सर्दी का एक दिन था। सभी विद्यार्थी प्रार्थना सभा के लिए मैदान में इकट्ठा हो चुके थे। हवा में घुले हुए राष्ट्रगान के मधुर सुर और अन्य जोशीले राग सीखने के लिए दिन का माहौल शानदार बना रहे थे। जैसे ही संगीत के अन्तिम स्वर मद्धम पड़े, शिक्षक ने पूछा, “\(14\) का पहाड़ा कौन सुनाएगा?” कुछ विद्यार्थियों ने अपने हाथ उठा दिए, जबकि कुछ दूसरों के पीछे छिपने लगे। “चलो कक्षा-3 से शुरू करते हैं, आर्यन तुम बताओ कि चौदह-सत्‍ते (\(14\)×\(7\)) कितने होते हैं?” आर्यन थोड़ा घबराया हुआ नज़र आया और कोशिश करने के बावजूद भी वह याद नहीं कर सका कि \(14\)×\(7\) कितना होगा। प्रार्थना सभा के बाद, शिक्षक ने बड़े गर्व से मुझे बताया कि कैसे उनके कुछ विद्यार्थी \(30\) तक का पहाड़ा सुना सकते हैं। बाद में, चौथे दर्जे की एक कक्षा में एक विद्यार्थी ने दो अंकों वाली संख्या के गुणा को बिना किसी ग़लती के हल कर दिया, लेकिन यह पूछने पर कि दूसरे अंक से गुणा करते समय उसने ‘0’ क्यों लिखा, उसने माना कि उसने तो मात्र निर्देशों का पालन किया। इन दो वाकयातों से मुझे यह स्पष्ट हो गया कि कैसे स्कूली गणित अक्‍सर रटने और सवाल-जवाब की बातचीत तक ही केन्द्रित रहता है और संख्याओं को समझने में निहित आनन्द और रचनात्मकता को दबा देता है।

गणितीय विमर्श क्या है?

गणित की कक्षा में होने वाले संवाद को ही गणितीय विमर्श के रूप में जाना जाता है। अधिकतर कक्षाओं में अधिकांशतः ‘सुधारात्मक विमर्श’ (correcting discourse) ही होता है, जिसमें संवाद केवल विद्यार्थियों द्वारा शिक्षकों के सवालों के जवाब देने और शिक्षकों द्वारा जवाब सही है या ग़लत बताने तक ही सीमित रहता है। ‘सही जवाब’ तक पहुँचने के लिए विद्यार्थियों द्वारा केवल निर्धारित विधि का ही पालन किया जाता है, जिससे विद्यार्थियों द्वारा प्रक्रिया को समझने की या उसके विश्लेषण की गुंजाइश समाप्त हो जाती है। हालाँकि, गणित की शिक्षा के लक्ष्यों का मक़सद तार्किक सोच विकसित करना, पैटर्न्स की व्याख्या करना, अनुमान लगाना, उनका खण्डन करना, पूर्वानुमानों को गणितीय प्रमाण के माध्यम से सिद्ध करना, समस्या का समाधान करना, धाराप्रवाह गणना करना और स्पष्टता एवं सटीकता से बात रखना है।

एक अच्छा गणितीय विमर्श तब होता है जब विद्यार्थी अपने विचारों को साझा करते हैं और एक-दूसरे के गणितीय विचारों को सुनते हैं, न कि तब जब बातचीत में केवल शिक्षक ही हावी रहता है। यह गणित को और भी अच्छे से समझने में विद्यार्थियों की मदद करता है क्योंकि वे समस्याओं के बारे में सोचने के अलग-अलग तरीक़े जान पाते हैं। यह उन्हें उनके गणितीय कौशलों में और ज़्यादा आत्मविश्वासी होने में भी मदद करता है क्योंकि वे गणित की अवधारणाओं को समझने और समझाने में बेहतर हो जाते हैं। इससे शिक्षकों को भी मदद मिलती है क्योंकि वे यह जान पाते हैं कि विद्यार्थी क्या समझते हैं और क्या नहीं। इससे उन्हें पता चल पाता है कि विद्यार्थियों की और भी अच्छे से सीखने में मदद कैसे की जा सकती है।

गणितीय विमर्श को कक्षा में स्थापित करने का मेरा अनुभव

गणितीय विमर्श को बढ़ावा देने का एक प्रयास प्रारम्भिक कक्षाओं के साथ संख्या बोध (number sense) पर काम करने के दौरान किया गया। हमारी गणित की कक्षा के लिए कुछ नियम और मानदण्ड निर्धारित किए गए थे, जैसे दूसरों की बात सुनना, दूसरों की राय का सम्मान करना, अपनी राय के समर्थन में तर्क देना आदि। विमर्श स्थापित करते समय जो मुख्य नियम तय किया गया था वह था : केवल सही उत्तर न बताएँ, बल्कि यह भी बताएँ कि आपने समस्या का समाधान कैसे किया। इस प्रक्रिया में जिन दो रणनीतियों का व्यापक रूप से उपयोग किया गया, वे सवाल उठाना और गणितीय सोच समझाना थीं। अलग–अलग समय पर अलग–अलग तरीक़ों, जैसे एक–एक बच्चे से (one-to-one) बातचीत, जोड़ियों में काम करना, समूहों में काम करना, पूरी कक्षा का एक साथ विचार–विमर्श करना आदि का उपयोग किया गया। विद्यार्थियों ने अपनी गणितीय सोच को व्यक्त करने के लिए विभिन्न प्रतिरूपों (representations) और मॉडलों का भी उपयोग किया।

कक्षा-1 के विद्यार्थियों के साथ काम करते समय, शुरुआत में विद्यार्थी जो सोच रहे थे उसके बारे में बात करने के लिए उन्‍हें प्रेरित करना कठिन था। शुरुआती चरण में, एक–एक बच्चे से हमारी बातचीत बहुत अच्छी रही। बाद में, सामूहिक कार्य और पूरी कक्षा के साथ चर्चा के दौरान भी वे बातचीत करने में सक्षम हो गए थे। मैंने ग़ौर किया कि कक्षा-3 के विद्यार्थियों में या तो सही उत्तर देने या फिर निष्क्रिय रूप से सुनने की प्रवृत्ति थी। इसलिए, मैंने हर बार विद्यार्थियों के उत्तर देने के बाद उनसे यह पूछना शुरू कर दिया, “यह उत्तर कैसे मिला?” शुरू में, मैने पाया कि विद्यार्थी जो सोच रहे थे उन्हें उसे व्यक्त करने में कठिनाई हो रही थी और इसीलिए वे एक शब्द में ही जवाब दे रहे थे। ऐसे मौक़ों पर चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए और ज़्यादा सवाल पूछना, जैसे “क्या तुम इस क़दम को समझा सकते हो?”, “इससे तुम्हारा क्या मतलब है?” वग़ैरह, सचमुच मददगार रहा। कभी–कभी विद्यार्थी टूटे–फूटे वाक्यों में जो कहना चाहते थे उसे समझकर व्यवस्थित व पूर्ण वाक्य बनाकर उनसे दोबारा यह पूछने से भी कि क्या वे यही कहना चाहते थे, बहुत मदद मिली। इससे विद्यार्थी अपने जवाबों की समीक्षा करके उन्हें सुधार सके और अपनी सोच को और स्पष्ट कर पाए। कुछ दिनों के अभ्यास के बाद, मैं तब बड़ी आनन्दित हुई जब विद्यार्थियों ने अपने सहपाठियों से यह पूछना शुरू कर दिया कि उन्हें उनके जवाब “कैसे?” मिले।

नीचे दिए गए उदाहरणों में, विद्यार्थियों के नज़रिए और सोच को समझने के लिए जाँच-पड़ताल वाला विमर्श (probing discourse) किया गया। इस विमर्श में, जिसका पहले ज़िक्र किया गया है, शिक्षक कई तरह के सवाल पूछते हैं। इस प्रकार का विमर्श प्रक्रियात्मक प्रवाह (procedural frequency) और वैचारिक समझ को प्रोत्साहित करने में मदद करता है।

एक–एक बच्चे से बातचीत :

कक्षा-1 के साथ जोड़ पर काम करते समय, विद्यार्थियों को ऐसे अलग–अलग प्रतिरूप (representations) बनाने के लिए कहा गया, जो उनके जवाबों को समझाते हों :

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चित्र-1

रमेश के बग़ीचे में 5 जामुन के पेड़, 3 आम के पेड़ और 7 अमरूद के पेड़ हैं। बग़ीचे में कुल कितने पेड़ हैं?
आप जो कर रहे हैं उसे आप लिख/चित्रित कैसे कर सकते हैं?
अनन्या ने समस्या को कैसे दर्शाया इसे चित्र-1 में दिखाया गया है।
शिक्षक : तुमने कैसे गिना?
अनन्या : मैंने गिना एक, दो, तीन… तेरह, चौदह, पन्द्रह।

शिक्षक तुरन्त ही समझ गए कि उसने ‘सभी को गिनने’ वाली विधि का प्रयोग किया है।

इससे हमें यह समझने में मदद मिलती है कि विद्यार्थी सीखने के ठीक किस स्तर पर हैं और यह उन्हें उस स्तर से आगे बढ़ने में सहायता करता है। इसके बाद, ऐसे सवालों को हल करने के और ज़्यादा प्रभावी तरीक़ों का उपयोग करने में विद्यार्थियों की मदद करने के लिए हमने ‘काउंट–ऑन’ विधि (इसमें आप बड़ी संख्या से शुरू करके उसमें छोटी संख्या जोड़ते जाते हैं, जैसे 7 में 4 जोड़ने के लिए 7 से शुरू करके आगे 4 और गिनते हैं) का उपयोग करते हुए विभिन्न तरीक़ों पर काम किया।

जोड़ी में काम करते समय संवाद :

विद्यार्थियों ने अपने जोड़ीदार से इबारती सवाल पूछे, जिसे उन्होंने खुद ही गढ़ा था।
आर्यन : अगर मेरे पास 30 चॉकलेट्स हैं और उनमें से 6 मैं विराट को दे देता हूँ, तो मेरे पास कितनी चॉकलेट्स बचेंगी?
हर्ष : 22… (कुछ सोचने के बाद) नहीं, नहीं 24 बचेंगी।
आर्यन : कैसे?
हर्ष : 6 और 4 हुए 10। तो अगर मैं उनमें से 6 विराट को दे देता हूँ, तो मेरे पास 4 बचेंगी। और मेरे पास 30 में से 20 चॉकलेट्स हैं, तो मेरे पास होंगी 20 और 4…24 चॉकलेट्स।
उपरोक्त बातचीत से विद्यार्थी को अपनी सोच को परिष्कृत करने में और अपनी गणितीय रणनीति को आत्मविश्वास के साथ व्यक्त करने में मदद मिली।

प्रश्न : कौन-सी भिन्न बड़ी है : \(\frac{1}{7}\) या \(\frac{1}{4}\) ?

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ऐसा विमर्श विद्यार्थियों की भ्रान्तियों या ग़लत अवधारणाओं को पहचाने में मदद करता है, जो ऐसे विमर्श की अनुपस्थिति में अनजानी और अनसुलझी ही रह जाती हैं। यह तार्किकता विकसित करने, बेहतर समझ विकसित करने और बातचीत में आत्मविश्वास लाने में मदद करता है।

पूरी कक्षा के साथ चर्चा के दौरान संवाद:

बातचीत
चित्र-2
  1. बातचीत
    चित्र-2

शिक्षक : आपको क्या दिखाई दे रहा है? (इस अभ्यास के पहले हम संख्याओं के ऐसे जोड़े बनाने पर काम कर चुके थे, जिनका योग 10 होता है।)
आशु : मुझे \(3\) दिख रहे हैं।
शिक्षक : हाँ, वहाँ 3 नीले बिन्दु हैं। उसके अलावा क्या दिख रहा है?
सौम्या : मुझे \(3+2+5= 10\) दिख रहा है।
शिक्षक : कैसे सौम्या? क्या तुम और समझा सकती हो?
सौम्या : क्योंकि यहाँ \(3 \)बिन्दु हैं और यदि हम \(2 \)और जोड़ते हैं तो यह \(5\) बन जाएगा और बचे हुए \(5\) मिलकर \(10\) बनाएँगे।
शिक्षक : टीचर : हाँ, तो सौम्या कह रही है कि अगर वह \(3\) और\( 2\) जोड़ेगी तो \(5\) होगा और दोबारा \(5\) जोड़ने पर 10 बनेगा। क्या आप सभी सहमत हैं?
विद्यार्थी : हाँ
शिक्षक : हम और क्या देख सकते हैं?
दीपा : इसे हम \(10 – 7 = 3\) भी कह सकते हैं।
शिक्षक : क्या आप दीपा की बात से सहमत हैं?

  1. कक्षा 3 में, हमने दो अंकों को जोड़ने के लिए विभिन्न रणनीतियों का उपयोग करने पर काम किया। विद्यार्थियों से आगे आकर सवाल \(37+24\) को हल करने का अपना तरीक़ा समझाने को कहा गया।
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चित्र-3

(विद्यार्थियों की रणनीति के साथ उनके नाम का उल्लेख करें।)

शिक्षक : क्या आप बता सकते हैं कि आपने सवाल को कैसे हल किया?
रितिका : मैंने 37 को 30 और 7 लिखा। इसी प्रकार 24 को 20 और 4 लिखा। फिर मैंने 30 और 20 को जोड़ा जो कि 50 हुए, ऐसे ही 7 और 4 को भी जोड़ा जो कि 11 हुए। फिर 50 और 11 को जोड़ा जो 61 हुए।
सरिता : मैंने 37 को 10,10,10 और 7 की तरह देखा। 24 को 10, 10 और 4 की तरह देखा। इसके बाद मैने सभी 10 जोड़ लिए जो कि 50 हुए। 7 और 4 हुए 11, इसी तरह 50 और 11 को जोड़ा जो 61 हुए।
शिक्षक : आपको क्या लगता है कौन-सा तरीक़ा सवाल को हल करने का सबसे प्रभावी तरीक़ा था?
राहुल : मुझे लगता है लतिका और सरिता द्वारा उपयोग किया गया 10+10+10+…. वाला तरीक़ा प्रभावी तरीक़ा है।
शिक्षक : अच्छा, तो राहुल को लगता है कि ‘10 में तोड़ना’ और फिर जोड़ना प्रभावी तरीक़ा है। बाकी लोग क्या सोचते हैं?
सरिता : मुझे लगता है कि रितिका का तरीक़ा ज़्यादा प्रभावी है।
शिक्षक : तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?
सरिता : क्योंकि उसने सीधे ही 30 और 20 को जोड़ लिया, फिर 7 और 4 को जोड़ लिया, जो हर बार 10 को जोड़ने से ज़्यादा प्रभावी तरीक़ा है।

सुझाए गए कुछ सवाल

क्या किसी के पास कोई दूसरी तरकीब है?
क्या आपने इसे करने के किसी दूसरे तरीक़े के बारे में सोचा?
किसका तरीक़ा आपको ज़्यादा प्रभावी लगा?

इस पूरी भागीदारी का सबसे अच्छा हिस्सा वह था, जहाँ विद्यार्थी किसी सवाल को हल करने के अलग–अलग तरीक़े खोजने और निकालने लगे। उन्होंने सीधा–सपाट जवाब देने, जिसे पहले उनकी कक्षा में काफ़ी अहमियत दी जाती थी, के बजाय जवाबों के लिए तर्क दिए। विद्यार्थियों ने अपने सहपाठियों की बातों और उन्होंने सवाल को किस तरह से हल किया, को बड़े धैर्य के साथ सुना। यहाँ तक कि लुप्त संख्या (missing number) वाले सवाल को भी यंत्रवत रूप से हल करने की बजाय, विद्यार्थी उसके बारे में सोच पा रहे थे। नीचे दिया गया चित्र एक विद्यार्थी द्वारा इस्तेमाल की गई लुप्त योज्य वाले एक ही सवाल को हल करने की दो विधियों को दर्शाता है।

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कुछ बिन्दु जिन्हें कक्षा में विमर्श को लागू करते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए :

  1. किसी गणितीय विमर्श से समृद्ध कक्षा को स्थापित करने में समय तो लगता है, लेकिन यह सारी मेहनत सार्थक होती है। जब सीखने की प्रक्रिया में विद्यार्थी अपनी बात को शामिल होता देखते हैं, तो यह सीखने को और भी अर्थपूर्ण और आनन्ददायी बना देता है।
  2. विमर्श में शामिल न होने वाले विद्यार्थियों को पहचानकर उनकी सहायता करने की आवश्यकता होती है क्योंकि शुरुआत में विद्यार्थियों को यह प्रक्रिया बोझिल लग सकती है और उन्हें पर्याप्त प्रोत्साहन और समर्थन की आवश्यकता हो सकती है।
  3. ऐसी कक्षा संस्कृति स्थापित करते समय हरेक विद्यार्थी का आकलन करना शुरुआत में कठिन हो सकता है, लेकिन उचित योजना के साथ यह आसान हो जाएगा।

निष्कर्ष :

गणितीय विमर्श गणित सिखाने की टॉप-डाउन (top-down mathematical learning) प्रक्रिया से गणित सिखाने की सार्थक प्रक्रिया तक ज़रूरी बदलाव लाने के लिए एक सशक्त साधन है। गणित सिखाने को निष्क्रिय से सक्रिय प्रक्रिया में बदलने के लिए कक्षा में गणितीय विमर्श को बढ़ावा देना अति आवश्यक है, जिसमें विद्यार्थी अपने सीखने की ज़िम्मेदारी ख़ुद लेते हैं। शिक्षक ऐसा माहौल बनाकर जहाँ विद्यार्थी अपने गणितीय विचारों को व्यक्त करने के लिए मूल्यवान, समर्थित और सशक्त महसूस करें, आत्मविश्वासी, तर्कशील ढंग से सोचने और सुनने वालों को पोषित कर सकते हैं। चुनौतियों के बावजूद, गणितीय विमर्श से होने वाले फ़ायदे इसके लिए किए गए प्रयासों से अधिक होते हैं। इसके फलस्वरूप विद्यार्थी सीखने की गतिविधि में ज़्यादा गहराई से शामिल हो पाते हैं, ज़्यादा बेहतर समझ हासिल कर पाते हैं और सीखने वाला समुदाय अधिक समावेशी बन पाता है।

  1. National Curriculum Framework, 2023. National Curriculum Framework for School Education.
  2. National Council of Teachers of Mathematics. (2000). Principles and standards for school mathematics.

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