्मक
- धनात्मक + ऋणात्मक + धनात्मक
- ऋणात्मक + धनात्मक + धनात्मक
2 व 3 की प्रत्येक स्थिति में दो सम्भावनाएँ हैं
- योगफल > 0
- योगफल < 0
- 1 धनात्मक और 2 ऋणात्मक
- धनात्मक + ऋणात्मक + ऋणात्मक
- ऋणात्मक + धनात्मक + ऋणात्मक
- ऋणात्मक + ऋणात्मक + धनात्मक
- सभी 3 ऋणात्मक
ऊपर दिखाया गया चित्र स्थिति 3a का एक उदाहरण है, जहाँ योगफल < 0 है। शेष स्थितियाँ हम पाठक द्वारा पड़ताल करने के लिए छोड़ रहे हैं।
पूर्णांकों के लिए गुणे को परिभाषित करना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि कोई भी मॉडल इसके लिए पूरी तरह से काम नहीं करता है। ऋणात्मक संख्याओं और गुणे से जुड़ी तीन स्थितियाँ हैं- (a) ऋणात्मक × धनात्मक, (b) धनात्मक × ऋणात्मक और (c) ऋणात्मक × ऋणात्मक । एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक ने पहाड़ों को विस्तार देकर पूर्णांकों के लिए एक अच्छा काम किया है। कक्षा 7 की पाठ्यपुस्तक के पूर्णांक अध्याय में उपरोक्त तीन स्थितियों को अलग-अलग और क्रमविनिमेयता को माने बिना दिया गया है। जबकि कई अन्य पाठ्यपुस्तकें क्रमविनिमेयता को मानते हुए (a) और (b) को एक समान बताती हैं। हम पहले उपरोक्त प्रकार के गुणनफलों में से प्रत्येक को परिभाषित करने या समझने का प्रयास करते हैं और फिर इन गुणधर्मों की जाँच करते हैं।
आइए हम निम्नलिखित मुख्य तथ्यों को एक-एक करके सिद्ध करें (माना कि \(m\) और \(n\) कोई दो पूर्ण संख्याएँ हैं) :
- ऋणात्मक × धनात्मक = ऋणात्मक
इसे बारम्बार योग (repeated addition) की धारणा का उपयोग करके किया जाता है, यानी कि (-4) × 3 = (-4) + (-4) + (-4) = -12 | अब काउंटर (जो कि इस स्थिति में ऋणात्मक होंगे) का उपयोग करके बारम्बार योग के लिए मॉडल तैयार किया जा सकता है। यह तर्क दिया जा सकता है कि यह धनात्मक × धनात्मक स्थिति के समान ही है यानी काउंटरों के रंग को छोड़ दें तो यह 4 × 3 जैसा ही है। या दूसरे शब्दों में, रंग को अनदेखा करें तो यह भी 4 × 3 काउंटरों का समान क्रमविन्यास (array) उत्पन्न करता है। बस इस क्रमविन्यास में 4 x 3 ऋणात्मक काउंटर हैं और इसलिए यह क्रमविन्यास पूर्णांक (4 × 3) को दर्शाता है। इसलिए (-4) x 3 = -(4 × 3)। ध्यान दें कि 4 और 3 को किन्हीं भी पूर्ण संख्याओं से बदला जा सकता है और सभी स्थितियों में यही तर्क लागू होगा। इस प्रकार हमने एक सामान्य स्थिति को सिद्ध किया है, जो है (-\(m\)) × \(n\) = −(\(m\) × \(n\))… (समीकरण 1)। - धनात्मक × ऋणात्मक = ऋणात्मक
इस स्थिति की पड़ताल करने के लिए पहले \(m\) के पहाड़े को \(n\) = 1 से \(n\) = 0 की तरफ़ विस्तारित किया जाता है और फिर पहाड़े में दिख रहे पैटर्न को बनाए रखते हुए इसे \(n\) < 0 के लिए आगे बढ़ाया जाता है। जैसे-जैसे हम \(m\) के पहाड़े को \(n\) = 4, 3, 2-आदि से आगे बढ़ाते हैं, हम देखते हैं कि प्रत्येक चरण में गुणनफल में से \(n\) घट रहा है। इस प्रकार या अन्य प्रकार से भी हमें \(m\) × 0 = 0 मिलता है। इसलिए अगला चरण \(m\) × (-1) = 0 – \(m\) = –\(m\) होगा। इस पद्धति को संख्या रेखा पर स्किप काउंटिंग के साथ जोड़कर देखा जा सकता है ताकि यह समझ आ सके कि \(m\) × (-\(n\)) असल में \(m\) लम्बाई को \(n\) बार स्किप करना है, जिसमें से प्रत्येक स्किप शून्य से शुरू होकर बाईं ओर या ऋणात्मक पक्ष में होता है। यह –\(n\) का \(n\) बार बारम्बार योग है, यानी कि (-\(m\)) × \(n\) । अतः \(m\) × (-\(n\)) = (-\(m\)) x \(n\) और इसलिए \(m\) × (-\(n\)) = – (\(m\) x \(n\))… (समीकरण 2)। ध्यान दें कि यह क्रमविनिमेयता नहीं है। - ऋणात्मक × ऋणात्मक = धनात्मक
यह पिछली दोनों स्थितियों को जोड़ता है। इसकी शुरुआत (-\(m\)) के लिए एक पहाड़ा बनाने से होती है। फिर इस पहाड़े को \(n\) < 0 की ओर विस्तारित किया जाता है। इस स्थिति में हम जैसे-जैसे \(n\) = 3 ,2,1 आदि से आगे बढ़ते जाते हैं, गुणनफल -3\(m\), -2\(m\), –\(m\) होता जाता है। इस प्रकार, प्रत्येक चरण में गुणनफल में \(m\) जुड़ता जाता है। तो, (−\(m\)) × 0 = 0 होगा। इसे संख्या रेखा पर स्किप काउटिंग के साथ जोड़ने पर (-\(m\))(-1) = 0 + \(m\) = \(m\) होता है। और सामान्यतः (-\(m\)) × (-\(n\)) शून्य से दाईं ओर या धनात्मक पक्ष की तरफ़ \(m\) चरणों का \(n\) बार स्किप है जो \(m\) × \(n\) के समान ही है। इसलिए (-\(m\)) × (-\(n\)) = \(m\) × \(n\) (समीकरण 3)
हालाँकि, परिमेय संख्याओं के लिए इस तरह की समझ बनाने वाला ऐसा कोई मॉडल उपलब्ध नहीं है— उदाहरण के लिए (−3/5) × (−7/4) को कैसे परिभाषित किया जाना चाहिए? ऐसे उदाहरणों की समझ बनाने के लिए प्राथमिक स्तर पर बच्चों के लिए वास्तविक जीवन से जुड़ता हुआ कोई उपयुक्त उदाहरण नहीं मिलता है। इसलिए हम संख्या रेखाओं का उपयोग करके स्केलिंग पर आधारित गुणन के दृश्य मॉडल को अगले लेख में देकर इस रिक्तता को भरना चाहते हैं।
अब हम गुणन के गुणधर्मों पर आते हैं। यहाँ हम पद्धति पर कम ध्यान देंगे क्योंकि हम कुछ महत्त्वपूर्ण परिणाम सिद्ध कर चुके हैं। ये भी बच्चों को यह दिखाने का एक सरल तरीक़ा है कि गणितीय प्रमाण कैसे दिए किए जाते हैं, यानी कि कुछ नया निगमित करने के लिए सिद्ध परिणामों को चरणबद्ध तरीक़े से कैसे उपयोग किया जा सकता है।
आइए हम इन तीन परिणामों को फिर से देखते हैं :
किन्हीं भी दो प्राकृत संख्याओं \(n\) और \(m\) के लिए
- \(m\) × (−\(n\)) = −(\(m\) × \(n\))
- (−\(m\)) × \(n\) = −(\(m\) × \(n\))
- (−\(m\)) × (−\(n\)) = \(m\) × \(n\)
गुणन का क्रमविनिमेय गुणधर्म
इसे उपरोक्त तीन परिणामों का उपयोग करके पूर्ण संख्याओं के लिए आयताकार क्रमविन्यास के साथ इस्तेमाल की जाने वाली पद्धति के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है। यह प्रमाण उच्च प्राथमिक स्तर के लिए पर्याप्त सरल हैं और यह जानने में बच्चों की मदद कर सकते हैं कि गणित तार्किक रूप से कैसे विकसित होता है।
योग के क्रमविनिमेयता की ही तरह इसके लिए भी तीन सम्भावनाएँ हो सकती हैं।
हम पहले ही सिद्ध कर चुके हैं
- \(m\) × \(n\) = \(n\) × \(m\)… (समीकरण 4)
यानी कि धनात्मक × धनात्मक की स्थिति, जो गुणन पर आधारित पुलआउट में दी गई प्राकृतसंख्याओं की स्थिति के समान है।
तो अब हम शेष स्थितियों को प्रदर्शित करना चाहते हैं धनात्मक-ऋणात्मक अर्थात \(m\) × (−\(n\)) = (−\(n\)) × \(m\) और ऋणात्मक-ऋणात्मक अर्थात (−\(m\)) × (−\(n\)) = (−\(n\)) × (−\(m\)) किन्हीं भी प्राकृत संख्याओं \(m\) और \(n\) के लिए।
शून्य से जुड़े मामलों की क्रमविनिमेयता का विशेष महत्त्व नहीं है।
\(m\) × (−\(n\))
= −(\(m\) × \(n\))
= −(\(n\) × \(m\))
= (−\(n\)) × \(m\)
समीकरण (1) से
समीकरण (4) से
समीकरण (2) से
(−\(m\)) × (−\(n\))
= \(m\) × \(n\)
= \(n\) × \(m\)
= (−\(n\)) × (-\(m\))
समीकरण (3) से
समीकरण (4) से
समीकरण (3) से
गुणन का साहचर्य गुणधर्म
योग के साहचर्य गुणधर्म की तरह ही इसकी भी 8 सम्भावनाएँ हैं :
- \(m\) × \(n\) × \(p\)
- \(m\) × \(n\) × (−\(p\))
- \(m\) × (−\(n\)) × \(p\)
- (−\(m\)) × \(n\) × \(p\)
- \(m\) × (−\(n\)) × (−\(p\))
- (−\(m\)) × \(n\) × (−\(p\))
- (−\(m\)) × (−\(n\)) × \(p\)
- (−\(m\)) × (−\(n\)) × (−\(p\))
ध्यान दें कि यहाँ दी गई स्थिति 1 पूर्ण संख्याओं की स्थिति है जिसे गुणन पर आधारित पुलआउट में सिद्ध किया गया था, यानी कि हमारे पास (\(m\) × \(n\)) × \(p\) = \(m\) × (\(n\) × \(p\)) …(समीकरण 5) पहले से है।
- (\(m\) × \(n\)) × \(p\) = \(m\) × (\(n\) × \(p\))
हमने यहाँ स्थिति 3, 5 और 8 को दर्शाया है और बाक़ी की स्थितियों को पाठक द्वारा करके देखने के लिए छोड़ा है।
- [\(m\) × (−\(n\))] × \(p\)
= −(\(m\) × \(n\)) × \(p\)
= −[(\(m\) × \(n\)) × \(p\)]
= −[\(m\) × (\(n\) × \(p\))]
= \(m\) × [−(\(n\) × \(p\))]
= \(m\) × [(−\(n\)) × \(p\)]
समीकरण (1) से
समीकरण (2) से
समीकरण (5) से
समीकरण (1) से
समीकरण (2) से
स्थिति 2 और 4 को भी इसी तरह दर्शाया जा सकता है।
- [\(m\) × (−\(n\))] × (−\(p\))
= −(\(m\) × \(n\)) × (−\(p\))
= (\(m\) × \(n\)) × \(p\)
= \(m\) × (\(n\) × \(p\))
= \(m\) × [(−\(n\)) × (−\(p\))]
समीकरण (1) से
समीकरण (3) से
समीकरण (5) से
समीकरण (3) से
स्थिति 6 और 7 को भी इसी तरह दर्शाया जा सकता है।
- [(−\(m\)) × (−\(n\))] × (−\(p\))
= (\(m\) × \(n\)) × (−\(p\))
= −[(\(m\) × \(n\)) × \(p\)]
= −[\(m\) × (\(n\) × \(p\))]
= (−\(m\)) × (\(n\) × \(p\))
= (−\(m\)) × [(−\(n\)) × (−\(p\))
समीकरण (3) से
समीकरण (1) से
समीकरण (5) से
समीकरण (5) से
समीकरण (3) से
गुणन का वितरण गुणधर्म
उपरोक्त दोनों से अलग वितरण के गुणधर्म में योग और गुणन दोनों शामिल हैं। इसलिए हम इसका कोई प्रमाण नहीं दे सकते हैं, लेकिन यहाँ क्रमविन्यास से काम बन जाएगा। यहाँ क्रमविन्यास बनाने के लिए समीकरण (1)-(3) का उपयोग किया जाएगा या फिर दिए गए पूर्णांकों के गुणनफल का उपयोग किया जाएगा।
इसकी 8 सम्भावनाएँ हो सकती हैं :
- धनात्मक × योगफल
- धनात्मक × (धनात्मक + धनात्मक)
- धनात्मक × (धनात्मक + ऋणात्मक)
- योगफल > 0
- योगफल < 0
- धनात्मक × (ऋणात्मक + ऋणात्मक)
- ऋणात्मक × योगफल
- ऋणात्मक × (धनात्मक + धनात्मक)
- ऋणात्मक × (धनात्मक + ऋणात्मक)
- योगफल > 0
- योगफल < 0
- ऋणात्मक × (ऋणात्मक + ऋणात्मक)
ध्यान दें कि स्थिति 1a गुणन पर आधारित पुलआउट में दर्शाई गई पूर्ण संख्या की स्थिति के समान है। इसके अलावा, योग की क्रमविनिमेयता (जिसे हम पहले ही सिद्ध कर चुके हैं) से ऋणात्मक + धनात्मक = धनात्मक + ऋणात्मक होता है।
हमने यहाँ स्थिति 1b(ii) और 2a को दर्शाया है। शेष स्थितियों को करके देखने के लिए हम पाठक को प्रोत्साहित करते हैं।
बॉर्डर के काउंटर गुणनखण्डों को दर्शाते हैं। इनसे अलग करने के लिए गुणनफल को दर्शाने वाले क्रमविन्यास के काउंटर हल्के रंग से दिखाए गए हैं।
| चरण 1 |
4 × 2 |
4 × (-5) |
4 × [2 + (-5)] |
| चरण 2 |
4 × 2 + 4 × (-5) |
शून्य जोड़ों को हटाकर भरना | |
| चरण 3 |
शून्य जोड़ों व बॉर्डर को हटाना
|
बॉर्डर को हटाना
|
|
(-4) × 2 |
(-4) × 5 |
(-4) × [2 + 5] |
चूँकि अन्तिम क्रमविन्यास दोनों में समान हैं, 4 × 2 + 4 × − 5 = 4 × [ 2 + ( −5 ) ] । ध्यान दें कि 4 × ( −5 ) में क्रमविन्यास के लिए रंग का उपयोग समीकरण (2) पर आधारित है।
2a के उदाहरण में क्रमविन्यासों के रंग को निर्धारित करने के लिए समीकरण (1) का उपयोग किया गया है।
चित्र-5 की तीसरी तस्वीर को पहली और दूसरी तस्वीर यानी कि (−4) × [2 + 5] = (−4) × 2 + (−4) × 5 के योगफल के रूप में आसानी से देखा जा सकता है।
ध्यान दें कि पिछले उदाहरणों की तरह यहाँ भी चुने गए पूर्णांकों की शून्य से दूरी स्वेच्छा से तय की जा सकती है। इसलिए यह प्रक्रिया किन्हीं भी तीन पूर्णांकों के लिए मान्य होगी। विशेष रूप से, यदि पहला पूर्णांक शून्य है तो सभी गुणनफल शून्य होते हैं और यह सर्वसमिका बिना प्रयास के सही हो जाती है। इसी तरह, यदि दूसरा या तीसरा पूर्णांक शून्य है तो एक गुणनफल शून्य हो जाता है; यानी कि एक क्रमविन्यास ग़ायब हो जाता है और सर्वसमिका फिर से बिना प्रयास के सत्य हो जाती है।
एक लाइन में जमाए गए वर्गाकार रंगीन काउंटरों के रंग को सामान्यीकृत किया जा सकता है और इस तरह यह सांकेतिक लम्बाई होगी, जिसे संख्या रेखा के साथ जोड़ा जा सकता है। यदि इन काउंटरों को एक क्रमविन्यास में जमाया जाता है, तो उनके रंग को सामान्यीकृत किया जा सकता है; यानी कि इससे सांकेतिक क्षेत्रफल निकाला जा सकता है। हमें सांकेतिक आयतन की आवश्यकता नहीं पड़ी। यह किन्हीं भी 2-3 पूर्णांकों के लिए काम करता है, लेकिन परिमेय संख्याओं या वास्तविक संख्याओं के लिए नहीं।
परिमेय संख्याएँ और वास्तविक संख्याएँ
इस तारतम्य में पूर्ण संख्याएँ सबसे आसान थीं क्योंकि वे असतत और ऋणेत्तर हैं और इसलिए काउंटरों के साथ उनके लिए मॉडल तैयार किया जा सकता है। भिन्नों के साथ असततता का लाभ नहीं मिलता है। लेकिन अच्छी बात यह है कि उनके ऋणेत्तर होने के कारण क्षेत्रफल (कभी-कभी लम्बाई के अनुपात में) और आयतन द्वारा उनके लिए मॉडल तैयार किया जा सकता है। पूर्णांकों में ऋणात्मक संख्याएँ शामिल थीं, पर अपनी असतता के कारण रंगीन काउंटर्स द्वारा उनके लिए मॉडल तैयार किया जा सका। लेकिन परिमेय संख्याएँ और वास्तविक संख्याएँ न तो असतत हैं, ना ही ऋणेत्तर। इसलिए वे सबसे चुनौतीपूर्ण समुच्चय साबित हुए। उनसे हम अगले दो लेखों में मिलेंगे।